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    'न गंभीर सिनेमा बचा, न उसे देखने वाले दर्शक'

    By Jaya Nigam
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    गंभीर सिनेमा की जानी-मानी हस्ती और फिल्म निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन भारतीय सिनेमा से नाखुश हैं। अडूर करते हैं कि व्यवसायिक सिनेमा वास्तविकता से काफी दूर हो गया है। उन्होने यह भी कहा कि राष्ट्रीय पुरस्कारों की जूरी के सदस्य भी अब 'मसाला फिल्मों' पर ध्यान देते हैं।

    केरल के तिरूवनंतपुरम में हाल ही में हुए 'वीक हेय' महोत्सव के दौरान अडूर ने कहा, "अच्छे सिनेमा के विचारों में एक नाटकीय कहानी विकसित करने की क्षमता होनी चाहिए। ऐसी कहानी जो दर्शकों को बांध सके। लेकिन व्यावसायिक सिनेमा का जिंदगी से कोई लेना-देना नहीं है। कई फिल्मों में अंडरवर्ल्ड के उपद्रवी लोग अक्सर रंगीन चरित्र वाले नायक होते हैं।"

    दादा साहेब फाल्के पुरस्कार प्राप्त अडूर कहते हैं, "व्यावसायिक सिनेमा संवादों पर बहुत ज्यादा निर्भर हो गया है। नायक सहित हर किरदार बिना रुके बोलता रहता है और बहुत ऊंची आवाज में बातें की जाती हैं। अब सिनेमा बहुत मुखर हो गया है जो कि एक खतरनाक चलन है।"

    अडूर मलयालमय सिनेमा में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाले फिल्मकार व पटकथा लेखक हैं। उनकी पहली फिल्म 'स्वयंवरम' (1972) से केरल में 'न्यू वेव सिनेमा' आंदोलन की शुरुआत हुई थी। अडूर को 1984 में पद्मश्री, 2006 में पद्मभूषण और 2004 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिला है। उनकी कई फिल्मों को राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं।

    वह कहते हैं कि जो फिल्में तमिलनाडु में दर्शकों को नहीं लुभा पातीं वे केरल में अच्छा व्यवसाय करती हैं। उन्होंने कहा कि फिल्में देखने जाने वाले दर्शकों में बुद्धिमान लोग बहुत कम होते हैं। वे फिल्में देखने को समय की बर्बादी मानते हैं। दर्शकों ने सिनेमा के सम्बंध में गम्भीरता से बातें करना छोड़ दिया है।

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