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    Exclusive Interview मैंने कसम खाई है,मेरी फिल्म रिलीज नहीं होगी, तो किसी की फिल्म नहीं देखूंगा

    By Prachi Dixit
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    कान फिल्म फेस्टिवल में इस बार नंदिता दास द्वारा निर्देशित फिल्म 'मंटो' की चर्चा रही। सआदत हसन मंटो की इस बायोपिक में नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी मंटो की भूमिका निभा रहे हैं।

    हाल ही में इस फिल्म के सिलसिले में हमारी मुलाकात मंटो के खास दोस्त अशोक कुमार से हुई। अशोक कुमार यानी कि हिंदी सिनेमा के दादामुनि। आपको यह पढ़कर हैरानी होगी कि मंटो में दादामुनि। जी हां,नंदिता दास की मंटो में भानु उदय सुपरस्टार दादामुनि की भूमिका निभा रहे हैं।

    जब हमें पता चला कि साम दाम दंड भेद शो के विजय नामधारी मंटो के खास मित्र अशोक कुमार के किरदार में दिखाई देंगे तो इस वजह से भानु से मुलाकात की जिज्ञासा बढ़ गई। हाल ही में भानु ऋतिक रोशन की सुपर 30 छोड़ने को लेकर भी चर्चा में रहे हैं।

    बहरहाल,मुंबई गोरेगांव स्थित फिल्मसिटी में 42 मिनट की बातचीत में भानु ने बताया कि आखिर किस तरह नंदिता ने उन्हें 2 सप्ताह में दादामुनि बनने की चुनौती दी और उन पर विश्वास जताया।

    इसके लिए भानु ने अशोक कुमार की 250 से अधिक फिल्में देखने के साथ ऐसी तैयारी की नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी उनकी तैयारी से चकित हो गए। चलिए फिर यहां पढ़ते हैं भानु से हुई दिलचस्प बातचीत के खास अंश...

    क्या कभी आपको अपने नाम भानु उदय को लेकर किसी तरह की झिझक महसूस हुई। बतौर एक्टर भानु नाम होना आपके करियर के लिए सही नहीं है?

    क्या कभी आपको अपने नाम भानु उदय को लेकर किसी तरह की झिझक महसूस हुई। बतौर एक्टर भानु नाम होना आपके करियर के लिए सही नहीं है?

    मुझे कभी लगा नहीं कि भानु उदय सिंह किसी हीरो का नाम हो सकता है। मुझे लगता था कि भानु उदय सिंह सुनने में किसी लड़की का नाम प्रतीत होता है।मैंने फिर भानु उदय रख लिया। मैंने अपने करियर की शुरुआत ऋतिक रोशन की फिल्म लक्ष्य से की। इस फिल्म में मेरा नाम भानु उदय सिंह ही था। लेकिन ड्रामा स्कूल से निकलकर जब मैंने अपना पहला टीवी शो स्पेशल स्क्वॉड करने जा रहा था,तब मैंने अपना नाम बदलकर भानु उदय कर लिया था। भानु उदय सुनने में दमदार लगता है। मेरे परिवार में कभी फिल्म का माहौल रहा ही नहीं। दो साल पहले मुझे मां ने बताया कि उन्हें फिल्में देखने का बहुत शौक था। मेरे नाना जी का सिनेमाघर हुआ करता था। मां अक्सर वहां पर फिल्में देखने जाया करती थी। कई बार वह एक ही फिल्म कई बार बैठ कर देखा करती थीं। शायद,मां का अंश होने के कारण मुझ में एक्टर होने का गुण आया है।बचपन से एक्टर बनने के अलावा मेरी कोई मंजिल नहीं थी। 8 वीं क्लास से मैंने थिएटर शुरू कर दिया था।नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा जाना मेरा मकसद रहा। मैंने अपनी इस मंजिल को पाया।

    आपका 14 साल का लंबा करियर रहा है। स्टारडम ने हमेशा आपकी तलाश की है। आप पर बाकी एक्टरों की तरह लगातार दिखते रहने का दबाव नहीं बना ?

    आपका 14 साल का लंबा करियर रहा है। स्टारडम ने हमेशा आपकी तलाश की है। आप पर बाकी एक्टरों की तरह लगातार दिखते रहने का दबाव नहीं बना ?

    मुझ पर कभी दबाव नहीं रहा है। मैं 2004 में मुंबई आया। आज हम 2018 में हैं। 14 साल में मेरा केवल एक ही फोकस रहा है कि मुझे केवल ग्रेट एक्टर बनना है। ग्रेट एक्टर बनने के लिए चुनिंदा बनना पड़ता है। मैंंने खुद को हमेशा चुनिंदा बनाने की कोशिश की। साम दाम दंड भेद साइन करते वक्त मुझसे कहा गया कि यह एक लिमिटेड एपिसोड का शो है। आज इस शो को एक साल का वक्त हो गया है। 14 साल से हर काम को लेकर मेरी यही सोच रही है कि मैं खुद को काम के लिए बेहतर बना सकूं। मैं काम के जरिए खुद को बतौर एक्टर निखार सकूं। हां, कई बार मुझे इस वजह से फायदा और नुकसान दोनों हुआ है। स्पेशल स्क्वॉड काफी लोकप्रिय शो रहा है।लेकिन आज के दर्शक मुझे नहीं जानते हैं। कई लोगों ने मुझे कहा कि तुम जैसे एक्टर को रोज टीवी पर दिखना चाहिए। मैंने कहा नहीं, अगर मैं भी सबकी तरह दिखने लगूंगा तो सब में शामिल हो जाऊंगा। मुझे अपनी अलग पहचान बनानी हैं। आज कहीं ना कहीं काम मेरी तलाश करता है। साम दाम दंड भेद और मंटो भी मुझे इसी वजह से मिला कि मैं लोगों से अलग हूं।

    शायद,सुपर 30 भी आपको इसी वजह से आॅफर हुई थी। यह फिल्म आपके लिए बहुत बड़ा मौका साबित हो सकती थी?

    शायद,सुपर 30 भी आपको इसी वजह से आॅफर हुई थी। यह फिल्म आपके लिए बहुत बड़ा मौका साबित हो सकती थी?

    सुपर 30 को छोड़ने का मुझे दुख है। लेकिन अफसोस नहीं है। मुकेश छाबरा ने मुझे एक दिन फोन किया। मुझसे कहा कि ऋतिक रोशन के भाई की भूमिका है। मैं इस फिल्म के लिए पूरी तरह से तैयार था। सुपर 30 के लिए मुझे 45 दिन की शूटिंग करनी थी। मैंने अपने शो के हेड से कहा कि चाहिए तो मेरे किरदार को कोमा में डाल दीजिए।उन्होंने कहा कि साम दाम दंड भेद का असली चेहरा विजय है,ऐसा हो पाना मुश्किल है। मैंने फिर कहा कि देर रात मैं इसकी शूटिंग पूरी कर लूंगा। मेरा यह आइडिया भी फ्लॅाप हो गया। आखिरकार मुझे फिल्म को ही अलविदा कहना पड़ा। सच कहूं तो मेरा पहला वादा शो के साथ है। मैं उस थाली में नहीं थूक सकता जिसने मुझे खाना दिया है। वैसे भी मेरा मानना है कि लाइफ को आपसे ज्यादा अक्ल होती है। जिंदगी में जो होना है वो हो ही जाता है। शायद मेरी जिंदगी में सुपर 30 से बेहतर लिखा हो।

    शायद,आपका कहना ठीक भी हो। इस वजह से मंटो आपकी झोली में आ गिरी। यह फिल्म आप तक कैसे पहुंची?

    शायद,आपका कहना ठीक भी हो। इस वजह से मंटो आपकी झोली में आ गिरी। यह फिल्म आप तक कैसे पहुंची?

    मंटो को लेकर मुझे बेहद खुशी है। मैं इस शो के कारण कान फिल्म फेस्टिवल में नहीं जा पाया। लेकिन नंदिता मैम के लिए मैं बेहद खुश हूं। उन्होंने ,हम सब ने इस फिल्म के लिए बेहद मेहनत की है। नंदिता मैम एक पॉवरफुल महिला हैं। वह मां की तरह अपना काम निकलवाना जानती हैं। नवाजुद्दीन सिद्दीकी हमारे आदर्श हैं। उनके साथ स्क्रीन शेयर करना मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। नंदिता जी ने मुझे इस फिल्म में अशोक कुमार यानी कि दादामुनि की भूमिका का प्रस्ताव दिया। उन्होंने मुझसे कहा था कि मुझे पता है कि तुम अशोक जी की तरह नहीं दिखते हो। लेकिन मुझे तुम पर भरोसा है। मैंने कहा कि ठीक है एक बार कोशिश करके देखते हैं।

    अशोक कुमार बनने के लिए आपने किस तरह की तैयारी की। दादामुनि बनने का आपका पूरा प्रोसेस क्या रहा है?

    अशोक कुमार बनने के लिए आपने किस तरह की तैयारी की। दादामुनि बनने का आपका पूरा प्रोसेस क्या रहा है?

    यह फैंस के लिए बहुत बड़ा सरप्राइज है। सुपरस्टार अशोक कुमार कुमार मंटो के दोस्त रहे हैं। अशोक कुमार को पूरी दुनिया जानती है।लेकिन युवा अशोक कुमार को पर्दे पर निभाना मेरे लिए काफी चैलेंजिंग रहा है। ना मैं उनकी तरह दिखता हूं। मेरी आवाज भी उनकी तरह नहीं है। नंदिता मैम ने कहा कि मेरे पास शूटिंग शुरू होने से पहले 2 सप्ताह का समय है। मैं हर दिन 18 घंटे अशोक कुमार की फिल्में देखता था। सच कहूं तो मैं पूरी तरह से डरा हुआ था। 1950 के सुपरस्टार को पर्दे पर निभाना आसान नहीं है। खैर, मैं उनकी फिल्में देखता और उसमें से कोई सीन करके नंदिता मैम के पास भेजता था। वह मुझे हर बार गाइड करती। कुल मिलाकर दो सप्ताह मैंने अशोक कुमार बनने की काफी कोशिश की। आलम तो यह था कि शूटिंग पर आज तक किसी ने मेरी असली आवाज सुनी ही नहीं। मैं हर वक्त किरदार में बना रहता। ताकि मेरी तैयारी में कोई कमी ना रह जाए। यहां तक शूटिंग के ब्रेक में भी अशोक कुमार की तरह बोलने और बैठने की कोशिश करता रहता। नवाजुद्दीन भाई भी मुझे देखकर हैरान हो गए थे। उन्होंने मेरा काफी हौसला बढ़ाया।

    इस दौरान आपको अशोक कुमार जी की कुल कितनी फिल्में देखनी पड़ी होंगी। उनका अपना एक यूनिक स्टाइल है। क्या वह भी आप फिल्म में करते हुए दिखाई देंगे?

    इस दौरान आपको अशोक कुमार जी की कुल कितनी फिल्में देखनी पड़ी होंगी। उनका अपना एक यूनिक स्टाइल है। क्या वह भी आप फिल्म में करते हुए दिखाई देंगे?

    मैंने उनकी तकरीबन 250 फिल्में देखी हैं।1950 के दौरान अशोक कुमार जी का स्टाइल डेवलप नहीं हुआ था। बाद की फिल्मों में वह उन्होंने अपने बोलने का एक स्टाइल बना लिया था। मंटो में आपको 1950 के दौरान के अशोक कुमार देखने को मिलेंगे। दर्शकों को मंटो के दौरान यह समझना होगा कि वह रील लाइफ नहीं बल्कि रियल लाइफ के दादामुनि को पर्दे पर देख रहे हैं। देखिए, मैं उनकी स्टाइल को कॅापी नहीं कर सकता था। यह फिल्म देश के साथ इंटरनेशनल दर्शकों के लिए भी है। हमारे यहां के लोग दादामुनि का स्टाइल समझ सकते हैं। लेकिन शायद,इंटरनेशनल दर्शकों के लिए मेरा दादमुनि का स्टाइल करना ओवर लग सकता था। इस वजह से हमने सही तरीके से पर्दे पर उन्हें पेश करने की कवायद की है।उम्मीद है,दर्शकों को मंटो में दादामुनि याद रह जाए। नंदिता मैम को मेरी मेहनत पर विश्वास था। उन्हें लगता था कि मैं दिमाग से पागल हूं।

    नवाजुद्दीन के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा। क्या आप दोनों की पहले भी मुलाकात हो चुकी है?

    नवाजुद्दीन के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा। क्या आप दोनों की पहले भी मुलाकात हो चुकी है?

    नवाज भाई की फिल्म न्यूर्याक के समय हमारी मुलाकात हुई थी। मैंन उनसे कहा था कि भाई, अब तक मैंने किसी भी एनएसडी के एक्टर की इतनी तारीफ नहीं सुनी। मैंने आपकी फिल्म नहीं देखी,लेकिन हां तारीफ काफी सुनी है। उन्होंने तुरंत मुझे पकड़ लिया। नवाज भाई मुझसे पूछने लगे कि तुने फिल्म क्यों नहीं देखी। मुझे बताना पड़ा कि मैंने प्रण लिया है कि जब तक मेरी फिल्म नहीं आएगी मैं किसी की भी फिल्म नहीं देखूंगा। उन्होंने कहा कि सही,यह जुनून एक्टर में होना चाहिए। खुद को काबिल बनाने के लिए यह पागलपन जरूरी है। जब मंटो के दौरान मेरी मुलाकात जब हुई तब अशोक कुमार की भूमिका में मुझे देखकर कहने लगे कि अरे, तेरा पागलपन अभी भी बरकरार है। उनके साथ काम करना मेरे लिए बहुत अच्छा समय रहा है। नवाज भाई जमीन से जुड़े हुए इंसान हैं।

    क्या आपने अभी तक कोई फिल्म नहीं देखी?मंटो आपकी पहली फिल्म होगी जो आप देखेंगे?

    क्या आपने अभी तक कोई फिल्म नहीं देखी?मंटो आपकी पहली फिल्म होगी जो आप देखेंगे?

    ऐसा नहीं है। मुझे जिन एक्टरों के काम के बारे में पता चलता है,मैं उनकी फिल्में जरूर देखता हूं। मैंने अपनी फिल्में मछली जल की रानी और Unfreedom देखी है। इसके बाद अपनी फिल्म मंटो भी देखूंगा।मुझे समझ नहीं आता कि एक्टरों के लिए फिल्म देखना क्यों जरूरी है। क्या कभी कोई टेनिस प्लेयर से पूछता है कि क्या उसने कभी किसी दूसरे प्लेयर का मैच देखा है। वह खुद की तैयारी में जुटा रहता है। अगर मैं दूसरों का काम देखने लगूंगा तो खुद की ग्रोथ पर कब ध्यान दूंगा।मेरा फोकस हमेशा खुद को निखारने पर रहता है।

    अच्छा,आपने क्या मंटो को कभी पढ़ा है। कई लोगों का मानना है कि मंटो को समझना मुश्किल है..

    अच्छा,आपने क्या मंटो को कभी पढ़ा है। कई लोगों का मानना है कि मंटो को समझना मुश्किल है..

    मंटो बहुत बड़े कलाकार रहे हैं। एनएसडी में पढ़ाई के दौरान मैंने कई हिंदी उपन्यास पढ़े। लेकिन हिंदी में मंटो के अलावा मुझे कोई दूसरा नहीं भाया। अपनी उर्दू और हिंदी सुधारने के लिए मैंने मंटो को पढ़ा। फिर क्या, मैं उनका प्रशंसक बन गया। मंटो ने अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी। नवाज भाई ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि सच बोलने के कारण उन पर मानहानि के केस चलाए गए।कलाकार होने के नाते उन्होंने कभी अपनी आवाज को दबने नहीं दिया। यहां तक कि मंटो की भूमिका निभाने हुए नवाज भाई भी काफी सच बोलने लगे थे। उन्होंने कहा था कि एक एक्टर होने के नाते इतना सच बोलना उनके लिए सही नहीं है। आज तक हम मंटो को याद करते हैं। उनकी कहानी हमारे लिए प्रेरणा हैं। मेरे ख्याल से हर किसी को एक बार मंटो को जरूर पढ़ना चाहिए। हर कलाकार को उनकी तरह बनने की कोशिश करनी चाहिए।

    English summary
    In an Interview TV actor Bhanu Uday says working with Nawazuddin Siddiqui and the team of Manto has been one of the most gratifying experiences of his life.he plays the role of actor Ashok Kumar in the film.
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