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...जिसने सफलता की गाथा पैरों से लिखी

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...जिसने सफलता की गाथा पैरों से लिखी

नारायण बारेठ

बीबीसी संवाददाता, जयपुर

सुधा चंद्रन ने नाचे मयूरी फ़िल्म में भी काम कियाजयपुर फ़ुट ने भारत ही नहीं दुनिया भर में अपने पैर खो चुके लोगों को संबल दिया है.लेकिन सुधा चंद्रन जैसे कुछ लोग हैं, जिन्होंने इस कृत्रिम पैर के ज़रिए जिस्मानी कमी को एक क़ाबलियत में तब्दील कर दिया और ऐसा किरदार खड़ा किया जो औरों के लिए मिसाल बन गया.सुधा ने जयपुर फ़ुट के सहारे 'नाचे मयूरी' फ़िल्म में अपने नृत्य से सबका मन मोह लिया. सुधा को जयपुर अपना दूसरा घर लगता है, क्योंकि यहीं उन्हें 'जयपुर फुट' लगा.

पिछले दिनों जयपुर में सुधा चंद्रन ने नृत्य पेश किया तो भरी भीड़ उमड़ी. ना ये सावन था, ना घटाएँ और ना आसमान में कोई बादलो का बसेरा. लेकिन सुधा जब मंच पर आईं तो लगा सैंकड़ों बिजलिया आसमान में कौंध रही हैं.सभागार में समाया हर जिस्म रोमांचित था और हर हाथ तालियों से ध्वनि कर सुधा की नृत्य प्रस्तुति की दाद दे रहा था. सुधा ऐसे नाचीं जैसे कोई अराधना स्थल पर इबादत कर रहा हो.

फिर सुधा लोगों से मुख़ातिब हुईं और कहा- जन्म मेरा मुंबई में हुआ, लेकिन जयपुर ने मुझे दूसरी ज़िंदगी दी है. इतने सालों से मैं नृत्य कर रही हूँ, लेकिन ये पहला मौक़ा है जब मुझे जयपुर में नृत्य करने का अवसर मिला है. ये बहुत ही खुशगँवार मौक़ा है, मेरे लिए इससे बड़ा कोई सम्मान नहीं हो सकता.एक हादसे ने सुधा की ज़िंदगी में झंझावात ला दिया. वर्ष 1981 में एक दुर्घटना में सुधा का एक पैर हमेशा के लिए जिस्म से जुदा हो गया.

सुधा उन दिनों की याद करते हुए कहती हैं, ''हादसे ने मेरी ज़िंदगी में अँधेरा उतार दिया. मैं भविष्य को लेकर बहुत उदास थी, अपनी माँ के साथ जयुपर आई तो इतनी भर मुराद थी कि मैं चल सकूँ. मैं जयपुर फ़ुट के लोगों से मिली और पूछा क्या मैं कभी चल सकूँगी."सुधा ने पूरे सभागार में अपनी कहानी सुनाई तो हर व्यक्ति ने उन्हें ध्यान से सुना. सुधा कहने लगीं- मैंने पूछा क्या मैं नाच भी सकूँगी, तो डॉक्टरों ने कहा बेशक आप नृत्य कर सकेंगी. ये मेरी ज़िंदगी का सबसे अनमोल लम्हा था. भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति ने 'जयुपर फ़ुट' को दुनिया भर में पहुंचाया है. इस समिति के प्रमुख डीआर मेहता ने सुधा को पैर खोकर फिर खड़ी होने का प्रयास करते भी देखा है.

लेकिन जब उन्होंने सुधा को नृत्य करते देखा तो अभिभूत हो गए. वे आशीर्वाद भाव से बोले सुधा ने तो कमाल कर दिया. जीवन के हादसे को अभिशाप से वरदान में बदल दिया. वो बाक़ी लोगो के लिए मिसाल बन गई है.सुधा ने 'नाचे मयूरी' फ़िल्म के ज़रिए ज़माने को अपनी क़ाबलियत से रूबरू कराया है. कोई उन्हें टीवी सीरियल के रामोला सिकंद के रूप में जानता है तो वे अपाहिज ज़िंदगियों के लिए एक रोशन किरदार है.

सिलीगुड़ी की सुष्मिता चक्रव्रती के एक पैर में कमी है. लेकिन उन्होंने सुधा के किरदार से प्रेरणा ली और अब वो मंच पर बखूबी नृत्य करती है.सुष्मिता ने बीबीसी कहा- जब मैं उदास होती तो मेरी नानी मुझे सुधा का उदाहरण देती. बस उनको देख कर मैं नृत्य करना सीख गई.एक वो वक़्त था जब सुधा जयपुर फ़ुट के सहारे ज़िंदगी गुज़ार रही थी. तभी रवि देंग ने उनका हाथ थमा और अपनी जीवन-संगिनी बनाया.

वे कहते हैं कि उन्हें सुधा पर बहुत गर्व है. सुधा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.सुधा कहती हैं- मुझे जयपुर फ़ुट से एक पहचान मिली है. हम जैसे लोग इसके सहारे चल रहे है. मैं हादसे के वक़्त बहुत छोटी थी. मैंने बहुत सपने देखे थे, सहसा ये हादसा हो गया और सपने बिखर गए. मेरी माँ सब्जी लेने रात को जाती थी, क्योंकि लोग मेरी विकलांगता को लेकर अप्रिय सवाल पूछते थे. मेरे माता-पिता ने भी दुख झेला है. तभी मैंने प्रण किया कि मुझे ऐसा करना है कि माँ-बाप गर्व करें. वो मैंने किया.वो बिजली की मानिंद जब नाचती हैं तो लोग भूल जाते है कि उनके कौन से पैर में जयपुर फ़ुट लगा है. दुनिया में लोग अपनी कामयाबी के किस्से हाथों से लिखते है. लेकिन ये सुधा हैं, सुधा चंद्रन, जिन्होंने अपनी सफलता की गाथा पैरों से लिखी है.

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