मन्ना डे को दादा साहब फाल्के पुरस्कार
'ए मेरे प्यारे वतन' और 'जिंदगी कैसी है पहेली' जैसे सदाबहार नग्मे गा चुके 90 वर्षीय प्रख्यात गायक मन्ना डे को भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा सम्मान दादासाहब फाल्के पुरस्कार दिया जाएगा। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल 21 अक्टूबर को उन्हें यह पुरस्कार प्रदान करेंगी।
भारतीय सिनेमा में जीवन पर्यन्त शानदार योगदान के लिए सरकार द्वारा प्रतिवर्ष दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्रदान किया जाता है। मन्ना डे को यह पुरस्कार वर्ष 2007 के लिए दिया जाएगा।
पुरस्कार के अंतर्गत विजेता को दस लाख रुपये नकद, एक स्वर्ण कमल और एक शाल भेंट की जाती है। मन्ना डे इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाले 55वें व्यक्तित्व हैं। इस पुरस्कार की शुरुआत दादा साहब फाल्के के जन्मशती वर्ष 1969 से की गई थी।
मन्ना डे के परिवार की सदस्य अनुराधा डे ने कहा, "हमें 'सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय' से मंगलवार को यह सूचना मिली। इस समय मन्ना डे एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए न्यूयॉर्क में हैं। वह गुरुवार को बेंगलुरू लौटेंगे। हम पुरस्कार की घोषणा से बहुत खुश हैं।"
पूर्ण चंद्र और महामाया डे के घर 1 मई 1919 को जन्मे प्रबोध चंद्र डे (मन्ना डे) 50 से लेकर 70 के दशक तक हिंदी फिल्म उद्योग का प्रतिष्ठित नाम रहे। उन्होंने अपने लंबे करियर के दौरान 3,500 से अधिक गीत गाए।
उन्होंने 1943 में 'तमन्ना' फिल्म में गीत गाने के साथ गायकी की दुनिया में अपने करियर की शुरूआत की। यह गीत बेहद सफल रहा। इसके बाद उन्होंने 1950 में आई फिल्म 'मशाल' के लिए एकल गीत 'ऊपर गगन विशाल' गाया।
उनके सदाबहार नगमों में 'सुर ना सजे क्या गाऊं मैं', 'ना तो कारवां की तलाश है ना तो हमसफर की तलाश है', 'पूछो ना कैसे मैंने रैन बिताई', 'लागा चुनरी में दाग', 'आजा सनम मधुर चांदनी में हम', 'दिल का हाल सुने दिल वाला', 'तू प्यार का सागर है', 'ए मेरी जौहरा जबीं' जैसे गीत शामिल हैं। उन्होंने बंगाली फिल्मों में भी कई यादगार गीत गाए हैं।
मन्ना डे को अपनी गायकी और संगीत कैरियर के लिए विभिन्न पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। उन्हें हिन्दी फिल्म 'मेरे हजूर' और बंगाली फिल्म 'निशि पदम' के लिए सर्वश्रेष्ठ पुरूष पाश्र्वगायक के तौर पर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।


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