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    INTERVIEW: बॉक्स ऑफिस के लिए मुझे अलग तरह की फिल्में करनी होगी- नवाजुद्दीन सिद्दिकी

    By Neeti Sudha
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    दमदार अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दिकी का कहना है कि एक फिल्म सिर्फ अच्छी या बुरी हो सकती है। उसे नॉन कमर्शियल या unconventional का टैग देना गलत है। फिल्मों को इस तरह वर्गों में बांट कर हम सिनेमा को नुकसान पहुंचाते हैं और यह सिर्फ भारत में ही होता है। 

    नवाजुद्दीन सिद्दिकी लेखक सादत हसन मंटो की बॉयोपिक फिल्म 'मंटो' में मुख्य किरदार निभाते नजर आएंगे। नंदिता दास के निर्देशन में बनी यह फिल्म 21 सितंबर को रिलीज होने वाली है। फिल्म के कुछ खास शोज हो चुके हैं और काफी तारीफ हो रही है। नंदिता दास के डाइरेक्शन से लेकर नवाज की अदाकारी तक तारीफ लूट रही है।

    Nawazuddin Siddiqui

    ऐसे में फिल्मीबीट ने नवाजुद्दीन सिद्दिकी से खास बातचीत की, जहां उन्होंने बॉयोपिक फिल्मों से लेकर विश्व सिनेमा और अपनी बहुचर्चित वेबसीरिज सेक्रेड गेम्स पर खुलकर बातें की। 

    यहां पढ़ें इंटरव्यू से कुछ प्रमुख अंश-

    सेक्रेड गेम्स को इतना पसंद किया गया। आप महीनों चर्चा में रहे। ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद थी?

    सेक्रेड गेम्स को इतना पसंद किया गया। आप महीनों चर्चा में रहे। ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद थी?

    मुझे दरअसल काफी समय बाद पता चला कि सेक्रेड गेम्स को लेकर इतनी चर्चा हो रही है। जब यह रिलीज हुई तो मैं रोम में फिल्म की शूटिंग कर रहा था। मुझे वहीं इस बारे में पता चला क्योंकि एक हफ्ते बाद ही वहां भी रिलीज हो गयी और वहां के लोगों ने भी देखना शुरु कर दिया था। तो मुझे उनके रिस्पॉस से पता चला कि ये इतना पसंद किया जा रहा है। अनुराग (कश्यप) सेक्रेड गेम्स को लेकर शुरु से ही काफी सकारात्मक थे। मैं भगवान का शुक्रिया अदा करता हूँ कि सेक्रेड गेम्स को इतना पसंद किया गया। अब हम उसके दूसरे पार्ट के लिए ज़्यादा उत्साहित हैं।

    लेकिन सेक्रेड गेम्स में निभाये आपके किरदार को इतना पसंद किया गया। खासकर सोशल मीडिया पर तो आप छाए रहे। तो ऐसे में क्या मंटो पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है?

    लेकिन सेक्रेड गेम्स में निभाये आपके किरदार को इतना पसंद किया गया। खासकर सोशल मीडिया पर तो आप छाए रहे। तो ऐसे में क्या मंटो पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है?

    मंटो का तो फ्लेवर ही बिल्कुल अलग है। मुझे लगता है सेक्रेड गेम्स का इसे फ़ायदा ही होगा। जिन लोगों ने वेब सीरीज में पसंद किया है, वो मंटो भी ज़रूर देखना चाहेंगे। उनमें उत्सुकता तो ज़रूर होगी।

    मंटो का किरदार आपके अब तक के निभाए किरदारों में सबसे अलग है। इसके लिए आपने किस तरह से तैयारी की?

    मंटो का किरदार आपके अब तक के निभाए किरदारों में सबसे अलग है। इसके लिए आपने किस तरह से तैयारी की?

    मंटो के लिए सबसे जरूरी था कि आप उस किरदार के लिए कितने ईमानदार हो सकते हैं। यहां कोई method काम नहीं करेगा। मंटो के लिए अपने काम के प्रति सच्चाई चाहिए थी, वह आपकी आंखों में दिखना चाहिए। तभी यह किरदार विश्वनीय लगेगा। मैंने उनकी कहानियां पढ़ी है। नाटक भी किया है। दरअसल, थियेटर वाले कलाकारों के बीच मंटो हमेशा चर्चा का विषय रहे हैं।मैंने सादत हसन मंटो की तरह जितना संभव हो सका उतना शांत और नियंत्रित रहने की कोशिश की।

    मंटो अपनी कहानियों में समाज की सच्चाई दिखाते थे। आपको लगता है कि आज के समय में भी सच्चाई को ऊपर लाना मुश्किल है?

    मंटो अपनी कहानियों में समाज की सच्चाई दिखाते थे। आपको लगता है कि आज के समय में भी सच्चाई को ऊपर लाना मुश्किल है?

    सच्चाई को हर दौर में दबाया जाता रहा है क्योंकि समाज सच्चाई से डरती है। लोगों को एक्सपोज़ होने का डर होता है। यह जो समाज है वह हम लोगों ने झूठ के बुनियाद पर ही खड़ी की है इसीलिए जब कभी सच्चाई की बात होने लगती है तो सबसे ज्यादा कड़वाहट समाज को लगती है।

    नंदिता दास से जब हमने बात की थी तो उन्होंने कहा था कि नवाज की आंखों में भी संघर्ष दिखता है इसीलिए वह मंटो के किरदार में इतनी सादगी से ढ़ल गए। आप अपने संघर्ष के बारे में कुछ बताना चाहेंगे?

    नंदिता दास से जब हमने बात की थी तो उन्होंने कहा था कि नवाज की आंखों में भी संघर्ष दिखता है इसीलिए वह मंटो के किरदार में इतनी सादगी से ढ़ल गए। आप अपने संघर्ष के बारे में कुछ बताना चाहेंगे?

    मुंबई आने के बाद 12 साल तक मेरे पास कुछ काम नहीं था। तो हां, संघर्ष तो खूब रहा है। लेकिन दुख इस बात का होता था कि इतना अभिनय किया है, इतनी ट्रेनिंग ली है, थियेटर किया है, फिर भी काम नहीं मिल रहा है। कोई पूछ ही नहीं रहा यहां। हर तरफ से रिजेक्शन मिलता था। तो ऐसे में 12 सालों तक खुद को विश्वास से भर कर रखना भी एक संघर्ष ही था।

    आपने एक इंटरव्यू में कहा कि मेरा संघर्ष अभी भी खत्म नहीं हुआ है। तो अभी आपके सामने किस तरह के संघर्ष हैं?

    आपने एक इंटरव्यू में कहा कि मेरा संघर्ष अभी भी खत्म नहीं हुआ है। तो अभी आपके सामने किस तरह के संघर्ष हैं?

    अभी मेरा संघर्ष मेरे किरदारों को लेकर रहता है। मैं superficial स्तर पर फिल्में नहीं करता कि जो टॉपिक चलन में है.. उसपर एक साल में पांच फिल्में कर लो तो दो तो हिट हो ही जाएंगी। बॉक्स ऑफिस के लिए मुझे फिर अलग तरह की फिल्में करनी होगी। मैं हर किरदार, हर फिल्म को लेकर ईमानदार रहना चाहता हूं।

    बॉयोपिक फिल्में करना कितना चैलेंजिंग रहता है?

    बॉयोपिक फिल्में करना कितना चैलेंजिंग रहता है?

    यदि बॉयोपिक को सही ढ़ंग से बनाया जाए तो यह आसान नहीं है। इसमें कई तरह से चैलेंज आते हैं। यहां तो यदि किसी मोटे आदमी की बॉयोपिक करनी हो तो 6 पैक एब्स लेकर भी फिल्म बना लेते हैं। तो वह कहां से बॉयोपिक हुई। मंटो हो या ठाकरे हो, इसके लिए लुक्स पर इनसे जैसे हाव भाव लाने के लिए बहुत मेहनत करना पड़ा था।

    बॉयोपिक में यदि आप थोड़ा भी ज्यादा करो तो वह mimicry लग सकती है। यहां आपको किरदार को सिर्फ एक एटिट्यूड देने की जरूरत होती है। ठाकरे के लिए मैंने मराठी सीखी, मैंने बाला साहेब ठाकरे की कितने ही वीडियो देख डाले हैं।

    एक तरफ आप पुलिस अफसर भी बनते हैं, तो दूसरी तरफ गैंगस्टर भी- तो क्या आप प्लान करके ऐसे किरदारों का चुनाव करते हैं?

    एक तरफ आप पुलिस अफसर भी बनते हैं, तो दूसरी तरफ गैंगस्टर भी- तो क्या आप प्लान करके ऐसे किरदारों का चुनाव करते हैं?

    हां, बिल्कुल मैं काफी सोच समझकर ये फैसला लेता हूं। शायद लोगों को लगे कि मैं सिर्फ बैक टू बैक फिल्में करता जाता हूं। लेकिन ऐसा नहीं है। जैसे मंटो और ठाकरे बॉयोपिक फिल्में हैं, इसके बाद लगातार 3 से 4 फिल्में मेरी लव स्टोरी हैं। एक हनी त्रेहन की फिल्म है- रात अकेली है, फिर एक फिल्म अथिया शेट्टी के साथ है.. इनके अलावा और दो फिल्में हैं।

    मंटो विवादों के घेरे में भी रहे थे, साथ ही उनका स्वभाव भी विरोधाभाषी था। ऐसे में फिल्म में क्या नकारात्मक पहलूओं को भी दिखाया गया है?

    मंटो विवादों के घेरे में भी रहे थे, साथ ही उनका स्वभाव भी विरोधाभाषी था। ऐसे में फिल्म में क्या नकारात्मक पहलूओं को भी दिखाया गया है?

    जी बिल्कुल, हमने यह सोच कर फिल्म नहीं बनाई है कि इसमें सिर्फ अच्छा अच्छा ही दिखाना है। हमने मंटो को महान नहीं दिखाया है। मंटो एक इंसान थे और इंसान से गलतियां भी होती हैं।

    इस तरह की बॉयोपिक फिल्मों को कई बार रिलीज से पहले ही नॉन कमर्शियल टैग दे दिया जाता है। आपको लगता है कि इससे दर्शक बंट जाते हैं?

    इस तरह की बॉयोपिक फिल्मों को कई बार रिलीज से पहले ही नॉन कमर्शियल टैग दे दिया जाता है। आपको लगता है कि इससे दर्शक बंट जाते हैं?

    सच कहूं तो ये सिर्फ हिंदुस्तान में ही होता है। बाकी देशों में एक फिल्म या तो अच्छी होती है या बुरी होती है। यहां तो कई तरह के वर्ग बनाकर रखे गए हैं। मुझे खुद unconventional हीरो का टैग दे दिया गया है। जबकि मैं अन्कंवेशनल कैसे हुआ जब भारत में 90 प्रतिशत लोग मेरी तरह ही लगते हैं। मैं ही कंवेन्शनल हूं.. अन्कवेन्शनल तो बाकी हुए ना फिर।

    आपकी किताब को लेकर काफी विवाद हो गया था। लेकिन यदि भविष्य में कभी आपके ऊपर कोई बॉयोपिक बनाना चाहे तो क्या आप राज़ी होंगे?

    आपकी किताब को लेकर काफी विवाद हो गया था। लेकिन यदि भविष्य में कभी आपके ऊपर कोई बॉयोपिक बनाना चाहे तो क्या आप राज़ी होंगे?

    जी किताब तो मैंने वापस ले लिया था। मुझसे गलती हो गई थी कि मैंने उसमें दो नाम डाल दिये थे। लेकिन मुझे अफसोस सिर्फ इस बात है कि उस किताब में 209 पेज थे, 4 पन्नों पर मैंने रिलेशनशिप की बात की थी। लेकिन उन्हीं 4 पन्नों ने विवाद खड़ी दी, जबकि बाकी के 205 पन्नों पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया। उन 205 पेज में ये था.. जो मैं आज हूं। कैसे मैं गांव से शहर आया, कैसे हमने ट्रेनिंग ली, कैसे दुनिया से जूझा, कैसे वर्ल्ड सिनेमा को समझा, कैसे एक्सपोज़र मिला, कैसे मैं एक्टर बना। मैं अच्छा, बुरा जैसा भी एक्टर हूं, लेकिन उस किताब में वही था कि मैं कैसे यहां तक पहुंचा। उसमें मैंने मेथड एक्टिंग की बात थी। बकायदा प्रक्रिया लिखी थी। वह कितने लोगों के काम आ सकती थी। लेकिन मीडिया ने उन चार पन्नों पर हंगामा मचा कर मुझे मजबूर कर दिया कि मुझे किताब मार्केट से वापस लेनी पड़ी। अब मैंने सोचा है कि मैं एक और किताब लिखूंगा, उसमें सब झूठी बातें होगी लेकिन सब लोग पढ़ेंगे उसको।

    जहां तक बॉयोपिक फिल्म की बात है, तो फिलहाल मैं अभी खुद को उस लायक नहीं मानता हूं।

    कह सकते हैं कि आप अभी भी बॉलीवुड की ग्लैमरस दुनिया से दूर रहते हैं?

    कह सकते हैं कि आप अभी भी बॉलीवुड की ग्लैमरस दुनिया से दूर रहते हैं?

    मैं फिल्मी नहीं हूं। मैं फिल्में जरूर करता हूं लेकिन फिल्मी नहीं हूं। ना मैं होना चाहता हूं। फिल्मों से अलग भी मेरी दुनिया है। मैं फिल्मी लोगों से, अवार्ड एक्शन, इवेंट.. ये सबसे भी दूर रहता हूं। जैसे मैं नंदिता दास के साथ भी रहता हूं तो हम दोनों काफी अलग बातें करते हैं, जो बिल्कुल बॉलीवुड से जुड़ी नहीं होती।

     कान्स फिल्म फेस्टिवल में भी मंटो की स्क्रीनिंग हुई थी। जहां फिल्म को काफी तारीफ मिली। क्या आप मानते हैं कि फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा बनने से, वहां मिली तारीफों से बाद में फिल्म को फायदा मिलता है?

    कान्स फिल्म फेस्टिवल में भी मंटो की स्क्रीनिंग हुई थी। जहां फिल्म को काफी तारीफ मिली। क्या आप मानते हैं कि फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा बनने से, वहां मिली तारीफों से बाद में फिल्म को फायदा मिलता है?

    मुझे लगता है फेस्टिवल में वही फिल्म जाती है जो बकायदा उसके लायक होती है। मंटो को भी कान्स में तारीफ मिली क्योंकि लोगों ने कहीं ना कहीं फिल्म में वो बात देखी होगी। सभी ने अच्छे रिव्यू दिये हैं। लेकिन असल डर तो यहां लगता है। जब यहां पर फिल्म रिलीज होगी, तो जो बाकी क्रिटिक हैं यहां के, चंद समीक्षकों को छोड़कर जो वाकई अपना काम जानते हैं.. बाकी के क्रिटिक कहीं इसकी बैंड ना बजा दें। आजकल के so- called क्रिटिक जो हैं ना वो सिनेमा खत्म कर रहे हैं। जैसे रमन राघव को हर जगह पसंद किया गया, लेकिन जैसे ही यहां रिलीज हुई समीक्षकों ने इतनी बुराई लिख दी, छोटी फिल्म थी तो कोई देखने ही नहीं आया उस फिल्म को। अब समीक्षक छोटे बजट के सिनेमा को सहयोग नहीं देंगे तो वह खत्म हो जाएगा। इधर से डिजिटल आ रहा है, दूसरी तरफ से हॉलीवुड फिल्में.. अगर आप सपोर्ट नहीं करोगे तो कहां जाएगा हमारा सिनेमा। साउथ में भी इस तरह की निगेटिविटी नहीं है।

    English summary
    Nawazuddin Siddiqui in an interview with Filmibeat shared his experinece of working in film Manto. And talked about small budget unconventional cinema.

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