INTERVIEW: दिल चाहता है, लक्ष्य, रॉक ऑन, तूफान, हर फिल्म ने मुझमें कुछ बदला है- फरहान अख्तर
फरहान अख्तर फिल्म इंडस्ट्री के उन नामों में हैं जिन्होंने आते ही दर्शकों के दिल में जगह बना ली थी। बतौर डायरेक्टर, एक्टर, सिंगर, राइटर उन्होंने अपने काम से सिनेमाप्रेमियों को काफी इंप्रेस किया है। यही वजह है कि उनकी आने वाली फिल्मों का भी लोगों को बेसब्री से इंतजार रहता है।
फरहान अख्तर अपनी लेटेस्ट फिल्म 'तूफान' के साथ दर्शकों के सामने आने के लिए तैयार हैं। राकेश ओमप्रकाश मेहरा के निर्देशन में बनी यह फिल्म एक बॉक्सर की कहानी कहती है। फिल्म की रिलीज से पहले फरहान अख्तर ने मीडिया से खास बातचीत की, जहां उन्होंने अपने किरदारों की तैयारी करने से लेकर ओटीटी और थियेटरों के बीच बड़े अंतर पर अपने विचार रखे।

'तूफान' भारत में और 240 देशों व क्षेत्रों में 16 जुलाई, 2021 से अमेज़न प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम होगी। थियेटर और ओटीटी पर बात करते हुए फरहान अख्तर ने कहा, "एक इंसान के तौर पर हमें सोशल होना अच्छा लगता है। थियेटर में जाकर फिल्म देखना एक कम्युनिटी एक्सपीरियंस है, जैसे कि मेले में जाना, स्टेडियम में जाकर फुटबॉल देखना, म्यूजिक कॉन्सर्ट में जाना। थिएटर के इस अनुभव को हम ओटीटी के जरीए घर पर कभी रिप्लेस नहीं कर सकते.."
वहीं, फिल्मीबीट के खास सवाल पर जवाब देते हुए अभिनेता ने राकेश ओमप्रकाश मेहरा के साथ दोबारा जुड़ने पर बातें की। फरहान ने बताया कि 'तूफान' की कहानी उनके जे़हन से निकली है और वो चाहते थे कि इसे राकेश ही डायरेक्ट करें।
यहां पढ़ें इंटरव्यू से कुछ प्रमुख अंश-

सवाल: फिल्म की पहली झलक के बाद से ही आपके बॉडी ट्रांसफॉर्मेशन की काफी चर्चा हो रही है। ये कितना आसान या मुश्किल रहा?
जवाब: दिमाग में एक ही बात थी कि जब रिजल्ट अच्छी चाहिए तो मेहनत तो करनी ही पड़ेगी। एक तो होता है कि स्क्रीन पर बॉडी अच्छी लगे, दूसरा मैं चाहता था कि लोग जब फ़िल्म देखें तो उन्हें लगे कि हां इस बंदे को बॉक्सिंग आती है। ये बॉक्सर बन चुका है। शायद कुछ लोग हों, जिनके लिए थोड़ा ऊपर नीचे चल जाएगा, लेकिन बॉक्सिंग कम्यूनिटी के लोग भी इसे देखेंगे, मैं उन्हें रिप्रेजेंट कर रहा हूं इस फ़िल्म में, तो मैं चाहता था कि चाहे जितनी मेहनत करनी पड़े, उन्हें मेरा काम सच्चा लगे। मैं हफ्ते में 6 दिन, और हर दिन 5 घंटे की ट्रेनिंग कर रहा था। और 8 महीने तक ये सिलसिला चला। उसके बाद ही हमने शूटिंग शुरू की। तो जब तक शूटिंग का टाइम आया, मैं एक बॉक्सर की तरह ही महसूस कर रहा था। एक बॉडी लैंग्वेज खुद ब खुद आ जाता है, वो एक्टिंग नहीं होती है।

सवाल: कह सकते हैं कि ये फिल्म आपके लिए चैलेंजिंग रही?
जवाब: बिल्कुल, ये एक बहुत चैलेंजिंग रोल था और जब भी एक आर्टिस्ट के तौर पर ऐसे रोले सामने आते हैं, तो आप कोशिश करते हैं कि इसे अपना सब कुछ देने में कोई कसर न छोडूं। एक कलाकार के तौर पर ऐसे किरदार आपको खुशी देते हैं। आपको अपने काम के बारे में अच्छा महसूस कराते हैं। मैं उम्मीद करता हूं कि आने वाले समय में भी ऐसे किरदार मेरे सामने आते रहें।

सवाल: आपकी फिल्म ओटीटी पर रिलीज हो रही है। एक रचनात्मक व्यक्ति के तौर पर बड़ी स्क्रीन के अनुभव को कितना मिस करते हैं?
जवाब: एक अपना अनुभव है सिनेमा का, जिसे ओटीटी रिप्लेस नहीं कर सकती है। और ये सिर्फ जो हम पर्दे पर देखते हैं, उस तक सीमित नहीं है। एक इंसान के तौर पर हमें सोशल होना अच्छा लगता है। हम मेले में जाएं, स्टेडियम में जाकर फुटबॉल देखें, म्यूजिक कॉन्सर्ट में जाएं, ये एक कम्युनिटी एक्सपीरियंस जो है, वो हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। थिएटर की ये बात हम घर पर रिप्लेस नहीं कर सकते। लेकिन घर पर आप अपने परिवार के साथ, अपने सुविधा अनुसार समय निकाल कर फ़िल्म देख सकते हो। जितने बार चाहे, उतनी बार देख सकते हो, बिना टिकट के दाम की चिंता किये।

सवाल: 'भाग मिल्खा भाग' के बाद आप एक बार फिर राकेश ओमप्रकाश मेहरा के साथ जुड़े हैं। दर्शकों की उम्मीद भी बढ़ चुकी है। फिल्म साइन करते वक्त आपको इस कहानी की किस बात ने आकर्षित किया?
जवाब: मैं थोड़ा पीछे जाकर बताना चाहूंगा कि ये फ़िल्म शुरू कैसे हुई। दरअसल ये जो कहानी है, ये मेरे ज़ेहन से निकली है। मेरे दिमाग में एक आईडिया था, तो मैं अंजुम राजाबली, जो एक स्क्रीनराइटर हैं, उनसे संपर्क किया और बताया कि ये एक आईडिया है, मैं चाहता हूं कि हम इस पर कुछ करें। तो उन्होंने ये आईडिया लिया और इसे एक कहानी का रूप दिया, उन्होंने पूरी पटकथा तैयार की। जब वो हमें अच्छी लगी तो मैं उसे लेकर राकेश के पास गया। मुझे लगा वही एक है, जो इसे पर्दे पर अच्छे से ला सकता है। बता दूं, यहां "भाग मिल्खा भाग" के बिल्कुल उलट सिचुएशन था। उस फिल्म के दौरान वो कहानी लेकर मेरे पास आये थे, 20 मिनट में कहानी सुनाई थी और मैंने हाथ मिलाकर कहा था, चलिये फ़िल्म शुरू करते हैं। वहीं, इस बार मैं गया, और उन्होंने तुरंत कहा कि चलो ये फ़िल्म करते हैं। तो ऐसे शुरू हुई थी फ़िल्म।

सवाल: आपकी फिल्म स्पोर्ट्स पर है और इधर ओलंपिक गेम्स भी शुरु हो रही है। आपको लगता है कि एक स्पोर्ट्स फिल्म खिलाड़ियों को या आम लोगों को प्रेरणा देती है?
जवाब: हमारी कहानियां अगर किसी भी तरह से लोगों को प्रेरित करती है तो ये बहुत खुशी और संतुष्टि की बात होती है। स्पोर्ट्स फ़िल्म खासकर बच्चों के लिए बहुत प्रेरक होती है। स्पोर्ट्स की ओर उनकी दिलचस्पी बढ़ती है। उन्हें ये सीख मिलती है कि ज़िन्दगी में संघर्ष होना ही होना है। ज़िन्दगी में भी हम कभी हारेंगे, कभी जीतेंगे, जैसे स्पोर्ट्स में होता है। यदि आपमें खेल भावना है तो आप ज़िंदगी में हमेशा आगे बढ़ेंगे। आप हार कभी नहीं मानोगे। और मुझे खुशी है कि हमारी फ़िल्म ओलंपिक के समय रिलीज़ हो रही है, हमने ऐसा खैर प्लान तो नहीं किया था। हमारी फ़िल्म पिछले साल अक्टूबर में ही आने वाली थी। लेकिन ऐसे मौके पर मैं बोलना चाहूंगा कि जो भी हमारे एथलिट हैं जो टोक्यो जा रहे हैं, आप मैडल जीतेंगे या नहीं जीतेंगे, हम सबको आप पर बहुत बहुत ज़्यादा गर्व है। मैडल जीतना आपके स्किल के अलावा भी, कई तरह के फैक्टर्स पर निर्भर करता है। ओलिंपिक तक पहुंचना भी बहुत बड़ी बात होती है। आप हमारे लिए हीरो हो।

सवाल: आपने कहा कि तूफान जैसा किरदार काफी चैलेंजिंग होता है, जिसके लिए आपने महीनों मेहनत की। तो इस तरह के किरदारों से क्या आपकी सोच में या आप खुद में भी कोई बदलाव पाते हैं?
जवाब: मुझे लगता है कि हर अनुभव हमें थोड़ा बदलता है। जब हम किसी अनजान से पहली बार मिलते हैं, फिर दोस्त बनते हैं.. तो भी हम कुछ बदलते हैं। कुछ नया सीखते हैं। जब हम किसी को खोते हैं, तो उनके जाने से हममें कुछ बदलाव आता है। उसी तरह चाहे वो 'दिल चाहता है' हो, 'लक्ष्य' हो, 'रॉक ऑन', 'ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा', या 'तूफान' हो.. हर फिल्म का अनुभव मुझमें थोड़ा बदलाव लाता है। आप फिल्मों से ज़िंदगी के बारे में सीखते हैं, सभी अनुभवों को मिलाकर ही आज मैं जो हूं, वो हूं।

सवाल: आप एक्टर होने के साथ साथ एक डायरेक्टर भी हैं। शूटिंग के वक्त अपने अंदर के डायरेक्टर को शांत रख पाते हैं?
जवाब: सच कहूं तो जब भी मैं किसी डायरेक्टर के साथ बतौर एक्टर काम करता हूं तो एक चीज़ मेरे ज़ेहन में बहुत क्लियर होती है कि कैप्टेन ऑफ द शिप डायरेक्टर ही हैं , राकेश हो या ज़ोया हो। और ये बहुत ज़रूरी है क्योंकि जो विज़न उनके पास है कहानी को लेकर, वो मुझसे ज़्यादा है। मैं चाहता हूं कि मैं पूरी तरह सिर्फ उनकी सोच से जुड़ जाऊं और जिस तरह से वो अपनी कहानी दर्शकों के सामने लाना चाहते हैं, मैं उसका हिस्सा बन सकूं। एक निर्देशक के काम के लिए मेरे दिल में बहुत इज़्ज़त है और मैं पूरी तरह उन पर भरोसा करता हूं।


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