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फिल्में ऐसी बोल्ड की सेंसर बोर्ड ने की हमेशा के लिए बैन

Posted By: Shweta
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बॉलीवुड में हर साल सैकड़ों फ़िल्में बनती हैं। इनमें से कुछ हिट तो कुछ फ्लॉप हो जाती हैं, लेकिन कई फ़िल्में ऐसी भी होती हैं जो दर्शकों की पहुंच से जान-बूझ कर दूर रखी जाती हैं।

सेंसर बोर्ड के अनुसार, इनमें से कुछ फिल्मों की भाषा ठीक नहीं होती तो कुछ के दृश्य अश्लील होते हैं। कुछ धार्मिक विचारों को ठेस पहुंचाती हैं तो कुछ ऐसे विषयों के बारे में बात करती हैं जो सामान्य जनता शायद हज़म न कर सके।

[फिल्मों में अलग किया कुछ अलग और इस फिदा हुए फैंस]

लेकिन सेंसर बोर्ड भी जानता है कि फ़िल्में देखना हमारे ऊपर निर्भर करता है। अगर किसी फ़िल्म का कंटेंट लोगों को नहीं पसंद आता है तो वो उसे नहीं देखें। लेकिन बेशक कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिनकी रिलीज से हंगामा मच सकता है लेकिन कई बार इस चक्कर में अच्छी फिल्में भी रिलीज नहीं हो पाई।

दूसरी बात ये कि एक फ़िल्म बनाने में बहुत मेहनत लगती है। कई लोगों का खून-पसीना, ज़िन्दगी भर की कमाई लग जाती है। तो ये देखते हुए क्या इन फिल्मों को बैन करना ठीक है?

फायर (1996)

फायर (1996)

दीपा मेहता के काम को पूरी दुनिया में काफ़ी सराहा जाता है। लेकिन हमारे देश में उनकी फिल्मों को बैन कर दिया जाता है। ऐसी ही एक फ़िल्म थी फायर जो काफ़ी विवादों में थी। इसमें शबाना आज़मी और नंदिता दास के बीच के शारीरिक संबंधों को दिखाया गया है। शबाना आज़मी, नंदिता दास और दीपा मेहता को जान से मारने की धमकी आने लगी और सेंसर बोर्ड ने इस फ़िल्म को बैन कर दिया।

कामासूत्र- अ टेल ऑफ लव (1996)

कामासूत्र- अ टेल ऑफ लव (1996)

सेंसर बोर्ड के अनुसार ये फ़िल्म अश्लील और अनैतिक थी। मीरा नायर ने इस फ़िल्म में १६वीं शताब्दी के चार प्रेमियों की कहानी बताई थी। फ़िल्म समीक्षकों को तो ये मूवी बहुत पसंद आई थी, लेकिन सेंसर बोर्ड को नहीं ल्हाजा बैन कर दी गई।

उर्फ़ प्रोफेसर (2000)

उर्फ़ प्रोफेसर (2000)

एक और फ़िल्म जो सेंसर बोर्ड के चंगुल से नहीं निकल पायी थी निखिल आडवाणी की उर्फ़ प्रोफेसर। इसमें मनोज पाहवा, अंतरा माली और शरमन जोशी जैसे सितारे थे। लेकिन अश्लील दृश्य और भाषा होने के कारण सेंसर बोर्ड ने इसे पास नहीं किया।

द पिंक मिरर (2003)

द पिंक मिरर (2003)

द पिंक मिरर जिसे श्रीधर रंगायन ने बनाया था, सेंसर बोर्ड को पसंद नहीं आई क्योंकि इसमें समलैंगिक लोगों के हितों की बात की गयी है। दुनिया के दूसरे फेस्टिवल्स में इस फ़िल्म को सराहा गया था लेकिन भारत में सेंसर बोर्ड ने इसे बैन कर दिया।

पांच (2003)

पांच (2003)

अनुराग कश्यप की सेंसर बोर्ड से पुरानी दुश्मनी है। उनकी फ़िल्म पांच, जोशी-अभ्यंकर के सीरियल मर्डर पर आधारित थी। लेकिन सेंसर बोर्ड ने इस फ़िल्म को इसलिए बैन कर दिया क्योंकि इसमें हिंसा, अश्लील भाषा और ड्रग्स की लत को दिखाया गया था।

ब्लैक फ्राइडे (2004)

ब्लैक फ्राइडे (2004)

हुसैन ज़ैदी की किताब पर बनी ब्लैक फ्राइडे अनुराग कश्यप की दूसरी फ़िल्म थी जिसे सेंसर बोर्ड ने बैन कर दिया। ये फ़िल्म, 1993 मुंबई बम ब्लास्ट पर आधारित थी। उस समय बम ब्लास्ट का केस, कोर्ट में चल रहा था और इसीलिए हाई कोर्ट ने इस फ़िल्म की रिलीज़ पर स्टे लगा दिया।

परज़ानिया (2005)

परज़ानिया (2005)

परज़ानिया गुजरात दंगों पर आधारित थी और इस फ़िल्म की निंदा और प्रशंसा दोनों हुई थी। इस फ़िल्म की कहानी में अज़हर नाम का लड़का 2002 दंगों के समय गायब हो जाता है। वैसे तो परज़ानिया को राष्ट्रीय अवार्ड मिला है लेकिन गुजरात दंगों जैसे संवेदनशील विषय की वजह से ये फ़िल्म गुजरात में बैन कर दी गयी थी।

सिन्स (2005)

सिन्स (2005)

ये फ़िल्म केरेला के एक क्रिस्चियन प्रीस्ट के ऊपर थी जिसे एक औरत से प्यार हो जाता है। कैसे ये प्रीस्ट, समाज और धर्म की मर्यादाओं को लांघ कर अपने प्यार कायम रखता है, ये फ़िल्म इसी पर आधारित है। कैथलिक लोगों को ये फ़िल्म एकदम पसंद नहीं आई थी क्योंकि इसमें कैथलिक धर्म को बहुत ही अनैतिक तरह से दर्शाया था। सेंसर बोर्ड को भी इस फ़िल्म के न्यूड सिन्स, परेशानी थी और इसीलिए उन्होंने Sins को बैन कर दिया।

इंशाअल्लाह, फुटबॉल (2010)

इंशाअल्लाह, फुटबॉल (2010)

ये डाक्यूमेंट्री एक कश्मीरी लड़के पर बनी है। कहानी ये है कई इस लड़के का सपना है विदेश जा कर फुटबॉल खेलना, लेकिन उसे देश से बाहर जाने की अनुमति नहीं मिलती क्योंकि उसका पिता आतंकवादी गतिविधियों से जुड़ा हुआ है। इस फ़िल्म का लक्ष्य था कि आतंकवाद के चलते, कश्मीरी लोगों की परेशानियां दुनिया के सामने आएं। लेकिन कश्मीर का मसला हमेशा से ही संवेदनशील रहा है जिसकी वजह से सेंसर बोर्ड ने इस फ़िल्म को रिलीज़ की मंज़ूरी नहीं दी।

डेज्ड इन दून (2010)

डेज्ड इन दून (2010)

दून स्कूल शायद देश का सबसे सम्मानित स्कूल है। इस फ़िल्म की कहानी एक लड़के की ज़िन्दगी के ऊपर है जो दून स्कूल में पढ़ता है और फिर ज़िन्दगी उसे कौन से सफ़र पर ले जाती है। दून स्कूल के प्रबंधन को ये फ़िल्म पसंद नहीं आयी। उनका मानना था कि ये फ़िल्म दून स्कूल के नाम और छवि को खराब करेगी। यही वजह है कि ये फ़िल्म आज तक रिलीज़ नहीं हुई।

English summary
Apart from all the hits, flops and the average movies, their are films that indulge in strong (read bold) language, vulgar scenes, Kashmir issues, religion and basically movies which are way ahead of its time।Here's a list of movies which the Censor Board banned, not that the viewers missed any of it!
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