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    Exclusive Interview: स्टारडम दिमाग खराब करता है, हाथ जोड़कर बोलो थैंक यू- बरुण सोबती

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    बीते चार सालों से बरुण सोबती ने वेब सीरीज की राह पकड़ ली है। टीवी पर 'इस प्यार को क्या नाम दूं' से लोकप्रिय बरुण के लिए ओटीटी बतौर कलाकार खुद को दर्शाने के लिए लंबी फेहरिस्त दे रहा। साथ ही वक्त भी, जो उन्हें टीवी की दुनिया में रहने के दौरान नहीं मिल पाता। 'असुर' वेब सीरीज के बाद बरुण की दिलचस्प पेशकश 'हलाहल' है।

    एरोस नाउ की ये फिल्म 2020 की सच्ची घटना से प्रेरित काल्पनिक कहानी है। जो हत्या और आत्महत्या के बीच छिपी सच्चाई को उजागर करने की कोशिश करती है। बरुण सोबती इसमें एक युवा पुलिस अधिकारी यूसुफ कुरैशी की भूमिका में हैं।

    फिल्मीबीट FILMIBEAT HINDI से बातचीत में बरुण सोबती ने टीवी, वेब सीरीज और कोरोना महामारी से हुए इंडस्ट्री में बदलाव और स्टारडम खुलकर बात की। चलिए फिर जानते हैं उनकी ये खास बातचीत हमारे साथ।

    मेरे लिए स्क्रीन पर ये नया नहीं

    मेरे लिए स्क्रीन पर ये नया नहीं

    हलाहल में मेरी भूमिका में एक्शन और कॅामेडी का मिश्रण है। रणदीप झा द्वारा निर्देशित और ज़ीशान क्वाडरी द्वारा निर्मित एक मनोरंजक क्राइम थ्रिलर है। हाईवे पर एक जली हुई लाश, भ्रष्ट और लालची पुलिस अधिकारी, छात्रों का मर्डर और धोखा इस कहानी का हिस्सा है। इसकी स्क्रिप्ट अच्छे से लिखी गई थी।

    हर किरदार को कहानी में बढ़िया तरीके से पिरोया है। इसमें में हरियाणवी बोल रहा हूं। मेरे लिए स्क्रीन पर ये नया है। निजी जीवन में नहीं। मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई। कई दोस्त है मेरे जो हरियाणा से ताल्लुक रखते है। हरियाणवी भाषा से मेरी पहचान पुरानी है। इसकी शूटिंग गाजियाबाद और दिल्ली के करीब अप्रैल 2019 में ही पूरी कर ली गई।

    ये तो समाज में होता आया है- सच्ची घटना से प्रेरित

    ये तो समाज में होता आया है- सच्ची घटना से प्रेरित

    जी हां, ये असल घटना से प्रेरित है। लेकिन इस कहानी का फोकस केवल एक मर्डर पर आधारित नहीं है। ये समाज की भ्रष्टता पर आधारित है। आपको फिल्म देखकर लगेगा कि अरे ये तो समाज में होता रहा है। कई सारे ऐसे मुद्दें हैं, जहां पर आपके लिए यकीन करना मुश्किल होगा। ये फिल्म कई सारे सरकारी विभाग से पर्दा उठाती है। ये फिल्म के किसी चर्चित घटनाक्रम से जुड़ा नहीं है। भारत जब से आजाद हुआ तब से ऐसे कई किस्सों ,सच्चाई से हलाहल जुड़ा हुआ है।

    लोग सोचते हैं हिंसा है कौन देखेगा?

    लोग सोचते हैं हिंसा है कौन देखेगा?

    टीवी में इस तरह के किरदार नहीं मिलते हैं। वहां कई तरह की रोक होती है। ये भी है कि वहां इस तरह की भूमिका नहीं होती। पारिवारिक दर्शकों पर ध्यान केंद्रीत कर कहानी लिखी जाती है। कई बार दुविधा रहती है। कौन क्या देखेगा इसकी डेमोग्राफी किसी को शायद पता नहीं होती। चाहे वो टीवी हो या ओटीटी।

    सबको लगता है कि एक ही तरह का कंटेंट पसंद आता है, पर ऐसा नहीं है भई। देखने वाले देखते हैं। अब हमें पता चला है कि देखो 'असुर' और 'हलाहल' के इतने बड़े दर्शक वर्ग हैं। बाकी कुछ लोग तो यही सोचते हैं कि हिंसा हैं, कौन देखेगा? लेकिन मुद्दा ये है कि जो चल रहा है वो चल रहा है।

    टीवी शोज के साथ दूसरा काम हो ही नहीं सकता

    टीवी शोज के साथ दूसरा काम हो ही नहीं सकता

    टीवी शोज के लिए हर दिन शूटिंग करनी पड़ती है। आप बंंध जाते हैं। कोई दूसरा काम नहीं कर सकते। टीवी के साथ दूसरा काम मतलब नामुमकिन। महीने के 30 दिन उसी में व्यतीत हो जाते हैं। एक काम आप महीना दर महीना साल दर साल करते रहते हैं। वो उबाऊ हो जाता है। मुझे किरदार के साथ प्रयोग करना था। मैं साल में तीन से चार अलग तरह का किरदार निभाता रहता हूं। ऐसे में रचनात्मक( क्रिएटिव) संतुष्टि मिल जाती है।

    कोरोना महामारी ने एक छत के नीचे ला दिया

    कोरोना महामारी ने एक छत के नीचे ला दिया

    कोरोना महामारी के बाद तो अलगाव चला ही गया। फिलहाल सबकुछ ओटीटी पर ही आ रहा है। ये कुछ समय के लिए है। मेरे ख्याल से फिल्म इंडस्ट्री में कुछ बदलने वाला नहीं है। हां, जनतंत्र हो जाएगा। जो ऑनलाइन दर्शक हैं वो थोड़ा अधिक पढ़े-लिखे और अहित नहीं करने वाले फेयर( सच्चे) हैं। थोड़ा समय बाद सिनेमाघर खुल जायेंगे। फिल्में सिनेमा में रिलीज होंगी। वो अलग तरह का इवेंट होता है।

    नेपोटिज्म कुछ नहीं होता, स्टारडम दिमाग खराब करता है

    नेपोटिज्म कुछ नहीं होता, स्टारडम दिमाग खराब करता है

    नेपोटिज्म और स्टारडम का नाम सवाल में सुनते ही बरुण ने कहा कि फिलहाल इंडस्ट्री बुरे दौर से गुजर रही है। वक्त, अच्छा और बुरा दोनों लेकर आता है। हां, कुछ लोगों के लिए ये कठिन समय है। हर इंसान चाहे वह किसी भी इंडस्ट्री का हिस्सा क्यों ना हो, उसकी अपनी तरह की संघर्ष होती है। बिना परिश्रम के कोई आगे नहीं बढ़ता है।

    रही बात स्टारडम की तो मेरे लिए इसके कोई मायने नहीं है। पता नहीं ये शब्द कहां से आते हैं? ये सब बनाई हुई चीजें हैं। जो लोगों का दिमाग खराब करती हैं। अपना काम करो। लोग तारीफ करें तो हाथ जोड़कर बोल दो थैंक यू और अगले काम पर चलो।

    English summary
    Exclusive Interview: Barun Sobti talk about his Officer role in Eros now Halahal, Nepotism, OTT release and more
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