INTERVIEW: 'तापसी के साथ रश्मि रॉकेट करना आसान रहा, वो डायरेक्टर पर पूरा भरोसा दिखाती हैं'- आकर्ष खुराना
ट्रेलर के साथ ही लोगों के मन में एक उत्सुकता जगाने वाली फिल्म 'रश्मि रॉकेट' 15 अक्टूबर को ज़ी5 पर स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध हो जाएगी। फिल्म में मुख्य किरदार निभाया है तापसी पन्नू ने और निर्देशक हैं आकर्ष खुराना। कारवां, मिस्मैच्ड जैसी फिल्में और वेब सीरीज बना चुके निर्देशक आकर्ष खुराना की ये फिल्म खेलों में जेंडर टेस्ट यानि लिंग परीक्षण के बारे में बात करती है, जिससे महिला खिलाड़ियों को गुजरना पड़ता है। निर्देशक बताते हैं, "यह किसी एक खिलाड़ी की ज़िंदगी पर आधारित नहीं है। ये एक काल्पनिक कहानी है, रियल प्रक्रिया पर.."

'रश्मि रॉकेट' की रिलीज से पहले आकर्ष खुराना से फिल्मीबीट ने खास बातचीत की, जहां उन्होंने इस विषय पर अपने विचार रखे, साथ ही तापसी पन्नू के साथ काम करने का अनुभव साझा किया। उन्होंने कहा, "तापसी की एक बेहतरीन चीज है कि वो पूरी तरह से अपने डायरेक्टर पर भरोसा दिखाती हैं। मैंने कम ही देखा कि कोई एक्टर शॉट के बाद मॉनिटर चेक नहीं करते। तापसी उनमें से एक है।"
यहां पढ़ें इंटरव्यू से कुछ प्रमुख अंश-

'रश्मि रॉकेट' के ट्रेलर को काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिली है। उम्मीद है कि इस विषय को लेकर लोगों के बीच जागरूकता आएगी?
लोगों ने इस विषय पर इक्का दुक्का केस के बारे में ही पढ़ा होगा जो काफी हाई प्रोफाइल हो गए थे। जब ये स्टोरी हमारे पास आई थी तो हमने रिसर्च करना शुरू किया। तब पता चला कि ये एक दो केस की बात नहीं है, ऐसे कई केस चल रहे हैं। ये गांव में भी चलते हैं, राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर पर भी चलते हैं। जब ये कहानी हमारे पास आई थी, तो ये किस हद तक लोगों पर असर डालेगी इसका हमें भी अंदाज़ा नहीं था। लेकिन ट्रेलर देखने के बाद काफी लोगों ने जैसा रिस्पांस दिया है, उससे मैं संतुष्ट हूं। कई लोगों ने कहा कि हमें तो ये पता ही नहीं था, ट्रेलर देखकर हमने गूगल पर इसके बारे में पढ़ा। तो हां, मुझे लगता है कि लोगों का थोड़ा सा तो अटेंशन तो अब इन विषयों पर जा रहा है, जो कि अच्छी बात है।

'जेंडर टेस्ट' जैसे विषय पर फिल्म बनाने की तैयारी कहां से शुरु हुई?
लगभग तीन साल पहले की बात है, अगस्त में मेरी फिल्म कारवां रिलीज़ हुई थी और नवंबर में मुझे प्रोड्यूसर से एक ईमेल आया कि कारवां उन्हें बहुत पसंद आई थी और उनके पास एक स्टोरी थी जो तापसी के पास आई है और वो चाहते थे कि मैं उसे डायरेक्ट करूं। साउथ के एक फिल्ममेकर हैं नंदा पेरियासामी, जिनकी ये स्टोरी थी। उन्होंने बहुत डिटेल में कुछ लिखा नहीं था, लेकिन एक प्रेजेंटेशन जैसी बनाई थी। मुझे वो भेजा गया तो मुझे बहुत दिलचस्प लगा और मैंने सोचा कि ये टॉपिक एक्सप्लोर करने लायक है। फिर उसी साल दिसंबर में मैं एक फ़िल्म फेस्टिवल में गया था तो वहां तापसी भी आई हुईं थीं। वहां हम एक दो बार मिले, बात की इस स्क्रिप्ट के बारे में। वहां से शुरुआत हुई। फिर लेखन की प्रक्रिया शुरू हुई। स्क्रीनप्ले के लिए मैंने अपने एक दोस्त अनिरुध्द गुहा से बात की। मैं इसे लिखने के लिए एक ऐसा बंदा चाहता था जो अंदर तक की रिसर्च करे, ताकि ये ऑथेंटिक रहे। फिर स्क्रिप्ट पर काम किया गया। हमें पिछले साल अप्रैल में शूट करनी थी ये फ़िल्म, हम पूरी तरह से तैयार थे, लेकिन फिर कोविड की वजह से ये नवंबर में शूट हुई।

एक स्पोर्ट्स ड्रामा फिल्म बनाना कितना आसान या मुश्किल होता है क्योंकि हर खेल की अपनी तकनीक होती है, उस तकनीक में छोटी से छोटी गलती पर भी फिल्म को ट्रोल होना पड़ सकता है। तो उस दिशा में आपने कितनी साधवानी बरती?
हमने बहुत पहले ही कुछ एक्सपर्ट्स को हायर कर लिया था क्योंकि हमें पता था कि तापसी को इस फिल्म के लिए काफी ट्रेन करना पड़ेगा.. प्रोफेशनल एथलीट की तरह परफॉर्म करने के लिए। एक एथलीट कोच भी थे मेलविन क्रेस्टो(Melwyn Crasto), जो इंडिया के लिए प्रतियोगिता में जा चुके हैं। वो हमारे साथ हर मोड़ पर थे। क्या सही है, क्या गलत है, सही तकनीक क्या है, उन्होंने हमेशा हमें गाइड किया। हां, हमने कुछ क्रिएटिव लिबर्टी भी लिये हैं, जो कि ड्रामा फिल्म के लिए जरूरी थे। इसके अलावा, इस फिल्म के लिए हमारे साथ एक मेडिकल एक्सपर्ट थे, स्पोर्ट्स एक्सपर्ट थे, कोर्ट के जो दृश्य हैं उसके लिए हमने वकीलों से काफी बातचीत की थी। हम चाहते थे कि कहानी में कुछ सच्चाई हो। तो क्रिएटिव लिबर्टी जहां जहां लेनी पड़ी वहां तो ली है, लेकिन जो कंटेंट है वो काफी रिचर्स पर आधारित है।

फिल्म की स्टारकास्ट भी काफी दिलचस्प दिख रही है; तापसी, प्रियांशु, अभिषेक बनर्जी, सुप्रिया पाठक.. इन सभी कलाकारों के साथ कैसा अनुभव रहा?
हमारे कास्टिंग डायरेक्टर थे वैभव विशांत। इस फिल्म के लिए हमें काफी सारे एथलीट को कास्ट करना था, जो हमारे साथ ट्रेनिंग के लिए तैयार थीं। इस फिल्म की कास्टिंग प्रक्रिया बहुत लंबी रही थी और वैभव इस मामले में बहुत ही मददगार रहा था। ये कच्छ की कहानी है, तो सुप्रिया पाठक, चिराग वोहरा जैसे एक्टर्स को हम रखना चाहते थे ताकि कहानी में वास्तविकता लगे। प्रियांशु और अभिषेक की बात करूं तो.. प्रियांशु हमेशा से मेरा फर्स्ट च्वॉइस था। मैंने उनके साथ पहले भी काम किया है थियेटर में। प्रियांशु एक आर्मी बैकग्राउंड से है, तो मैं जानता था कि जो मुझे एक वो बॉडी लैंग्वेज और जो ठहराव चाहिए, वो मुझे प्रियांशु से ही मिलेगा। फिल्म में वो आर्मी अफसर का किरदार निभा रहे हैं। अभिषेक को कास्ट करना आसान नहीं था। कई लोगों से बात चल रही थी। एक, दो के साथ बात आगे भी बढ़ने वाली थी। लेकिन जब स्क्रिप्ट अभिषेक के पास गई तो उन्होंने मुझे फोन किया। और जिस तरह उन्होंने स्क्रिप्ट के बारे में मुझसे बात की, मैं उसी बातचीत से समझ गया था कि उनसे कहानी का सुर बिल्कुल सही पकड़ा है। फिर हमने अभिषेक को भी फाइनल कर लिया।

तापसी पन्नू को निर्देशित करना कैसा था? ट्रेलर को देखकर उनकी काफी तारीफ हो रही है।
दरअसल, शुरुआत में जब हम फिल्म की बात करने के लिए मिले थे तो काफी कंफर्टेबल रिलेशन हो गया था। हालांकि मेरे मन में हमेशा ये था कि वो इतनी फिल्मों में काम कर चुकी हैं, उनको डायरेक्ट करना कैसा रहेगा। साथ ही उनका डेडिकेशन मैं देख रहा था, दिन- रात ट्रेन कर रही हैं, डायट कर रही हैं, फिट हो रही हैं, दूसरी फिल्म शूट करते करते इसकी तैयारी कर रही थी। ये काफी मुश्किल रहा उनके लिए। देखा जाए तो जब कारवां में मैंने इरफान खान के साथ काम किया, वो डर लगा रहता था कि इरफान साब को कैसे डायरेक्ट करेंगे, वो इतने सीनियर एक्टर हैं। लेकिन उनके साथ भी पहले दो- तीन में जो इक्वेशन बन गया, उससे काम आसान हो गया। यही तापसी के साथ भी हुआ। तैयारी (prep) के वक्त पर, स्क्रिप्टिंग के टाइम पर हमारी काफी बातचीत हुई थी। वो हमेशा शामिल रहती थीं। उनका फीडबैक आता था। तो हमने शूटिंग से पहले ही वक्त काफी बिता लिया था। जब हम शूट के लिए पहुंचे तो जितना मुझे लगा था, सबकुछ उससे काफी आसान रहा था। तापसी के साथ एक बेहतरीन चीज है कि वो पूरी तरह से अपने डायरेक्टर पर भरोसा दिखाती हैं। मैंने कम ही देखा कि कोई एक्टर शॉट के बाद मॉनिटर ही चेक नहीं करते। लेकिन तापसी कभी नहीं चेक करती हैं। हां, यदि उनको कुछ ठीक नहीं लगा तो वो डिसकस कर लेती हैं, लेकिन उन्होंने शूट के दौरान बहुत भरोसा दिखाया। उन्होंने मेरे लिए काम आसान कर दिया।

फिल्म की कहानी को कुछ एथलीट और कुछ रियल घटनाओं से जोड़ा जा रहा है। इस पर आप क्या कहेंगे?
ये फिल्म किसी एक की जिंदगी पर बिल्कुल भी आधारित नहीं है। कई भारतीय फीमेल एथलीट को तरह तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा है। देखा जाए तो फीमेल एथलीट के लिए माहौल उतना आसान नहीं है, जितना की मेल एथलीट के लिए है। हां, लोगों को समानता दिख सकती है, लेकिन ये पूरी तरह से काल्पनिक कहानी है। इसमें जेंडर टेस्टिंग का मुद्दा है, जो रियल में कुछ लोगों के साथ हुआ है। लेकिन जिन परिस्थितियों में वो तापसी के किरदार रश्मि के साथ होता है और उसके बाद रश्मि का जो रिस्पॉस होता है, वो किसी जिंदगी से बिल्कुल भी कुछ मिलता नहीं है। ये एक काल्पनिक कहानी है, रियल प्रक्रिया पर; सिस्टम में जो प्रॉब्लम है उसको लेकर।

अब जबकि कुछ ही दिनों में सिनेमा थियेटर्स खुलने वाले हैं। कई फिल्मों की रिलीज डेट की घोषणा भी की जा चुकी है। ऐसे में ओटीटी और थियेटर्स का भविष्य किस तरह देखते हैं?
सिनेमा जाकर फिल्में देखने का अनुभव तो कोई रिप्लेस नहीं सकता। लेकिन अभी मैं काफी उत्सुक हूं देखने के लिए कि जब यहां सिनेमाहॉल खुलेंगे तो लोग कैसा रिस्पॉस देते हैं। कुछ बड़ी फिल्में आ रही हैं, लोग पक्के तौर पर जाना चाहेंगे, लेकिन मुझे लगता है कि कुछ प्रतिशत लोगों में तो अभी भी डर बैठा होगा। पहले की तरह तो अभी दर्शक नहीं दिखेंगे। उसमें अभी वक्त लगेगा। एक तो सुरक्षा की भी परवाह है, दूसरा है कि लॉकडाउन की वजह से लोग अपने घरों में बहुत कंफर्टेबल हो गए हैं और ओटीटी पर देख लेते हैं फिल्में। उन्हें लगता है कि दो हफ्ते की बात है, महीने भर की बात है.. ओटीटी पर आ ही जाएगा। हर चीज की सब्सक्रिप्शन ली हुई है। फिलहाल इंतजार है 22 अक्टूबर का। तब पता चलेगा कि क्या प्रोटोकॉल होंगे, कितना सुरक्षित होगा, क्या रिस्पॉस होगा। और एक खास बात ये हुई है कि पहले जब कोई फिल्म ओटीटी पर आती थी तो लगता था कि कोई प्रॉब्लम होगा, फिल्म कमजोर होगी तभी ये सिनेमाघर में नहीं आ रही है। लोग सोचते थे कि मेकर्स ने फिल्म रिलीज नहीं कि बस ओटीटी पर ऐसे ही निकाल दी। अब ये सोच बदल गई है। अब ओटीटी एक सामांतर माध्यम बन गया है, जहां फिल्म रिलीज की जा सकती है। रश्मि रॉकेट की बात करूं तो.. हां यदि ये बड़ी स्क्रीन पर आती तो बहुत अच्छी बात होती क्योंकि फिल्म में एक स्पोर्ट्स फिल्म का एलिमेंट है। लेकिन जिस हालात में हमने फिल्म पूरी की, जब हम फिल्म रिलीज करना चाहते थे, हमें सही लगा कि इसे ओटीटी पर ही लाया जाए। मुझे लगता है कि प्रोड्यूर्स ने सही निर्णय लिया है क्योंकि लोग ये फिल्म देंखे ये जरूरी है, माध्यम चाहे जो भी हो।


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