प्रायोगिक सिनेमा की सिरमौर 'एलएसडी'

इंडस्ट्री में इतना जोखिम उठा कर फिल्म बनाना बिल्कुल भी चलन में नहीं हैं। इसलिए फिल्म के निर्देशक दिबाकर बैनर्जी के साहस पर एकबारगी आश्चर्य भी होता है। एक तो फिल्म का विषय साधारण उस पर कहाने कहने का अंदाज निराला और इन सब पर अलहदा कि जो कुछ भी फिल्म में हो रहा है उसे कैमरा भी देख रहै है। फिल्म की इतनी सारी असाधारण बातों का कर्ता-धर्ता एक आदमी। सुनते ही आश्चर्य होता है।
असलियत में ऐसा है भी नहीं । किसी भी फिल्म में निर्देशक का रोल किसी जहाज के कैप्टन जैसा ही होता है। अ गर टीम में दम ना हो तो कैप्टन के मजबूत होने के बाद भी जहाज डूब ही जाता है। लेकिन अगर एलएसडी की टीम पर नजर डालें तो एक भी जाना-पहचाना चेहरा नहीं है।
इस फिल्म के सारे ही किरदार नये हैं। कई ने तो इस फिल्म के लिए जीवन में पहली बार कैमरा फेस किया है। बेरी जॉन के थियेटर स्कूल के पूर्व अभिनय प्रशिक्षक मोंगिया ने इस फिल्म की शूटिग से पहले सभी कलाकारों को दो महीने तक प्रशिक्षण दिया था। अतुल मोंगिया ने इस फिल्म के अलग-अलग सितारे चुने और उन्हें प्रशिक्षित किया। मोंगिया खुद भी फिल्म में एक कैरेक्टर के रूप में मौजूद हैं। उन्होंने बताया "निर्देशक दिबाकर बनर्जी ऐसा चाहते थे। उन्होंने मुझे प्रत्येक किरदार के बारे में संक्षिप्त में बताया था। यह मुझ पर था कि मैं सही कलाकार चुनूं।"
मोंगिया कहते हैं "हममें से हरेक के भीतर एक कलाकार है। हम सब ने अपनी ही भूमिका की है। जो दूसरों की भूमिकाएं करते हैं वे भी कलाकार हैं। मेरा काम प्रत्येक के अंदर छुपे हुए कलाकार को बाहर लाना था।" फिल्म की दूसरी कहानी में रश्मि का किरदार करने वाली नेहा चौहान को बनर्जी ने शादी के एक वीडियो में खोजा था।
एलएसडी के कलाकारों ने सिर्फ फिल्म में अभिनय ही नहीं किया बल्कि किसी फिल्म स्कूल के प्रोजेक्ट वर्क की तरह पूरी फिल्म बनायी है। उन्होने अभिनय के साथ-साथ फिल्म बनाने की तकनीकी जिम्मेदारियां भी उठायी हैं। जैसे पहली कहानी में पिता की भूमिका करने वाले संदीप बोस फिल्म के कास्टिंग निर्देशक हैं। जबकि दूसरी कहानी में अभिनय करने वाली नम्रता राव फिल्म की संपादक हैं।


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