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    अनुराग कश्यप से एक मुलाकात

    By Super
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    इसी श्रृंखला में हम इस बार आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं जाने-माने निर्देशक और इन दिनों देव डी से चर्चा में आए बॉलीवुड निर्देशक अनुराग कश्यप से.

    देव डी के लिए आपको मुबारकबाद. काफ़ी लोगों ने इसकी तारीफ़ की है, हाँ कुछ लोगों ने इसकी बुराई भी की है. लेकिन सभी लोग कह रहे हैं कि ये अलग तरह की फ़िल्म है?

    अलग फ़िल्म होने का आरोप तो पहले भी लग चुका है. लेकिन फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन कर रही है. मेरे लिए यही नया है.

    देवदास का ये बिल्कुल अलग रूप. आपके दिमाग में ये सब कुछ कैसे आया?

    इसमें बहुत दिमाग नहीं लगाना पड़ा. बस अपने चारों तरफ़ देखने की ज़रूरत है. हमने लोगों से बातचीत की. हमने सोचा कि आज के माहौल में देवदास, चंद्रमुखी होते तो कैसे होते. आज देवदास सिनेमा, उपन्यास के परे जा चुका है. आज का युवा वर्ग प्रेम, प्यार और ख़ासकर सेक्स को कैसे देखता है, इन सब पहलुओं को छूने और दिखाने की कोशिश की.

    देवदास के अलावा आपने चंद्रमुखी और पारो के चरित्र भी कुछ अलग तरह से दिखाए हैं?

    आप फ़िल्म की प्रतिक्रिया देखें तो आज के युवा और महिलाओं से इसे अच्छा समर्थन मिला है. लेकिन 35 से अधिक का युवा वर्ग इसे हजम नहीं कर पा रहा है. उनकी नैतिकता को ठेस पहुँच रही है.

    आज औरतों को जो चाहिए वो मांगती हैं. पुरुषों को ये हजम नहीं हो पा रहा है अनुराग कश्यप

    मसलन, एक महाशय ने मुझसे कहा कि तुम्हारी फ़िल्म बेहद अश्लील है. मैंने पूछा कि इसमें ऐसा कोई सीन तो नहीं हैं. तो उन्होंने कहा कि फ़िल्म में एक सीन है जब पारो खेत में जाती है, लेकिन उसे ये कहने की क्या ज़रूरत थी कि तुम्हारे बड़े बाल हैं. तो मैंने कहा कि इसमें क्या ग़लत है. ये सोच पर निर्भर है और सेक्स के प्रति लोगों की दबी हुई भावनाएँ हैं. इसी वजह से लोग इसे गंदी फ़िल्म बता रहे हैं.

    समाज काफ़ी बदल रहा है. लेकिन फिर भी लोगों में सेक्स के बारे में बातें अब भी नहीं हो रही थी. आपने इस सिलसिले को तोड़ने को कोशिश की है?

    हम शराब पीएँ तो ठीक, लेकिन अगर महिलाएँ पीएँ तो संस्कृति पर हमला हो जाता है. आज औरतों को जो चाहिए वो मांगती हैं. पुरुषों को ये हजम नहीं हो पा रहा है. पुरुषों का दोगलापन सामने आ रहा है. इसलिए उनको इसमें अश्लीलता नज़र आती है, जबकि मस्ती जैसी फ़िल्म के बारे में वो कुछ नहीं कहते हैं, जिसमें तीन लड़के लड़कियों को देखते हुए कुछ भी बातें करते हैं.

    तो फ़िल्म देव डी देवदास से अधिक चंद्रमुखी और पारो पर केंद्रित है?

    कहानी देवदास पर ही केंद्रित है. लेकिन पुरुष अब तक नहीं बदला है, वो इस फ़िल्म के आख़िर में बदलता है. मूल देवदास में चंद्रमुखी, पारो फ़िल्म को आगे ले जाती थी, लेकिन इस फ़िल्म में चंद्रमुखी, पारो के पात्र मज़बूत हैं.

    एक मुलाक़ात में आगे बढ़ें इससे पहले आपकी पसंद का गाना?

    अनुराग मानते हैं कि संस्कृति के नाम पर पुरुष दोगलापन दिखाते हैं

    प्यासा का गाना 'ये महलों, ये ताजों, ये तख्तों की दुनिया" मुझे बहुत पसंद है, इससे मेरी अगली फ़िल्म गुलाल भी प्रेरित है.

    तो आप गुरुदत्त से प्रेरित हैं?

    नहीं मैं साहिर लुधियानवी से प्रेरित हूँ.

    तो गुलाल में ऐसा क्या है. क्या इसमें समाज, राजनीति पर कटाक्ष किया गया है?

    गुलाल में आज के राजनीतिक समाज पर कटाक्ष किया गया है. ये राजस्थान के महाराजाओं की कहानी है. इस फ़िल्म की शूटिंग राजस्थान में हुई है. फ़िल्म के ज़रिए ये कहा जा रहा है कि छोटी-छोटी बातों पर राजनीति कैसे होती है. भाषा, जाति या सीमा को आधार बनाकर राजनीति करने पर कटाक्ष किया गया है.

    इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाओं में कौन हैं?

    इसमें ज़्यादातर नए लोग हैं. इस तरह की फ़िल्में बनाना बहुत मुश्किल होता है. इसमें एक अलग तरह का अंडरवर्ल्ड है. जाने पहचाने चेहरों में ब्लैक फ्रइडे में काम करने वाले केके, पीयूष मिश्रा, आदित्य श्रीवास्तव हैं. हमने रामधारी सिंह दिनकर की वीर रस शैली में इस फ़िल्म का संगीत तैयार किया है.

    ये फ़िल्म अपने गानों से दर्शकों को झकझोर कर रख देगी. इसमें देश दुनिया की राजनीति को लेकर मुजरा किया गया है. ज़मीन से जुड़ी हुई फ़िल्म है. फ़िल्म 13 मार्च को रिलीज़ हो जाएगी.

    आपकी पसंद का एक और गाना?

    नए गानों में मुझे दिल्ली-6 का गेंदा फूल काफ़ी पसंद है.

    दिल्ली-6 के गाने वाकई बहुत अच्छे हैं. प्रसून जोशी ने बहुत अच्छे गाने लिखे हैं?

    यशराज की पिछले 2-3 साल में आई फ़िल्मों से इत्तेफ़ाक नहीं रखता. लेकिन अब ये लोग बदल रहे हैं अनुराग कश्यप

    हाँ. प्रसून जोशी का सहयोग मुझे समय-समय पर मिलता रहता है. लेकिन इस बार मुझे फ़िल्म इंडस्ट्री के सभी तबकों से अच्छा समर्थन मिला है. आदित्य चोपड़ा, यशराज फ़िल्म्स, डेविड धवन, रजत कपूर, दिवाकर, शिमित अमीन ने मुझे फ़ोन किया.

    ये सवाल मैं आपसे बाद में पूछता, लेकिन क्योंकि आपने ज़िक्र कर ही दिया है तो जानना चाहूँगा कि आदित्य चोपड़ा, करण जौहर आपको कैसे लगते हैं?

    मुझे निजी तौर पर इन लोगों से दिक्कत नहीं है. मुझे पहले उनके काम से आपत्ति थी, लेकिन अब ये लोग खुद को बदल रहे हैं. करण जौहर वेकअप सीड, जिहाद जैसी फ़िल्में बना रहे हैं, जो उनकी पुरानी फ़िल्मों से बिल्कुल हटकर है. यशराज की पिछले 2-3 साल में आई फ़िल्मों से इत्तेफ़ाक नहीं रखता. लेकिन अब ये लोग बदल रहे हैं.

    चक दे इंडिया तो अच्छी लगी होगी आपको?

    हाँ. चक दे इंडिया मुझे बहुत अच्छी लगी. दिलवाले दुल्हनियाँ ले जाएँगे भी अपने समय की क्रांतिकारी फ़िल्म थी, लेकिन बाद में ये फॉर्मूला फ़िल्म बन गई. बस मेरा गुस्सा भी यही था कि लोग कॉपी कर रहे हैं.लेकिन अब समय बदल रहा है. हर तबके के लोग फ़िल्म बना रहे हैं. जिसकी वजह से सिनेमा आगे बढ़ रहा है और आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हम किसी से कम नहीं होंगे.

    फ़िल्मों से जुड़ने का आपका सिलसिला कब शुरू हुआ?

    मैं 19-20 साल का था, जब मैं भी पशोपेश में था कि आखिर क्या करूँ. जो कंपीटीशन पास भी किए थे, उनका भी कोई मतलब नहीं था. लेकिन क्योंकि पिताजी ने पैसे लगाए थे, इसलिए इम्तहान तो देना ही था. जन नाट्य मंच के साथ थिएटर करता था. 1993 में गोवा में अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव हुआ था और तब 10 दिनों में लगभग 50 फ़िल्में देखी. ये फ़िल्में देखने के बाद सब कुछ बदल गया.

    पटकथा लेखन और निर्देशन से पहले अनुराग थिएटर से जुड़े थे

    अपनी पसंद का एक और गाना?

    ओए लक्की, लक्की ओए. मुझे बहुत पसंद है. पिछले साल की मेरी फेवरिट फ़िल्म है.

    आप इतने अच्छे लेखक हैं. सत्या, शूल जैसी फ़िल्मों की स्क्रिप्ट लिखी है. तो आपको क्या आसान लगता है लेखन या डायरेक्शन?

    डायरेक्शन. फ़िल्म बनाने में ज़्यादा मजा आता है. लिख लेता हूँ, लेकिन अब थोड़ा आलसी हो गया हूँ. या कह लीजिए की हाथ दर्द करने लगा है. मैं लैपटॉप पर नहीं, हाथ से ही लिखता हूँ.

    लिखना कुछ टेढ़ी खीर भी है?

    बात ये नहीं है. दरअसल, लिखने के लिए बहुत फोकस चाहिए. मैं टुकड़ों में फ़िल्म नहीं लिखता और न ही लिख सकता हूँ. फ़िल्म की कहानी एक झटके में ही लिखता हूँ. लगातार 24 घंटे, 36 घंटे. देव डी, सत्या जैसी सभी फ़िल्में मैंने एक झटके में ही लिखी हैं.

    आपकी ज़्यादातर फ़िल्में मसालेदार श्रेणियों में नहीं आती. तो क्या आप जानबूझकर हटकर फ़िल्में बनाते हैं?

    ये स्वाभाविक है. अगर मैं मुख्य धारा की फ़िल्में बनाऊँगा तो ये मेरे लिए कुछ हटकर होगी.

    तो आप 'हटकर" फ़िल्में बनाने का इरादा रखते हैं?

    काश कि मैं मसालेदार या हटकर फ़िल्में बना सकूँ. काश कि मैं मुख्यधारा की इतनी बड़ी सुपर हिट फ़िल्म बना सकूँ कि कोई मुझे 10 साल तक रोक न सके.

    आपके लिए फ़िल्म में महत्वपूर्ण क्या है?

    मेरे लिए ये महत्वपूर्ण है कि जिस आदमी के पैसे से फ़िल्म बन रही है, उसे कुछ तो फायदा हो. ताकि वो इस धंधे में रह सके. क्योंकि जब तक उसके पास पैसे नहीं होंगे, मैं फ़िल्म नहीं बना सकता.

    आप फ़िल्म डायरेक्शन के दौरान सबसे ज़्यादा लुत्फ़ किस चीज़ का उठाते हैं?

    फ़िल्म की कहानी एक झटके में ही लिखता हूँ. लगातार 24 घंटे, 36 घंटे. देव डी, सत्या जैसी सभी फ़िल्में मैंने एक झटके में ही लिखी हैं अनुराग कश्यप

    मैं फ़िल्म की शूटिंग और एडिटिंग का पूरा लुत्फ उठाता हूँ. हर सीन को फ़िल्माने में मजा आता है. फिर फ़िल्म को एक साथ जुटाने में मजा आता है.

    और सबसे ज़्यादा बोरिंग क्या है?

    फ़िल्म का प्रमोशन. या कहिए कि रिलीज़ के पहले जो बोलना पड़ता है वो बहुत बोरिंग होता है. क्योंकि जो लोग सवाल पूछते हैं उन्होंने फ़िल्म तो देखी तो नहीं होती है, बस सुनी-सुनाई बातों पर सवाल होते हैं. तो उनका जवाब देना बोरिंग होता है.

    अपनी पसंद का एक और गाना बताएँ?

    देव डी का गाना 'तौबा तेरा जलवा" मुझे पसंद है. इसके अलावा सत्या का 'गोली मार भेजे में" भी मुझे बहुत पसंद है.

    आपने सत्या की कहानी कैसे लिखी?

    सत्या की कहानी अलग है. मैं किसी फ़िल्म स्कूल में तो गया नहीं था. सत्या मेरा फ़िल्म स्कूल थी. मैंने और सौरभ शुक्ला ने सत्या की जो पहली कहानी लिखी थी, उसे तो रामगोपाल वर्मा ने कूड़ेदान में डाल दिया था. फिर लिखने का सिलसिला कुछ इस तरह हुआ कि फ़िल्म टुकड़ों में लिखी गई. तो कहा जाए तो सत्या किसी एक व्यक्ति ने नहीं बल्कि कई लोगों ने एक साथ लिखी है. सत्या अपने आप में और अपने समय की लैंडमार्क थी और ये किस्मत की बात थी कि हम उसका हिस्सा थे.

    आपने रामगोपाल वर्मा के लिए इतनी फ़िल्में लिखी हैं. उनके बारे में आपकी राय क्या है. क्या आपको नहीं लगता कि उनका गोल्डन टच कहीँ छूट रहा है?

    अनुराग नहीं मानते कि देव डी में कुछ अश्लील है

    देखिए, रामूजी जीनियस हैं. रामूजी कहीँ उलझ गए हैं. फिर चाहे किसी को साबित करने के लिए या फिर कुछ और. क्योंकि अब वो फ़िल्म नहीं बना रहे हैं. शायद वो पुरानी दिक्कतों को सुलझाने के लिए नए सिरे से कोशिश कर रहे हैं. आलोचना को नहीं झेल पा रहे हैं. निंदकों को उन्होंने अपने से दूर कर लिया है. फिर भी मैं कहूँगा कि वो कभी भी वापसी कर सकते हैं. उनमें इतनी कुव्वत है..

    फिर शुरुआत पर लौटते हैं. अपने बचपन, किशोरावस्था के बारे में कुछ बताएँ?

    मैंने बचपन बोर्डिंग स्कूलों में गुजारा है. कहीं न कहीं घरवालों और समाज के साथ अलगाव रहा है. और ये मेरी फ़िल्मों में भी नज़र आता है.

    अच्छा अनुराग ये बताएँ कि कोई ऐसी फ़िल्म जिसने बचपन में आप पर असर डाला हो?

    जब बच्चा था तो 'मुकद्दर का सिंकदर" और 'शक्ति" देखकर बहुत मजा आया था. तब लगता था कि मैं एक दिन अनाथ हो जाऊँगा तब दुनिया को दिखा दूँगा कि मैं क्या से क्या कर सकता हूँ.

    ब्लैक फ्राइडे यानी 1993 के बम विस्फोटों पर फ़िल्म बनाने का इरादा कैसे बना?

    इसका श्रेय हुसैन ज़ैदी को जाता है. उन्होंने न किताब लिखी होती न वो फ़िल्म बनती. 1993 के बम विस्फोटों के एक-दो महीने बाद मैं मुंबई आया था. तो मैं विस्फोटों से पहले की मुंबई को नहीं जानता था. किताब को पढ़ने के बाद मैंने दोनों पहलुओं को जाना. इसके बाद ही मैंने इस पर फ़िल्म बनाने का इरादा बनाया.

    आपकी कुछ फ़िल्में बीच में रिलीज नहीं हुई. तो वो संघर्ष के दिन. वो जेब खाली होने के दिन. कैसा रहा ये अनुभव?

    वो बहुत बुरे दिन रहे. तब की क्या बात है, ये दिन तो मेरे साथ अब भी चल रहे हैं. आज भी रिक्शे पर घूमता हूँ, किराए के मकान में रहता हूँ. लेकिन मेरे कई अच्छे दोस्त हैं. पीयूष मिश्रा, जॉन अब्राहम और लंदन में तुषार पटेल हैं, जो मुझे उधार देते रहते हैं.

    ऐसा सपना देखते हैं कि ये उधारी के दिन खत्म होंगे और हम जैसों को उधार दे सकते हैं?

    रामूजी जीनियस हैं. रामूजी कहीँ उलझ गए हैं. फिर चाहे किसी को साबित करने के लिए या फिर कुछ और अनुराग कश्यप

    हाँ बिल्कुल. लेकिन फिलहाल तो उधारी मेरे ऊपर ही है और मुझे इसे चुकाना है.

    आप क्या इस बात को मानते हैं कि इंडस्ट्री में अच्छे लेखकों की कमी है?

    नहीं. मैं ऐसा बिल्कुल नहीं मानता. हमारे यहाँ बहुत अच्छे लेखक हैं. कमी अच्छे निर्माताओं की है. निर्माताओं का रुख़ देखिए कोई लेखक उनके पास जाता है तो पहली बात उनके पास समय नहीं होता, फिर वो लेखक से कहते हैं कि ऐसा नहीं, ऐसा लिखो. चुनिंदा लोग ही हैं जो नया सिनेमा करते हैं. यूटीवी के अलावा बताएँ कि किसने नया सिनेमा किया है. निर्माता अच्छे मिल जाएँ तो अच्छी स्क्रिप्ट की कमी नहीं है. आज भी मेरी डेस्क पर कोई 28 स्क्रिप्ट होंगी, जो बेहतरीन हैं.

    सुना है आप डैनी बॉयल के अच्छे दोस्त हैं?

    ये तो उनका बड़प्पन है जो उन्होंने मुझे अपना दोस्त माना है. मैं डैनी बॉयल का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ. उनका मुझ पर इतना अधिक प्रभाव रहा है कि डैनी बॉयल की फ़िल्मों ट्रेनस्पॉटिंग, शैलो ग्रेव, ए लाइफ लेस ऑर्डिनरी को मैंने अपनी शुरुआती फ़िल्म पांच में ट्रिब्यूट दिया था. ब्लैक फ्राइडे देखने के बाद वो मुझसे मिलने आए और मेरे साथ काम किया.

    अपनी पसंद के कुछ और गाने बताएँ?

    खोसला का घोसला का 'चक दे फट्टे" भी मुझे बहुत पसंद है. इसके अलावा स्लमडॉग मिलियनेयर का 'जय हो" भी मुझे पसंद है.

    डैनी बॉयल ने हाल ही में कहा था कि भारत में स्लमडॉग मिलियनेयर जैसी फ़िल्म अनुराग कश्यप ही बना सकते हैं. कैसा लगता है ये सब सुनकर?

    अनुराग कश्यप मानते हैं कि लीक से हटकर बन रही फ़िल्मों को और प्रचार की ज़रूरत है

    मैं बहुत खुश हो गया था. विश्वास भी है. मैं ये बात स्वीकार कर चुका हूँ कि अलग तरह की फ़िल्में बनाता हूँ और ये भी कि हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री मुझे पहचान नहीं देगी. रामगोपाल वर्मा को भी इंडस्ट्री ने कहाँ स्वीकार किया है. क्योंकि हमें पहचान नहीं मिली, इसलिए हमारी फ़िल्में बाहर नहीं जाएँगी.

    देखिए. स्लमडॉग मिलियनेयर को बाहर इतना प्रोत्साहन क्यों मिला. क्योंकि लोगों ने ये फ़िल्म देखी. जिन फ़िल्मों में असली हिंदुस्तान दिखता है वो तो बाहर जा ही नहीं पाती. जो फ़िल्में बाहर जाती हैं, उनमें हिंदुस्तान कहीं होता ही नहीं है. तो स्लमडॉग के ज़रिए लोगों ने हिंदुस्तान को देखा है.

    समकालीन डायरेक्टरों में आपके पसंदीदा?

    समकालीन डायरेक्टरों में मुझे श्रीराम राघवन, दिवाकर बैनर्जी, नवदीप सिंह, इम्तियाज़ अली बहुत पसंद हैं.

    आपके पसंदीदा अभिनेता-अभिनेत्री?

    रणवीर कपूर मुझे बहुत अच्छे लगते हैं. अभिनेत्रियों में मुझे प्रियंका चोपड़ा अच्छी लगती हैं. इनके अलावा केके, इरफ़ान ख़ान, नसरुद्दीन शाह भी पसंद हैं.

    अनुराग कश्यप खुद को कैसे देखते हैं?

    मैं कोई पहेली नहीं हूँ. मेरी फ़िल्में जब भी देखने जाएँ तो खुले दिमाग से देखने जाएँ.

    मैंने सुना है कि आप फ़िल्म आलोचकों के बारे में अच्छी राय नहीं रखते?

    ऐसा नहीं है. लेकिन कुछ ट्रेड पंडित हैं जो सही राय नहीं देते. मसलन एक ट्रेड पंडित ने 'रब ने बना दी जोड़ी" को बहुत गालियाँ दी. लेकिन जब वो फ़िल्म चल गई तो उन्होंने कहा कि आदित्य चोपड़ा को कुछ अलग हटकर करना चाहिए सिर्फ़ फ़िल्म चलने से कुछ नहीं होता.

    फिर उन्होंने ही देव डी के बारे मे कहा कि अलग से फ़िल्म बनाने से कुछ नहीं होता, फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर भी चलनी चाहिए. मेरा कहना है कि फ़िल्म समीक्षक को बॉक्स ऑफिस के आधार पर फ़िल्म को नहीं आंकना चाहिए.

    प्रशंसकों को भविष्य में आपसे क्या उम्मीदें रखनी चाहिए?

    मैं कुछ नया ही करूँगा. जो मायने रखेगा. ये उम्मीद करें कि कुछ नया ही होगा.

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