INTERVIEW: 'जबरन हंसाने या डराने वाले किरदारों की मुझे समझ है, ऐसे रोल मैं कभी नहीं चुनता'- अभिषेक बनर्जी

इस साल नेटफ्लिक्स पर आई एंथोलॉजी अनकही कहानियां और अजीब दास्तांन्स से खूब सराहना बटोर चुके अभिनेता अभिषेक बनर्जी अब फिल्म 'रश्मि रॉकेट' के साथ दर्शकों को एंटरटेन करने के लिए तैयार हैं। रश्मि रॉकेट 15 अक्टूबर को ज़ी 5 पर रिलीज होने वाली है, जिसमें मुख्य भूमिका तापसी पन्नू निभा रही हैं। फिल्म में अभिषेक एक वकील का किरदार निभा रहे हैं, जो रश्मि की लड़ाई लड़ता है। अपने किरदार को लेकर अभिषेक कहते हैं, "मैंने कहानी सुनते ही फिल्म के लिए हां कर दिया था क्योंकि मुझे खुशी थी कि मैं एक ऐसा रोल करने जा रहा हूं जो शायद लोगों में जागरूकता ला सकता है।"

Abhishek Banerjee Interview

'रश्मि रॉकेट' की रिलीज से पहले अभिषेक बनर्जी से फिल्मीबीट ने खास बातचीत की, जहां उन्होंने रश्मि रॉकेट में काम करने से अनुभव से लेकर तापसी पन्नू के करियर और ओटीटी- थियेटर्स के भविष्य पर खुलकर बातें कीं। गौरतलब है कि, साल 2006 में राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म 'रंग दे बसंती' में अभिषेक बनर्जी ने छोटी सी झलक दिखाई थी। उसके सालों बाद आई फिल्म 'स्त्री', जहां उनके अभिनय को सराहा गया। लेकिन उन्हें बड़ी पहचान मिली 2020 में आई वेब सीरीज 'पाताल लोक' से, जिसमें उन्होंने हथौड़ा त्यागी का किरदार निभाया था। इस किरदार के साथ उन्होंने दर्शकों के दिलों दिमाग में खास जगह बना लिया। बता दें, अभिषेक सालों से फिल्म इंडस्ट्री में बतौर कास्टिंग डायरेक्टर भी काम करते रहे हैं।

यहां पढ़ें इंटरव्यू से कुछ प्रमुख अंश-

लगातार आपके काम को इतना पसंद किया जा रहा है, दर्शकों द्वारा सराहा जा रहा है, अब उम्मीदों का दबाव महसूस करते हैं?

लगातार आपके काम को इतना पसंद किया जा रहा है, दर्शकों द्वारा सराहा जा रहा है, अब उम्मीदों का दबाव महसूस करते हैं?

दबाव तो हमेशा ही महसूस होता है। मुझे लगता है कि शायद एक एक्टर पर ये दबाव बनी रहनी चाहिए, ये कभी नहीं जानी चाहिए। थियेटर करने के दौरान भी पेट में गुदगुदी सी होती थी, जबकि वो नाटक हम पहले दस बार कर चुके होते थे, फिर भी ग्याहरवीं बार करने से पहले वो डर हमेशा रहता था कि कैसा होगा, कैसा नहीं होगा। तो वो दबाव हमेशा से था और मैं उम्मीद करता हूं कि वो कभी ना जाए। इतना कॉफिडेंस कभी ना आए कि वो दबाव चला जाए।

फिल्म 'रश्मि रॉकेट' से कैसे जुड़ना हुआ? स्क्रिप्ट की किस बात ने आपको आकर्षित किया?

फिल्म 'रश्मि रॉकेट' से कैसे जुड़ना हुआ? स्क्रिप्ट की किस बात ने आपको आकर्षित किया?

स्पोर्ट्स में जेंडर टेस्ट एक ऐसा मुद्दा है, जिसके बारे में लोगों को ज्यादा नहीं पता है। हमें भी इसके बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी, इसीलिए पहले तो शर्मिंदगी उस चीज पर हुई कि किस तरह से हमलोग अंजान हैं। हम इतनी सारी बातें करते हैं लेकिन घुम फिरकर कुछ ही मुद्दों पर बार बार बात होती है। जबकि कुछ मुद्दों को हम छेड़ते भी नहीं हैं। ऐसे में जब आपको मौका मिलता है तो आप एक तरह से जिम्मेदार महसूस करने लगते हो। ऐसी फिल्मों में, एक एक्टर के तौर पर आप नैतिक रूप से जिम्मेदारी लेना चाहते हो.. अपने परफॉर्मेंस के द्वारा। मैं फिल्म में एक वकील बना हूं। मैं उस सिस्टम से लड़ने की कोशिश कर रहा हूं.. एक एथलीट के लिए लड़ रहा हूं, जो शायद आगे जाकर शायद हमारे देश के लिए गोल्ड मेडल लेकर आए। ये लड़ाई बहुत बड़ी है। ये मेरे लिए बहुत दिलचस्प था कि मैं एक ऐसा रोल करने जा रहा हूं जो शायद लोगों में जागरूकता ला सकता है। तो बस, मैंने कहानी सुनते ही फिल्म के लिए हां कर दिया था। हां, बाद में लेकिन बहुत दिक्कत हुई, बहुत सारी लाइन्स याद करनी पड़ी (हंसते हुए)।

फिल्म जेंडर टेस्ट के बारे में है। एक फीमेल एथलीट के हॉरमोन्स में कुछ ऊपर नीचे होने की वजह से उसे मेल कैटेगरी में डाल देना, ये बहुत ही ज्यादा गलत प्रक्रिया है। और ये गलत प्रक्रिया क्यों है इसका जवाब शायद किसी के पास नहीं है। लेकिन जवाब शायद कहीं ना कहीं फिल्म के द्वारा हमें मिला और शायद फिल्म देखने के बाद लोगों को मिलेगा।

यदि मैं गलत नहीं हूं, तो तापसी पन्नू की पहली हिंदी फिल्म के कास्टिंग डायरेक्टर आप थे। तब से अब तक बतौर कास्टिंग डायरेक्टर आप तापसी की जर्नी किस तरह देखते हैं?

यदि मैं गलत नहीं हूं, तो तापसी पन्नू की पहली हिंदी फिल्म के कास्टिंग डायरेक्टर आप थे। तब से अब तक बतौर कास्टिंग डायरेक्टर आप तापसी की जर्नी किस तरह देखते हैं?

हां, बिल्कुल। मैं उस फिल्म का कास्टिंग डायरेक्टर था। लेकिन तापसी को मैंने कास्ट नहीं किया था, वो फिल्म में पहले से फाइनल थीं। हालांकि, मैं तापसी को उससे भी पहले से जानता हूं। मैंने उनकी एक फिल्म देखी थी Aadukalam, धनुष के साथ, जो मुझे बहुत अच्छी लगी थी। मैंने इनको फोन किया था किसी एक कैरेक्टर के लिए, जो उस वक्त हम कास्ट कर रहे थे। उसके बाद मैं लगातार उनके संपर्क में बना हुआ था। एक एक्टर के तौर पर मुझे वो हमेशा से बहुत पसंद थीं। मुझे उनका काम बहुत अच्छा लगता था। कई बार कई सारे मीटिंग्स हुए लेकिन बात नहीं बन पाई। मैं हमेशा से एक कास्टिंग डायरेक्टर के तौर पर उनके साथ काम करना चाहता था, लेकिन देखिए आज एक एक्टर के तौर पर हम साथ काम कर रहे हैं। वो जिस तरह की रियल लाइफ में हैं, वैसा ही वो सेट पर रहती हैं, बिल्कुल फेक नहीं हैं। वो जो हैं, सामने हैं आपके। उनके फिल्मी सफर की बात करूं तो मुझे लगता है कि, इन सालों में एक एक्टर के तौर पर फिल्मों के लिए उनकी 'स्पष्टता' में बदलाव आया है। इस वक्त वो अपने दिमाग में बहुत क्लीयर हैं कि उन्हें क्या काम करना है, कैसे करना है और क्या नहीं करना है। और उसके लिए वो अपना 200 प्रतिशत कमिटमेंट देने को तैयार रहती हैं। रश्मि रॉकेट में जो उनका ट्रांसफॉर्मेशन है, जो शानदार है। सेट पर हम दोनों लड़के (अभिषेक और प्रियांशु) यही डिस्कस कर रहे थे कि ये कैसे कर रही है.. वो शूटिंग भी कर रही है, अपने फिजिक पर भी काम कर रही हैं और दूसरे हिस्से की तैयारी भी कर रही हैं जो उन्हें बाद में शूट करना है। जेंडर इक्वालिटी की बात करें तो.. ये है जेंडर इक्वालिटी की आप भूल जाएं कि औरत और मर्द में क्या फर्क है.. कि वो कैसे उतना मेहनत कर पाएगी बेचारी। सेट पर इस तरह की एनर्जी देखना शानदार था।

कास्टिंग डायरेक्टर होने की वजह से क्या आपको खुद के लिए स्क्रिप्ट समझने में, अपने रोल को समझने में मदद मिलती है?

कास्टिंग डायरेक्टर होने की वजह से क्या आपको खुद के लिए स्क्रिप्ट समझने में, अपने रोल को समझने में मदद मिलती है?

बिल्कुल, इसमें कोई दो राय नहीं है। मैं इतने साल से कास्टिंग कर रहा हूं, बहुत सारे कैरेक्टर्स से डील कर चुका हूं, कई डायरेक्टर्स से बात कर चुका हूं। तो मुझे स्क्रिप्ट पढ़कर पता चल जाता है कि इस किरदार का क्या होने वाला है। या ये किरदार उस स्क्रिप्ट की spine में कहीं ना कहीं फिट होती है क्या? मेरे लिए वो बहुत जरूरी है। यदि कोई कैरेक्टर स्क्रिप्ट में फिट नहीं होती है, उसे सिर्फ मजे दिलाने के लिए या डराने के लिए रखा गया है तो वो कैरेक्टर मैं कभी नहीं करता। और वो कास्टिंग करके आपको समझ में आ जाता है। आप समझते हैं कि कौन से किरदार को किस लिए रखा गया है और आपको क्या चाहिए उस कैरेक्टर से।

अब जबकि कुछ ही दिनों में सिनेमा थियेटर्स खुलने वाले हैं। कई फिल्मों की रिलीज डेट की घोषणा भी की जा चुकी है। ऐसे में ओटीटी और थियेटर्स का भविष्य किस तरह देखते हैं?

अब जबकि कुछ ही दिनों में सिनेमा थियेटर्स खुलने वाले हैं। कई फिल्मों की रिलीज डेट की घोषणा भी की जा चुकी है। ऐसे में ओटीटी और थियेटर्स का भविष्य किस तरह देखते हैं?

मुझे लगता है कि ये अब एक्टर्स या स्टार्स या मीडियम के बीच का कंपिटिशन नहीं है। अब ये कंटेंट के बीच कंपिटिशन है.. कहानी के बीच है। आपकी कहानी क्या है, दर्शक क्यों मेहनत करके जाए वो देखने के लिए.. ये मायने रखता है। क्योंकि आदत तो 21 दिन में हो जाती है.. यहां तो सबको घर में बैठे डेढ़ साल हो चुके हैं। लोगों को घर में बैठकर कंटेंट देखने की आदत हो चुकी है। तो अब उनका ध्यान रूझाने के लिए हमें काम अच्छा करना पड़ेगा.. और दोनों जगह करना पड़ेगा। ओटीटी के लिए भी मैं यही कहता हूं। हमारा सबसे बड़ा कंपिटिशन इस वक्त इंटरनेशनल शोज हैं, जिनके लिए लोग इंतजार कर रहे होते हैं, जिनके लिए हाइप क्रिएट होती है, वो ट्रेडिंग नंबर वन पर होते हैं। आपको अब ये पता है कि दर्शकों को बेवकूफ नहीं बना सकते। इनको सेम पैटर्न वाली चीज नहीं बेच सकते। इनको कुछ अलग दिखाना पड़ेगा, कुछ मजेदार दिखाना पड़ेगा, तभी ये आएंगे।

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