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    अभी तो मैं जवान हूं: मिथुन चक्रवर्ती

    By Staff
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    पीएम तिवारी

    बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए विशेष

    मृणाल सेन की फ़िल्म 'मृगया" से अपने फ़िल्मी करियर का आगाज़ करने वाले जाने-माने अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती ने 30 वर्षों से भी लंबे अपने सफ़र में भले 300 ज्यादा फ़िल्मों में अभिनय किया हो, वे खुद को अभी जवान ही मानते हैं. अपने अभिनय के लिए तीन-तीन राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले मिथुन कहते हैं कि वे हर बीतते दिन के साथ और जवान हो रहे हैं.

    'डिस्को डांसर" और 'डांस डांस" जैसी फ़िल्मों से नई ऊंचाइयां छूने वाले मिथुन चाहते हैं कि किसी भी कलाकार को इतनी बाधाएं और मुसीबतें नहीं झेलनी पड़े जितनी उन्होंने इस मुकाम तक पहुंचने के लिए झेली हैं. इस अभिनेता का हालिया फ़िल्म 'शुकनो लंका" पहली ऐसी बांग्ला फ़िल्म थी जिसे पूरे देश में एक साथ रिलीज़ किया गया. मुलाकात में इस अभिनेता ने अपने खट्ठे-मीठे अनुभवों के बारे में बातचीत की. पेश हैं उसके प्रमुख अंश-

    आपने 'मृगया" जैसी फ़िल्म से अपना करियर शुरू किया था. लेकिन उसके बाद वर्षों गुमनामी के अंधेरे में डूबे रहे. इसकी क्या वजह थी?

    हां, वह दौर बहुत बुरा रहा. मेरे अभिनय की सराहना करते हुए काम का भरोसा तो सभी देते थे. लेकिन कोई काम नहीं देता था. लोग कला फ़िल्मों के अभिनेताओं की प्रशंसा तो करते हैं. लेकिन उनको मुख्यधारा की फार्मूला फ़िल्मों में काम नहीं देना चाहते.

    अगर आज के दौर में आपको 'मृगया" जैसी फिल्म का आफर मिले तो क्या करेंगे?

    मैं बेहिचक इसके लिए हामी भर दूंगा. लेकिन अब ऐसी फिल्में बनती ही कहां हैं.

    कहा जाता है कि अपने करियर के शीर्ष पर रहते हुए आपने कई ऐसी फ़िल्में भी हाथ में ले लीं जिनसे आपकी छवि को नुकसान पहुंचा?

    मैंने कम बजट वाली कुछ फ़िल्मों में काम ज़रूर किया था. लेकिन इसी आधार पर उनको ए ग्रेड या बी ग्रेड का दर्जा नहीं दिया जा सकता. फ़िल्म निर्माण का अर्थशास्त्र की समझ नहीं रखने वाले अभिनेता का फ्लाप होना तय है. मैंने अपनी हालत का अंदाजा लगाने के लिए उन फ़िल्मों को हाथ में लिया था. लेकिन उन तमाम छोटी, बड़ी या फ्लाप फ़िल्मों की वजह से ही मैं आज इस मुकाम तक पहुंचा है.

    तीन दशक पहले के मुकाबले अब फ़िल्मोद्योग में कैसे बदलाव हुए हैं?

    तकनीकी तौर पर चीजें पहले के मुक़ाबले बेहतर हुई हैं. अब गलाकाटू होड़ है इस उद्योग में. मीडिया भी काफी सक्रिय है. इसलिए अब कोई भी कलाकार सोच-समझ कर ही फ़िल्में हाथ में लेता है. वह ग़लत क़दम उठाने का जोखिम नहीं उठा सकता.

    अब कला फिल्में कम बन रही हैं. इसकी क्या वजह है?

    आज के समय में बहुत कम निर्माता-निर्देशक कला फ़िल्में बनाते हैं. दरअसल कला फ़िल्मों को बनाने के बाद उनको न तो बाज़ार में जगह मिलती है और न ही वितरक उनको लेने के लिए आगे आते हैं. इसलिए आजकल निर्माता इस तरह की फ़िल्मों पर पैसा लगाने का जोखिम नहीं उठाते. मैं तो हमेशा ऐसी फ़िल्मों में काम करना चाहता हूं. लेकिन ऐसे मौक़े कम ही मिलते हैं.

    आपने हिंदी फिल्मों में डांस को एक नई पहचान दी थी. क्या अब भी आप डांस करते हैं?

    यह मेरा पहला प्यार है. मेरे लिए डांस करना पूजा की तरह है. मैं अब भी नियमित रूप से इसका अभ्यास करता हूं. लेकिन अब ज्यादा नहीं कर पाता.

    'शुकनो लंका" की कहानी को आपकी आपबीती कहा जा रहा है?

    ऐसा नहीं है. मैंने इस फ़िल्म में एक जूनियर कलाकार की भूमिका निभाई है. उसके संघर्ष की कहानी मुझे अपने संघर्ष के दिनों की याद दिलाती है. लेकिन यह मेरी कहानी नहीं है. यह एक आम आदमी की कहानी है जो सपने देखता है और उनको हकीकत में बदलने के लिए संघर्ष करता है.

    आगे क्या योजनाएं हैं?

    मैं देश में तमाम क्षेत्रीय भाषाओं में बनने वाली फ़िल्मों में काम करना चाहता हूं.

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