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    Exclusive Interview: "खुशी होती है, लोगों ने अच्छे काम के लिए थोड़ा तवज्जो देना शुरु किया है"

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    दूरदर्शन के चर्चित कार्यक्रम "मुंगेरीलाल के हसीन सपने" से लेकर सलाम बॉम्बे, न्यूटन, लगान, पीपली लाइव जैसी प्रभावी फिल्मों का हिस्सा रहे अभिनेता रघुबीर यादव ने अपने सधे हुए अभिनय के साथ दर्शकों के दिल और दिमाग में एक खास जगह बनाई है। फिल्म इंडस्ट्री में तीन दशक से ज्यादा का वक्त गुज़ार चुके अभिनेता कहते हैं, "मैं सिर्फ सीखने के मकसद से इंडस्ट्री में काम कर रहा हूं। टेलीविजन में, फिल्मों में, कहीं भी काम कर लूं, अंदर एक ललक बरकरार रहती है।"

    अभिनेता ने 2020 में अमेज़न प्राइम के चर्चित वेब सीरिज "पंचायत" के साथ ओटीटी पर भी डेब्यू किया है, जिसे बेहद सराहा जा रहा है। वहीं, अब ज़ी 5 पर आई फिल्म "घूमकेतु" में नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ अहम किरदार निभाते नजर आ रहे हैं। मनोरंजन उद्योग की मौज़ूदा स्थिति पर बात करते हुए उन्होंने कहा, खुशी होती है कि लोगों ने अच्छे काम के लिए थोड़ा सा तवज्जो देना शुरु किया है।

    फिल्म 'घूमकेतु' ज़ी 5 पर स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध है। इस मौके पर फिल्मीबीट ने रघुबीर यादव से खास बातचीत की, जहां उन्होंने अपने तीन दशक लंबे करियर के साथ साथ नवाजुद्दीन के साथ काम करने का अनुभव और ओटीटी डेब्यू पर खुलकर बातें की।

    यहां पढ़ें इंटरव्यू से कुछ प्रमुख अंश-

    लॉकडाउन में वक्त कैसा गुज़र रहा है?

    लॉकडाउन में वक्त कैसा गुज़र रहा है?

    बड़ा मज़ेदार गुज़र रहा है। मैं संगीत सुनता रहता है, अलग अलग वाद्ययंत्र बजाता रहता हूं। खाना बनाता हूं, घर की सफाई करता हूं। बचपन में जो करते थे, वो सब करने का फिर से मौका मिला है, वो मैं हाथ से नहीं जाने दे सकता। खाना बनाना भी मैं बहुत एन्जॉय करता हूं। जब इन सबसे दिल भरता है तो किताबें निकाल लेता हूं।

    आपने कई फिल्मों में संगीत भी दिया है। हमेशा से संगीत में दिलचस्पी थी?

    आपने कई फिल्मों में संगीत भी दिया है। हमेशा से संगीत में दिलचस्पी थी?

    (हंसते हुए) मैं तो संगीत सीखने ही निकला था, एक्टिंग गले पड़ गई। लेकिन गले पड़ गई तो फिर मज़ा आने लगा। दरअसल जिस पारसी थिएटर से मैं जुड़ा था, वहां बिना संगीत के ज्ञान के आप अभिनय कर ही नहीं सकते थे। इससे एक बात साबित होती है कि आप जो दिल चाहते हैं वो आपको मिल ही जाता है, लेकिन आपका चाहना बहुत ज़रूरी होता है। यदि आप शिद्दत से कोई चीज़ चाहें तो वहां तक पहुंचने का कम से कम रास्ता तो मिल ही जाता है। उस पारसी थिएटर से मुझे ज़िन्दगी का रास्ता मिल गया। वहां मैं संगीत और अभिनय के साथ सारे काम किया करता था, स्टेज लगाना, सजाना, गड्ढ़े खोदना, टेंट लगाना आदि। वहां ऐसा नहीं था कि आप एक्टर हैं तो सिर्फ एक्टिंग ही करेंगे। थिएटर में 6 साल गुज़ारने के बाद फिर मैं एनएसडी (NSD) में आ गया। यहां मेरे संगीत के शौक को और हवा मिली। ऐसा नहीं है कि मैं कोई उस्ताद हूं। शौक है और मुझे उसमें बहुत मज़ा आता है। यदि इस शौक को ज़िंदा ना रखूं तो मैं तो अकेला ही पड़ जाऊं। मुझे लगता है कि यदि आप संगीत से जुड़े हैं तो आप कभी अकेले नहीं पड़ सकते। यह एक नशा है और मैं इसी में डूबा रहता हूं।

    फिल्म घूमकेतु में आप एक अहम किरदार निभा रहे हैं। उसके बारे में कुछ बताएं?

    फिल्म घूमकेतु में आप एक अहम किरदार निभा रहे हैं। उसके बारे में कुछ बताएं?

    घूमकेतु में मैं नवाज़ुद्दीन के पिता का रोल निभा रहा हूं। एकदम खडूस तरह का पिता। उनको ऐसा लगता है कि मैंने जिस तरह की ज़िंदगी जी है, वह बिल्कुल सही है। उनके सामने किसी की नहीं चलती। उनकी एक परचून की दुकान है और वो चाहते हैं कि उनका बेटा भी यही करे। उनका बस चले तो वो दुनिया के सभी लोगों से यही काम करवाएं। लेकिन बेटा वो करना नहीं चाहता। वो लेखक बनना चाहता है।

    हमारे गांव, कस्बों में लोग अभी भी ऐसा ही सोचते हैं कि जो पिता कर रहे हैं, बेटा भी वही करे। असल जीवन में मेरे साथ भी ऐसा ही था। मैं छोटे से गांव का रहने वाला हूं। बचपन में गाय- भैंस चराया करता था। संगीत या अभिनय से तो दूर दूर तक कोई नाता नहीं था। लेकिन वो ज़माना ही बड़ा कला से भरपूर था। ना टीवी था, ना रेडियो, गांव भर में एक दुकान हुआ करती थी, जहां ग्रामोफोन होता था और उसी पर सब संगीत सुना करते थे। रामलीला देखा करते थे और सभी क्या ज़बरदस्त प्रदर्शन करते थे। ऐसे माहौल में रहकर आपको कला से प्यार कैसे नहीं हो सकता! बस यही सब सोच कर मैं गांव से निकल पड़ा। तब से अब तक मैं सीख ही रहा हूं, बड़ा मजा आता है मुझे सीखने में।

    नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ आपने इससे पहले 3 फिल्मों (फिराक, पीपली लाइव, आजा नचले) में काम किया है। कैसा अनुभव रहता है?

    नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ आपने इससे पहले 3 फिल्मों (फिराक, पीपली लाइव, आजा नचले) में काम किया है। कैसा अनुभव रहता है?

    मुझे तो सभी के साथ काम करने में मज़ा आता है। वहीं नवाज़ की तरह कोई थिएटर वाला अभिनेता आ जाता है तो और खुशी होती है। फिर तो ऐसा लगता है कि शूटिंग चलती रहे, यह कभी खत्म नहीं होनी चाहिए।

    फिल्मों में आपने तीन दशक से ज्यादा वक्त गुजारा है। अपने सफर को किस तरह देखते हैं? संतुष्ट हैं?

    संतुष्ट तो नहीं हूं। संतुष्ट हो जाऊंगा तो मैं बर्बाद हो जाऊंगा। जिस दिन मैं संतुष्ट हो जाऊंगा, मेरी तलाश खत्म हो जाएगी। मैं सिर्फ सीखने के मकसद से यहां काम कर रहा हूं। टीवी में, फिल्मों में, कहीं भी काम कर लूं, अंदर एक ललक बरकरार रहती है। हर बार जब अपने काम को देखता हूं तो लगता है कि इससे बेहतर कर सकता था।

    फिल्मों का चुनाव करते समय किन बातों का ध्यान रखते हैं?

    फिल्मों का चुनाव करते समय किन बातों का ध्यान रखते हैं?

    मैं सच कहूं तो उस किरदार का यदि एक लाइन भी मुझे सही मिल जाये ना, सच्चाई भरा, तो फिर मैं फ़िल्म कर लेता हूं। बस मुझे किरदार में सच्चाई दिखनी चाहिए। वो ज़बरदस्ती का बनाया हुआ ना लगे। कुछ किरदारों को अजीब सी ज़ुबान दे दी जाती है, अजीब पहनावा दे दिया जाता है, जो कहीं का है ही नहीं.. सिर्फ लोगों को हंसाने के लिए। तो इस तरह के किरदारों पर मैं भरोसा नहीं करता।

    आपकी फिल्मों में, कौन सा किरदार आपका पसंदीदा है? या किसे निभाने में आपने सबसे ज्यादा एन्जॉय किया?

    बहुत सारे हैं। खासकर थिएटर में बहुत मज़ा आया है मुझे। फिल्मों में कई नाम हैं जैसे, सलाम बॉम्बे या एक फ़िल्म मैंने की थी रमन राघव 1992 में, उसे करने में बड़ा मजा आया था। वहीं मेरी पहली फ़िल्म थी मस्से साहिब, वो बहुत खास थी। लोग कहते रहे कि थिएटर की एक्टिंग अलग होती है, फ़िल्म की अलग। तो बहुत ज़िम्मेदारी लग रही थी। लेकिन उस फिल्म को करते हुए बहुत मज़ा आया।

    आपने एक इंटरव्यू में कहा था कि 'जब कला बिजनेस बन जाती है, तो उसकी आत्मा खो जाती है'। आप बॉक्स ऑफिस या आंकड़ों को नहीं मानते?

    आपने एक इंटरव्यू में कहा था कि 'जब कला बिजनेस बन जाती है, तो उसकी आत्मा खो जाती है'। आप बॉक्स ऑफिस या आंकड़ों को नहीं मानते?

    बिल्कुल ही नहीं, मुझे आज भी लगता है कि कला को बिजनेस बनाते ही उसकी आत्मा खो जाती है। आप कितनी भी कोशिश कर लें, बेईमानी तो आ ही जाती है। आप सिर्फ पैसे लगाने और पैसे कमाने की कोशिश में रहते हैं। हमारे यहां बड़ी बड़ी बजट की फिल्में जो फ्लॉप हो रही हैं, वो क्यों हो रही हैं यह पहली झलक देखकर ही पता लग जाता है। उसमें कोई आत्मा ही नहीं होती है। कला और संस्कृति को पेशा बना लेने की वजह से इसे काफी नुकसान पहुंच रहा है, धीरे धीरे यह खत्म हो रही है। इतने खूबसूरत लोक गीत को मैंने तबाह होते देखा है।

    आपने अभी गाने की बात की, तो जानना चाहेंगे कि गानों के रीमिक्स चलन पर आपकी क्या राय है?

    आपने अभी गाने की बात की, तो जानना चाहेंगे कि गानों के रीमिक्स चलन पर आपकी क्या राय है?

    रीमिक्स के फेवर में तो मैं कभी नहीं रहा। मुझे तो वो समझ में ही नहीं आता है। ऐसा लगता है कि लोगों के पास वक्त नहीं है.. तो जल्दी जल्दी गाने बनाने के चक्कर में रीमिक्स बना डालते हैं। आप किसी ऐसे गाने की रीमिक्स कर रहे हैं, जिसे लोगों ने सुना नहीं है और आप उसे बेहतर बना कर पेश कर रहे हैं, तो कुछ समझ में भी आए। लेकिन ऐसे क्या फायदा है? क्या आप यह जताना चाहते हैं कि पहले वह गाना अच्छा नहीं था, अब देखो मैंने इसे क्या जबरदस्त बना दिया है! अब आप मुझे पुराने विचार वाला कह लो या भी कह लो, मुझे मजा नहीं आता रीमिक्स से।

    आपने टेलीविजन, फिल्मों के बाद अब ओटीटी पर भी अच्छी शुरुआत कर दी है। काम को इतना सराहा जा रहा है। मानते हैं कि कलाकारों के लिए यह अच्छा वक्त है?

    आपने टेलीविजन, फिल्मों के बाद अब ओटीटी पर भी अच्छी शुरुआत कर दी है। काम को इतना सराहा जा रहा है। मानते हैं कि कलाकारों के लिए यह अच्छा वक्त है?

    बिल्कुल, बहुत मौके मिल रहे हैं और एक जो सबसे खूबसूरत बात है कि लोगों ने अच्छे काम के लिए थोड़ा सा तवज्जो देना शुरु किया है। काम करवाने वाले जो लोग हैं अब उनकी भी आंख थोड़ी सी खुली है। पंचायत की बात ही करें, तो यह एक गांव सीधी सादी कहानी है। हमारी फिल्म की कहानियों में तो गांव को बिल्कुल ही भूला दिया गया था। निर्माता- निर्देशक को लगता था कि शहर की कहानियां ही चलती हैं। जबकि हमारा हिंदुस्तान गांवों में ही बसता है। जो वहां का कल्चर है, उस पर हम 200 साल तक भी फिल्में बनाते रहें तो भी वो खत्म नहीं होगा। मैं बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान के छोटे कस्बों में भी रहा हूं। फिल्मों में ज्यादातर गावों, कस्बों की संस्कृति को एकदम देहाती बनाकर बिगाड़ देते हैं। प्रेमचंद जैसे लोकप्रिय लेखक ने गावों पर आधारिक कितनी ही कहानियां लिखी हैं.. वो सब कोई पढे़, जाने.. तब समझ आएगा। फिलहाल मौजूदा स्थिति देखकर मुझे लगता है कि ये अब जो बदलाव आ रहा है, ये बेहतरी की ओर ले जाएगा।

    वेब सीरिज "पंचायत" को लोगों ने इतना पसंद किया है। सफलता एन्जॉय कर रहे हैं?

    बिल्कुल, देखने वाले एन्जॉय कर रहे हैं, इसकी मुझे बहुत खुशी है। मेरे गांव से भी मुझे फोन आया, लोगों ने तारीफ की। मुझे लग रहा है कि हम कामयाब हो गए। जो काम हमने किया, उसे लोग पसंद कर रहे हैं तो लगता है कि मेहनत सफल हो गई।

    'घूमकेतु' फिल्म रिव्यू- 2020 की ईद रिलीज लेकर आ गए नवाजुद्दीन सिद्दीकी

    English summary
    In an exclusive conversation with Filmibeat, actor Raghubir Yadav gets candid about his three decade long journey into films, changing scenario of the industry, debut on OTT and more.
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