'रीमिक्स से ख़त्म हो रही गीतों की महक'

आप इतने लंबे अरसे बाद किसी शो के लिए कोलकाता आई हैं. इस देरी की वजह?
वजह कोई ख़ास नहीं है. एक के बाद दूसरे कार्यक्रमों में व्यस्तता के कारण आना नहीं हो पा रहा था. लेकिन आयोजकों ने जब रवींद्र जयंती के मौके पर यहां आयोजित दोदिनी समारोह में मुझसे गाने का अनुरोध किया तो मैं इनकार नहीं कर सकी.अगर यह कविगुरू का मामला नहीं होता तो शायद इस बार भी आना नहीं हो पाता. लेकिन मैं उनको अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहती थी. यह सिर्फ़ मेरी नहीं, बल्कि पूरे महाराष्ट्र की श्रद्धांजलि है.
आपने अरसे बाद रवींद्र संगीत गाया है. इसमें कोई कठिनाई महसूस हुई?
हां, मैंने कोई 20 साल पहले अंतिम बार रवींद्र संगीत गाया था. इसलिए कुछ घबराहट ज़रूर थी. लेकिन एक बार रिहर्सल के बाद ही कुछ आत्मविश्वास पैदा हो गया. जो बात आपके मन में है, वह चेहरे पर भी झलकती है. मैंने हमेशा जीवन का भरपूर आनंद लिया है. वहीं खुशी मेरे हाव-भाव और चेहरे पर भी झलकती है. जीवन में दुखी या नाराज होना ठीक नहीं है. जो होना है वह तो होगा ही. तो क्यों न हर पल का आनंद लिया जाए आशा भोसले
कविगुरू के लिखे गीतों को गाना आसान नहीं है. मैं गाते हुए काफ़ी डर रही थी. लेकिन लोगों ने इसे काफ़ी पसंद किया. मैंने स्टेज पर छह गाने गाए.
आप बांग्ला बोलने में सहजता महसूस करती हैं?
पहले जब राहुल देव बर्मन साहब जीवित थे तो मैं काफ़ी बढ़िया बांग्ला बोलती थी. लेकिन अब भूलती जा रही हूं. लेकिन अगली बार जब इस शहर में आऊँगी तो बेहतर बांग्ला बोलने का प्रयास करुंगी. बांग्ला बोलना मुझे पसंद है. आखिर मैं कोलकाता की बहू हूँ.
आप इस साल एक बांग्ला अलबम की भी योजना बना रही हैं?
हां, दुर्गापूजा से पहले मेरा यह अलबम रीलिज़ हो जाएगा. लंबे अरसे बाद मैं बांग्ला में पूरा अलबम बना रही हूं.
इन दिनों रीमिक्स का दौर है. रवींद्र नाथ टैगोर के गीतों को भी रीमिक्स किया जा रहा है. रीमिक्स के बारे में आपकी क्या राय है?
यह ठीक नहीं है. कोई भी व्यक्ति किसी गाने पर काफ़ी मेहनत करता है, उसे रीमिक्स के जरिए एक झटके में बदलना उचित नहीं है. इससे उन गीतों की असली महक ख़त्म हो जाती है. इस शोर-शराबे और बेतुकी तुकबंदियों में संगीत की आत्मा कहीं गुम हो जाती है.
शास्त्रीय संगीत के मुक़ाबले फ़िल्मी संगीत को पिछड़ा समझा जाता है?
हिंदी फ़िल्म संगीत को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया, यह इसका दुर्भाग्य है. इसे शास्त्रीय संगीत के मुक़ाबले कमजोर माना जाता रहा है. लेकिन यह धारणा सही नहीं है. फ़िल्मी संगीतकार को भी काफ़ी मेहनत करनी पड़ती है और नए-नए प्रयोग करने पड़ते हैं.
कोई भी व्यक्ति किसी गाने पर काफ़ी मेहनत करता है, उसे रीमिक्स के जरिए एक झटके में बदलना उचित नहीं है. इससे उन गीतों की असली महक ख़त्म हो जाती है. इस शोर-शराबे और बेतुकी तुकबंदियों में संगीत की आत्मा कहीं गुम हो जाती है. आशा भोसले
किसी भी फ़िल्मी संगीतकार का संघर्ष शास्त्रीय संगीतकार के मुक़ाबले कम नहीं होता. यह धारणा बदलनी चाहिए.
आपने तो कई पीढ़ियों के लिए गाने गाए हैं. निजी तौर पर आपकी पसंद क्या है और आपकी आवाज़ सबसे ज्यादा किस अभिनेत्री पर फबती है?
निजी तौर पर मुझे हल्का शास्त्रीय संगीत पसंद है. वैसे, तो कई अभिनेत्रियों पर मेरी आवाज़ फबती है. लेकिन निजी तौर पर मुझे रेखा पसंद है. उस पर मेरी आवाज तो फबती ही है, वे मेरे गानों की भाव-भंगिमाएं भी बेहतर समझती हैं.
नए गायक-गायिकाओं में बेहतर कौन है?
कई लोग हैं. लेकिन इस समय मौलिक प्रतिभाओं का अभाव है. कोई भी अपनी मौलिक आवाज़ में गाना नहीं चाहता. कोई किशोर साहब की आवाज़ की नकल कर रहा है तो कोई रफी साहब की. हर कलाकार की अपनी अलग पहचान होनी चाहिए. अपनी पहचान बनाने के लिए आत्मविश्वास बहुत ज़रूरी है. इस क्षेत्र में भी लगातार रियाज और मेहनत करना ज़रूरी है.
पचहत्तर पार की उम्र में भी युवाओं जैसा जोश कैसे बनाए रख पाती हैं?
यह तो रहस्य है. जो बात आपके मन में है, वह चेहरे पर भी झलकती है. मैंने हमेशा जीवन का भरपूर आनंद लिया है. वहीं खुशी मेरे हाव-भाव और चेहरे पर भी झलकती है. जीवन में दुखी या नाराज होना ठीक नहीं है. जो होना है वह तो होगा ही. तो क्यों न हर पल का आनंद लिया जाए.


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