26 जनवरी स्पेशल - क्यों हैं रंग दे बसंती आज भी राष्ट्र प्रेम पर बनी सबसे शानदार फिल्म
राकेश ओम प्रकाश मेहरा की फिल्म रंग दे बसंती, 26 जनवरी 2006 को रिलीज़ हुई। एक वो दिन है और एक आज का दिन है, सिनेमा ने देश के प्रति त्याग, समर्पण, प्रेम इससे ज़्यादा किसी फिल्म में नहीं देखा। देश से इतना जुड़ा हुआ आप किसी फिल्म को देखकर महसूस नहीं करेंगे जितना कि रंग दे बसंती है।
इसलिए आप किसी से भी पूछिए कि देश से जुड़ी उनकी फेवरिट फिल्म क्या है और वो एक झटके में कहेंगे - रंग दे बसंती।

इस फिल्म का असर केवल भारत में नहीं, पाकिस्तान तक हुआ था। इस फिल्म को देखने के बाद पाकिस्तान के एक नेशनल अख़बार, जंग ने एक टीवी चैनल लॉन्च किया जिसका मकसद था आवाम की आवाज़, सरकार तक पहुंचाना और उनके मुद्दों और दिक्कतों को एक प्लेटफॉर्म देना।
फिल्म के कुछ सीन थे जो वाकई आपके रोंगटे खड़े कर देते हैं। जैसे कि फिल्म में भारत के आज़ादी आंदोलन पर डॉक्यूमेंट्री बनाने आई विदेशी लड़की सू के दादाजी की बंद घड़ी। उसके दादाजी ब्रिटिश ऑफिसर थे और उनकी बंद घड़ी का समय था - 7.30। बाद में फिल्म में 7.30 बजे ही भगत सिंह को फांसी देते हुए दिखाया जाता है।
रंग दे बसंती में ऐसा बहुत कुछ था जो दर्शकों को इस फिल्म से आसानी से जोड़ देता है और इसे आज के ज़माने के देशप्रेम की नई लहर पर बनी बेस्ट फिल्म बना देता है।

युवाओं से जोड़ती
पिछले तीन - चार दशकों में रंग दे बसंती इकलौती ऐसी फिल्म है जो बिना किसी कोशिश पहले ही सीन से युवाओं को इस फिल्म से जोड़ देती है। बेबाकी और बेतरतीबी से जीने वाला युवा। भारत की सड़कों पर तफरीबाज़ी करता युवा। कॉलेज के कैंटीन में चाय की चुस्कियां लेता युवा। और एक रात में, एक हादसे से देश के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी समझता युवा।

इतिहास के पन्ने पलटती
रंग दे बसंती इतिहास के पन्ने पलटते हुए हमें 1930 के आंदोलन तक तो लेकर जाती है। लेकिन इतिहास के पन्ने पलटते हुए ये फिल्म उन पन्नों पर ज़रूर रूकती है जिनमें दीमक लगी है। देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार के पन्नों पर। और जिस तरह राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने इन दो टाइमलाइन को जोड़ा है, वो हमें 1930 से आज तक की हर कमी, हर गलती पर सोचने को मजबूर करेगा।

विरोध और विद्रोह का अंतर
विरोध और विद्रोह का अंतर रंग दे बसंती बखूबी दिखाती है। कुछ युवा जो पहले केवल विरोध करना जानते हैं। वो विरोध जो सतही है। ऊपर की परत तक सीमित। जो विरोध कम और बहस ज़्यादा लगता है। क्योंकि उस विरोध में कुछ कम है। जब ये कमी पूरी होती है और विरोध, विद्रोह में बदलता है तो सभ्यताएं और परंपराएं बदलती हैं, ये रंग दे बसंती दिखाती है अपने क्लाईमैक्स में।

भगत सिंह की क्रांति
रंग दे बसंती की आत्मा बसी है भगत सिंह की क्रांति में। वो भगत सिंह, जिसकी दुलहन केवल आज़ादी थी और प्यार केवल देश। और इसलिए उस भगत की विचारधारा जब फिल्म में सिद्धार्थ के किरदार करण में मिलती है तो वो अपने भ्रष्ट पिता के सीने में गोली उतारने से भी नहीं चूकता है।

आज़ाद का जुनून
फिल्म की जान बसती है चंद्रशेखर आज़ाद के जुनून में। वो जुनून जो अल्हड़ है। बिल्कुल आमिर खान के किरदार डीजे की तरह। लेकिन वो जुनून जो अड़ियल है, अपने देश की सुरक्षा के प्रति। जिसके अंदर जान है अपनी जान दांव पर लगाकर अपने साथियों के लिए आगे का कठिन रास्ता आसान करने की।

बिस्मिल का देशप्रेम
फिल्म में रामप्रसाद बिस्मिल का प्रेम है। वो प्रेम जो धर्मों में भेदभाव नहीं करता है। वो प्रेम जिसका धर्म केवल देश है और जिसका धर्म दोस्ती है। वो धर्म जिस पर आज परतें पड़ चुकी हैं और उन परतों को अतुल कुलकर्णी का किरदार लक्ष्मण पांडे। लक्ष्मण की परतें खुलते खुलते वो राम बनते हैं और बिस्मिल के सरफरोशी बनने की तमन्ना को पूरा करते हैं।

अश्फाक़ उल्लाह खां का समर्पण
अगर बिस्मिल का धर्म दोस्ती है तो अशफाक़ उल्लाह खां का उस दोस्ती के प्रति समर्पण अद्भुत है। कुणाल कपूर के किरदार असलम के लक्ष्मण के प्रति गुस्से से लेकर उनके अशफाक़ बनते ही राम प्रसाद बिस्मिल की दोस्ती के प्रति उस प्रेम को परदे पर देखना रोमांचक था।

राजगुरू का जज़्बा
शरमन जोशी के सुखी का किरदार उस मासूम युवा की झलक पेश करता है जिससे किसी को ज़्यादा उम्मीदें नहीं होती हैं लेकिन जब वो अपनी सी करने पर आता है तो सबको पीछे छोड़ देता है। इसलिए सुखी जब धीरे धीरे राजगुरू की गद्दी संभालता है तो हर किसी को अपनी हिम्मत और बहादुरी से जीत लेता है।

रू - ब - रू से खून चला तक
रंग दे बसंती उन युवाओं की कहानी है जो यूं ही ज़िंदगी बिताते हुए एक दिन कुछ कर गुज़रने की ठानते हैं। जिनका खून एक दिन उबलता है और फिर उसकी आंच में उनकी देशभक्ति पकती है। जिन्हें यकीन हो जाता है कि वो चाहे तो कुछ भी कर सकते हैं और वो चाहें तो कुछ ना करें। इस देश को बदलने की ज़िम्मेदारी उनकी भी उतनी ही है जितनी बाकियों की। इस देश की सुरक्षा अंदर से भी उतनी ही करनी है जितनी सीमा पर खड़े होकर करनी है।

मोहे रंग दे बसंती
बसंती, केसरिया के करीब का रंग होता है। केसरिया, जो हमारे राष्ट्रीय ध्वज का पहला रंग है। इसलिए जब अपनी आवाज़ में दलेर मेहंदी मोहे रंग दे बसंती कहते हैं वो वाकई आपकी इच्छा होती है अपनी धरती की धूल में लिपट कर बसंती रंग में रंग जाने की। और शायद यही कारण है कि आज तक रंग दे बसंती जैसा ना कुछ बना और ना कुछ दिल को छू पाया।


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