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    EXCLUSIVE INTERVIEW: "अपने अभिनय में इरफान जैसी सहजता चाहती हूं, कोशिश जारी है"- यामी गौतम

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    यामी गौतम अभिनीत फिल्म 'अ थर्सडे' डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर रिलीज हुई है। बेहज़ाद खंबाटा के निर्देशन में बनी इस फिल्म में यामी एक ऐसी शिक्षिका की भूमिका निभा रही हैं, जो 16 बच्चों को बंधक बना लेती है और बच्चों की जान के बदले सरकार के सामने कुछ मांग रखती है।

    इस जटिल किरदार के चुनाव और इसे निभाने के बारे में बात करते हुए यामी कहती हैं, "ये रोल निभाना बहुत ही दिलचस्प था और चैलेजिंग भी। मैं इसे अपना 200 प्रतिशत देना चाहती थी। जब आप फिल्म देखेंगे आपको पता चलेगा कि ये सिर्फ एक थ्रिलर नहीं है, बल्कि उससे ज्यादा है। मुझे उम्मीद है कि आप नैना (किरदार का नाम) और उसके सफर से जुड़ा हुआ महसूस करेंगे। हमारी कोशिश यही है कि नैना फिल्म खत्म होने के बाद भी कहीं ना कहीं लोगों के दिमाग में रहे।"

    2012 में आई फिल्म 'विक्की डोनर' से बॉलीवुड में कदम रखने वाली यामी इस अप्रैल हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एक दशक पूरा करने वाली हैं। अपने सफर पर बात करते हुए अभिनेत्री ने साल 2019 को अपने करियर का खास वर्ष बताया, जब उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक और बाला रिलीज़ हुई। उन्होंने कहा- "खुद के टैलेंट पर भरोसा हो तो आप डटे रहते हैं। मुझे यकीन था कि लोगों को मेरी मेहनत मेरे काम में जरूर नजर आएगी और वो हुआ मेरे साथ 2019 में।"

    'अ थर्सडे' की रिलीज के साथ यामी गौतम ने फिल्मीबीट से विशेष बातचीत की है, जहां उन्होंने बॉलीवुड में अपने 10 सालों के सफर पर खुशी जताई है। साथ ही उन्होंने अपनी आगामी फिल्मों के साथ साथ अपने करियर और स्क्रिप्ट के चुनाव को लेकर भी बातें की।

    यहां पढ़ें इंटरव्यू से कुछ प्रमुख अंश-

    अपने किरदार के चुनाव के दौरान किन बातों का ख्याल रखती हैं?

    अपने किरदार के चुनाव के दौरान किन बातों का ख्याल रखती हैं?

    मैं जब भी किसी प्रोजेक्ट को हां करती हूं तो सबसे पहले तो देखती हूं कि कहानी क्या है। फिल्म क्या कहना चाहती है। दूसरा कि मेरा किरदार कितना जरूरी है फिल्म में। कहानी में उसका प्रभाव है। मैंने ऐसे भी रोल किये हैं जो काफी छोटे थे, लेकिन वो कहानी के लिए जरूरी थे। या मुझे लगा कि इसमें मैं कुछ ऐसा परफॉर्म कर सकती हूं कि लोगों को लगे कि हां मैंने कुछ अलग किया है, अच्छा किया है। फिल्म में आपका एक सीन हो, दस सीन हों या पूरी फिल्म आप पर हो, इससे फर्क नहीं पड़ता, लेकिन हां, किरदार का कुछ अर्थ होना चाहिए। तीसरी बात है डायरेक्टर.. मुझे लगता है ये देखना बहुत जरूरी है कि आप किसके साथ काम करना चाहते हैं। क्योंकि वही हैं जो कैनवस पेंट करेंगे। फिल्म, कहानी और किरदार तो हैं ही, लेकिन निर्देशक ही हैं जो उसे आकार देंगे, जो उसे दिखाएंगे। तो उनकी क्या सोच है, उनका क्या तरीका है, ये देखना भी जरूरी है।

    आपके निभाए पिछले कुछ किरदारों को दर्शकों से बहुत प्यार मिला है। आपके अभिनय को सराहा गया है। क्या इन प्रतिक्रियाओं से किरदारों का चुनाव करते समय कॉफिडेंस मिलता है?

    आपके निभाए पिछले कुछ किरदारों को दर्शकों से बहुत प्यार मिला है। आपके अभिनय को सराहा गया है। क्या इन प्रतिक्रियाओं से किरदारों का चुनाव करते समय कॉफिडेंस मिलता है?

    ये बहुत दिलचस्प सवाल है क्योंकि हम हमेशा वैलिडेशन (validation) ही ढूंढ़ते हैं। हम हमेशा चाहते हैं कि लोगों को हमारा काम पसंद आए। हमारा प्रोफेशन ही ऐसा है कि सबकुछ पब्लिक है। अगर आप ये सवाल मुझसे 5 साल पहले पूछतीं तो शायद मेरा जवाब कुछ और होता, लेकिन आज जहां मैं हूं और जिस तरह की फिल्में कर रही हूं, जिस तरीके से सोचती हूं, मुझे लगता है वैलिडेशन से भी ज्यादा कहीं ना कहीं जरूरी है कि हर फिल्म के साथ आप आगे बढ़ें, ग्रो करें।

    ऑडियंस का वो कॉफिडेंस की हां यामी की फिल्म है तो एक बार देखते हैं, कुछ होगा अलग.. तो ये भरोसा बनने में वक्त लगता है। आज यदि मैंने वो भरोसा थोड़ा भी कमाया है, तो वो मुझे कॉफिडेंस देता है। मुझे लगता है कि किसी भी किरदार को यदि आप पूरे पैशन के साथ करते हैं तो वो दर्शकों के दिल तक पहुंचती है और वो मेहनत समझते हैं। मुझे दर्शक ही स्टेप बाई स्टेप वहां लेकर जा रहे हैं, जहां मैं पहुंचना चाहती हूं।

    आपने एक इंटरव्यू में कहा था कि आप अभिनय के उस स्पेस पर पहुंचना चाहती हैं, जहां एक किरदार को निभाते समय आप बिल्कुल स्वाभाविक महसूस करें। आज जब आपके पास इतनी फिल्में हैं, तारीफें मिल रही है; आपको लगता है कि आप उस स्पेस तक पहुंच चुकी हैं या पहुंच रही हैं?

    आपने एक इंटरव्यू में कहा था कि आप अभिनय के उस स्पेस पर पहुंचना चाहती हैं, जहां एक किरदार को निभाते समय आप बिल्कुल स्वाभाविक महसूस करें। आज जब आपके पास इतनी फिल्में हैं, तारीफें मिल रही है; आपको लगता है कि आप उस स्पेस तक पहुंच चुकी हैं या पहुंच रही हैं?

    उम्मीद तो करती हूं। खुद का आंकलन करना थोड़ा मुश्किल होता है। वैसे तो बहुत सारे ऐसे कलाकार हैं लेकिन मुझे लगता है इरफान एक ऐसे अभिनेता हैं; मैं 'थे' नहीं बोलना चाहती उनके लिए; जिन्हें आप किसी भी किरदार में देखिए वो बहुत आसान लगता है। ऐसा लगता है कि वो ऐसे ही हैं। जितना भी कोई भारी किरदार हो, लेकिन वो नैचुरल ही लगता है.. शायद उसे कहते हैं कि to be in the moment. चाहे आपने कितनी भी मेहनत की हो उस रोल पर, लेकिन रोल को एफर्टलेस दिखाना, सहज दिखाना भी एक हुनर है। और उनमें ये एक हुनर था। तो हां, एक कलाकार के तौर पर मैं भी वहां पहुंचना चाहुंगी। मुझे पता है कि वो हुनर लाने में वक्त लगता है, लेकिन कोशिश जारी रहनी चाहिए।

    आने वाली सभी फिल्मों में आप इतने अलग अलग तरह के किरदार निभा रही हैं; लॉस्ट में क्राइम रिपोर्टर, दसवीं में आईएएस अफसर तो एक सामाजिक मुद्दों पर फिल्म बन रही है। ऐसे में अपने किरदार के प्रोसेस पर आप कितना समय दे पाती हैं। किरदार पर काम करना आपके लिए कितना आसाना या मुश्किल रहता है?

    आने वाली सभी फिल्मों में आप इतने अलग अलग तरह के किरदार निभा रही हैं; लॉस्ट में क्राइम रिपोर्टर, दसवीं में आईएएस अफसर तो एक सामाजिक मुद्दों पर फिल्म बन रही है। ऐसे में अपने किरदार के प्रोसेस पर आप कितना समय दे पाती हैं। किरदार पर काम करना आपके लिए कितना आसाना या मुश्किल रहता है?

    बिल्कुल आसान नहीं है, सच में। अच्छा लगता है सुन कर कि आप ये भी फिल्म कर रहे हैं, ये भी कर रहे हैं, ये भी कर रहे हैं। लेकिन जब किरदार पर सोचना शुरु करते हैं तो लगता है कि नहीं मुझे थोड़ा और समय चाहिए, थोड़ी और एकाग्रता चाहिए। मुझे कट टू कट काम नहीं करना है। लेकिन करना पड़ता है, खासकर पिछले दो सालों की वजह से काफी काम बैक लॉग है।

    खैर, मैं सिर्फ अपनी बात करूं तो मेरे लिए ये समय बहुत इंतज़ार के बाद आया है, बहुत मेहनत के बाद आया है, बहुत धैर्य के बाद आया है। तो मैं अब इस अवसर का पूरा इस्तेमाल करना चाहती हूं। मेरे लिए ये एक चैलेंज है। मैं हर किरदार के लिए होमवर्क करती हूं, नोट्स बनाती हूं, जितना समय मिलता है उसी में करती हूं, लेकिन करती हूं, वो मेरे लिए जरूरी है। मुझे लगता है कि ये ऐसी फिल्में नहीं हैं, जहां मैं बस उठकर सेट पर चली जाऊं। मैं इस प्रोसेस पर विश्वास करती हूं, मुझे नहीं लगता कि मैं बिना होमवर्क एक फिल्म से दूसरी फिल्म में जा सकती हूं क्योंकि दर्शकों को कोई लेना- देना नहीं कि एक्टर कितनी बिजी थी, या वो बीमार थी, या उसने शादी कर ली या बीच में लॉकडाउन हो गया। वो सिर्फ फिल्म देखना चाहते हैं।

    मुझे याद है मैं कलकत्ता में लॉस्ट की शूटिंग कर रही थी और अगली फिल्म जो मैं शूट करने वाली थी, वो ओह माई गॉड थी। मेरे डायरेक्टर कह रहे थे कि मैं आपके साथ बैठ भी नहीं पाया हूं अभी तक, मैं आ जाऊं कलकत्ता? लेकिन मैंने उन्हें कहा कि अभी जो मैं शूट कर रही हूं वो भी चैलेंजिंग फिल्म है, तो मैं अभी अपना 100 प्रतिशत फोकस इस पर ही रखना चाहती हूं। मैंने उन्हें विश्वास दिलाया कि ओह माई गॉड की शूटिंग शुरु होने से पहले हमारे पास जितने भी दो- चार दिन हैं, मैं वादा करती हूं मैं बिना तैयारी किये नहीं आऊंगी, मैं मैनेज कर लूंगी। तो मेरा प्रोसेस तो फ्लाइट से ही शुरु हो गया था। मुझे याद है शूटिंग के पहले दिन सीन खत्म होने के बाद डायरेक्टर एकदम खुश थे कि हां आपने सही कहा था, आप बिना तैयारी किये नहीं आएगीं।

    जिस तरह की किरदार और कहानियां आज फीमेल कलाकारों के लिए लिखे जा रहे हैं, आप उसे एक पॉजिटिव बदलाव की तरह देखती हैं?

    जिस तरह की किरदार और कहानियां आज फीमेल कलाकारों के लिए लिखे जा रहे हैं, आप उसे एक पॉजिटिव बदलाव की तरह देखती हैं?

    हां, बिल्कुल। और इसीलिए मुझे लगता है आज हमें एक दूसरी की सफलता को सेलिब्रेट करना चाहिए। जो भी अभिनेत्रियां अच्छी फिल्में कर रही हैं उनको जरूर उन्हें शुभकामनाएं देनी चाहिए और अच्छा महसूस करना चाहिए क्योंकि अंत में सभी आगे बढ़ रहे हैं। मतलब कि और रोल लिखे जा रहे हैं, डायरेक्टर्स हम पर भरोसा जता रहे हैं। चाहे फीमेल एक्टर मेनलीड हो या सहयोगी भूमिकाओं में हो या सिर्फ दो सीन के लिए ही हो, लेकिन जो करें उसके कुछ मायने हों।

    आज जब मैं देख रही हूं, जिस तरह के काम मेरे साथ के कलाकार कर रहे हैं, कुछ सीनियर्स कर रहे हैं.. मुझे बहुत खुशी होती है क्योंकि हर कोई रास्ता बना रहा है एक दूसरे के लिए। एक समय पर होता था कि यदि अभिनेत्री ने शादी कर ली, तो उसका करियर खत्म। तो हां, वक्त तो बदल रहा है। सिर्फ एक एक्टर या एक दिन का प्रोसेस नहीं है ये.. इस पर सालों से काम चल रहा है। 50 और 60 के दशक से कुछ बहुत दमदार अभिनेत्रियां रही हैं, जिन्होंने ऐसे ऐसे किरदार निभाए हैं जो आज भी लोग याद करते हैं। आज भी देंखे तो विद्या बालन हैं, कंगना, प्रियंका, सान्या, तापसी, आलिया हैं.. जो कितना अच्छा काम कर रही हैं। हर कोई आगे बढ़ने के लिए मेहनत कर रहा है।

    अप्रैल में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में आपके 10 साल पूरे होने वाले हैं। आज जब आपके हाथों में पांच से छह फिल्में हैं, अच्छे किरदार हैं; इस सफर को लेकर कैसा महसूस करती हैं?

    अप्रैल में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में आपके 10 साल पूरे होने वाले हैं। आज जब आपके हाथों में पांच से छह फिल्में हैं, अच्छे किरदार हैं; इस सफर को लेकर कैसा महसूस करती हैं?

    सच बोलूं तो मुझे महसूस ही नहीं है कि 10 साल पूरे हो चुके हैं। पिछले दो सालों का तो कोई हिसाब ही नहीं है, पलक झपकते चले गए। लेकिन जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं तो आगे बढ़ते रहने के महत्व को समझती हूं। अच्छी नीयत के साथ आगे बढ़ते रहना, मेरे लिए लाइफ में ये सबसे जरूरी है।

    खुद पर आत्मविश्वास होना अच्छा लगता है। मैं इसी विश्वास के साथ इंडस्ट्री में आई थी। यहां बहुत तरह के अनुभव मिले। उतार- चढ़ाव तो हर क्षेत्र का, हर किसी की जिंदगी का हिस्सा है। मेरा भी रहा है। लेकिन मुश्किलों से आप क्या सीखते हैं और कैसे आगे बढ़ते हैं, ये आपको एक दूसरे से अलग बनाता है। मैं सिर्फ इसी सोच के साथ आई थी मुझे अच्छा काम करना है। आज मुझे अपने सफर पर खुशी है।

    मैं उन निर्देशकों का आभार मानती हूं, जिन्होंने मुझपर भरोसा जताया। अच्छा लगता है जब फैंस प्यार देते हैं। मुझे याद है मीडिया से कई साथी मुझे कहते थे कि आप कम फिल्में करती हैं, हम आपको स्क्रीन पर और देखना चाहते हैं। उन्हें लगता था कि मैं बहुत सेलेक्टिव हूं। अब मैं उन्हें क्या बताती.. कि सही स्क्रिप्ट आए तब तो सेलेक्ट करूंगी। खैर, खुद के टैलेंट पर भरोसा हो तो आप डटे रहते हैं। यहां बहुत अच्छे लोग भी हैं, जो अच्छा काम करना चाहते हैं, जो आप पर भरोसा जताते हैं।

    सफर में कभी ऐसा समय आया, जब सेल्फ डाउट हुआ हो?

    सफर में कभी ऐसा समय आया, जब सेल्फ डाउट हुआ हो?

    हां, सबकी लाइफ में अपने संघर्ष होते हैं। मेरे भी थे, सेल्फ डाउट का टाइम भी बिल्कुल आया था। लेकिन अच्छा होता है जब वो कठिनाइयां लाइफ में पहले ही आ जाएं.. तो धीरे धीरे आप सोच समझकर आगे कदम बढ़ाते हैं। हालांकि कभी भी चुनौतियों के लिए आप पूरी तरह से तैयार नहीं रह सकते।

    मुश्किल ये होता है कि शुरु में आप खुद को भी समझ रहे होते हैं.. कि आप किस तरह की फिल्में करना चाहते हैं, मुझे किसी से सलाह लेनी है या नहीं लेनी है, मुझे और इंतजार करना चाहिए या नहीं करना चाहिए। सच कहूं तो पांच साल पहले तक मेरा अलग नजरिया था, लेकिन अब मेरी सोच भी क्लीयर होती गई है।

    मेरी मां मुझसे हमेशा कहती है कि.." जो होता है वो अंततः अच्छे के लिए होता है, तो आगे बढ़ते जाओ.." मैं भी इस बात को बहुत मानती हूं। सेल्फ डाउट का समय आपको ये समझाता कि आप क्या करना चाहते हैं.. आप किस लिए आए हैं इस इंडस्ट्री में.. आप अपनी पहचान किस रूप में बनाना चाहते हैं। तो ये सवाल भी खुद से पूछना जरूरी है और फिर उस पर काम करना भी जरूरी है।

    कोई खास शैली की फिल्में हैं, जो आप करना चाहती हैं?

    बहुत सारे हैं.. मुझे लॉर्जर देन लाइफ फिल्में, रोमाटिंग- कॉमेडी, हॉरर, थ्रिलर्स बहुत पसंद है। (हंसते हुए) शायद zombie वर्ल्ड छोड़कर मुझे फिल्मों में सभी कुछ अच्छा लगता है। मैं सब करना चाहती हूं।

    फिल्म ओटीटी पर रिलीज होती है, तो बड़े पर्दे को मिस करती हैं या बॉक्स ऑफिस के प्रेशर से राहत महसूस होती है?

    फिल्म ओटीटी पर रिलीज होती है, तो बड़े पर्दे को मिस करती हैं या बॉक्स ऑफिस के प्रेशर से राहत महसूस होती है?

    बड़े पर्दे का चार्म तो मिस करती ही हूं, उसका अनुभव ही कुछ और होता है। लेकिन जैसा कि मैंने कहा कि आप कभी नहीं जानते कि क्या होने वाला है लाइफ में, क्या चैलेंज आने वाले हैं। ओटीटी ने पिछले दो सालों में जैसी जगह बनाई है, उससे साफ है कि हमारी ऑडियंस हर जगह है। छोटे बजट या मध्यम बजट फिल्मों के लिए इस वक्त लोगों को थियेटर तक लाना बहुत चैलेजिंग होगा। धीरे धीरे लोग सिनेमाघर की तरफ लौटेंगे। लेकिन फिलहाल मैं यही सोचती हूं कि अच्छा कंटेंट देना जरूरी है बस.. चाहे मीडियम कोई भी हो।

    जाते जाते अपनी आगामी फिल्मों की कुछ अपडेट देना चाहें तो? 'अ थर्सडे' के बाद किन फिल्मों में व्यस्त हैं?

    लॉस्ट लगभग पूरी हो चुकी है, जल्द ही उसकी घोषणा हो सकती है। अनिरूद्ध रॉय चौधरी ने डायरेक्ट की है ये फिल्म। फिर दसवीं है, ओह माई गॉड 2 है। इसके अलावा एक और फिल्म है, जिसके बारे में जल्द ही बताया जाएगा। तो ये फिल्में हैं, जो इस साल रिलीज होंगी।

    English summary
    In an exclusive interview with Filmibeat, actress Yami Gautam shared her experience on completing 10 years in Bollywood, her process of selecting scripts, success, struggle and much more.
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