बरक़रार है मन्ना डे की आवाज़ का जादू

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए, कोलकाता से
मन्ना डे भले ही अपनी उम्र के नौ दशक पूरे कर चुके हों लेकिन उनकी आवाज़ का जादू आज भी जस का तस है. एक मई को अपने 91 वें जन्मदिन के अवसर मन्ना डे ने कोलकाता में बीबीसी से लंबी बातचीत की.
अपनी धुन के पक्के इस शख़्स का पूरा नाम है प्रबोध चंद्र डे. लेकिन उनके इस नाम की जानकरी कम लोगों को ही है. 'ऐ भाई जरा देख के चलो", 'न तो कारवां की तलाश है" और ऐसे ही कई हिट गीत देने वाले प्रबोध को पूरी दुनिया मन्ना डे के नाम से जानती है.
वर्ष 1943 में सुरैया के साथ 'तमन्ना" फ़िल्म से अपनी गायकी की शुरुआत करने वाले मन्ना डे ने उसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने हिंदी के अलावा बांग्ला और मराठी गीत भी गाए हैं. अब बढ़ती उम्र की वजह मन्ना डे उतने सक्रिय तो तो नहीं है, लेकिन उनकी आवाज का जादू बरक़रार है.
कुश्ती
दिलचस्प बात यह है कि कोलकाता में अपने कालेज के दिनों में मन्ना डे कुश्ती और फुटबाल के दीवाने थे. उसके बाद वे लंबे समय तक इस दुविधा में रहे कि वकील बनें या गायक. आखिर में अपने चाचा और गुरू केसी डे से प्रभावित होकर उन्होंने गायन के क्षेत्र में क़दम रखा.
मुंबई में अपने शुरुआती दौर के बारे में मन्ना डे कहते हैं, “वे ग़रीबी और संघर्ष के दिन थे. शुरुआत में बालीवुड में पांव टिकाने भर की जगह बनाने के लिए मुझे काफी संघर्ष करना पड़ा. वर्ष 1943 में सुरैया के साथ 'तमन्ना" फ़िल्म में गाने का मौका मिला. लेकिन उसके बाद भी काम नहीं मिला. बाद में धीरे-धीरे काम मिलने लगा.'
मन्ना डे हिंदी फ़िल्मों में संगीत के स्तर में आई गिरावट से बेहद दुखी हैं. वे कहते हैं कि 'मौजूदा दौर का गीत-संगीत अपनी भारतीयता खो चुका है. इसके लिए संगीत निर्देशक ही ज़िम्मेदार हैं.'
वे बताते हैं कि 'मैं आज जिस मुकाम पर हूं, उसमें मेरे चाचा कृष्ण चंद्र डे की अहम भूमिका रही है. वह चूंकि अपने समय के एक माने हुए संगीतकार थे इसलिए हमारे घर संगीत जगत के बड़े-बड़े लोगों का आना-जाना लगा रहता था. कम उम्र में ही चाचा की आंखों की रोशनी चली जाने की वजह अक्सर मैं उनके साथ ही रहता था.'
वे बताते हैं कि 'संगीत की पहली तालीम मुझे अपने चाचा से ही मिली. खयाल के अलावा मैंने रवींद्र संगीत भी सीखा। उन दिनों चाचा के साथ मैं भी न्यू थिएटर आया जाया करता था. इसी वजह से वहां उस दौर के जाने-माने गायकों को नजदीक से देखने-सुनने का मौका मिला।
पहली फ़िल्म
वैसे, मन्ना डे की पहली फिल्म थी 'रामराज्य" जिसके संगीतकार विजय भट्ट थे. उसके बाद लंबे समय तक कोई काम नहीं मिला तो उनके मन में कई बार कोलकाता लौट जाने का ख़्याल आया. नाउम्मीदी और मुफ़लिसी के उस दौर में उन्होंने 'मशाल' फ़िल्म में गाया और उनका गीत 'ऊपर गगन विशाल' हिट हो गया जिसके बाद उन्हें धीरे-धीरे काम मिलने लगा.
मौजूदा दौर की होड़ की तुलना उस दौर से करते हुए मन्ना डे कहते हैं “फिल्मी दुनिया में उस समय भी काफी प्रतिस्पर्द्धा थी, लेकिन वह आजकल की तरह गलाकाटू नहीं थी. उस समय टांगखिंचाई के बदले स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता होती थी."
संगीत ने ही मन्ना डे को अपनी जीवनसाथी सुलोचना कुमारन से मिलवाया था. दोनों बेटियां सुरोमा और सुमिता गायन के क्षेत्र में नहीं आईं. एक बेटी अमरीका में बसी है. पांच दशकों तक मुंबई में रहने के बाद मन्ना डे ने बंगलौर को अपना घर बनाया.
लेकिन कोलकाता आना-जाना लगा रहता है. फिल्मों में अब ज़्यादा नहीं गाने की वजह मन्ना डे ने कुछ यूं बताई 'अब बहुत कुछ बदल गया है. न तो पहले जैसा माहौल रहा और ना ही गायक और कद्रदान. लेकिन संगीत ने मुझे जीवन में बहुत कुछ दिया है. इसलिए मैं अपनी अंतिम सांस तक इसी में डूबा रहना चाहता हूँ.'
मन्ना डे को वर्ष 2007 के लिए भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा सम्मान 'दादासाहब फाल्के अवार्ड" भी मिल चुका है. उन्होंने ये पुरस्कार पिछले वर्ष अक्तूबर में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से ग्रहण किया.


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