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    भोजपुरी सिनेमाः गोल्डेन एज है आरंभिक दौर

    By डा.चंद्रभूषण अंकुर
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    1964 में प्रदर्शित फिल्म विदेसिया में भोजपुरी के सर्वाधिक प्रतिष्ठित नाटककार और कवि भिखारी ठाकुर को गाते हुए दिखाया गया है जो अपने आप में एक दुर्लभ ऐतिहासिक दस्तावेज है। अगर भोजपुरी को, सिनेमा जैसा माध्यम नहीं मिला होता तो भोजपुरी के शेक्सपीयर माने जाने वाले इस महान नाट्‌यकर्मी को परदे पर जीवित देखने का मौका भोजपुरियों को शायद ही मिल पाता। विदेसिया में जाति प्रथा, सामंती मूल्यों और ग्रामीण अभिजात्य वर्ग के प्रति विद्रोह का स्वर दिखायी देता है। भोजपुरी फिल्मों के प्रथम दौर की अधिकांश फिल्मों की जड़े हल्की ही सही भोजपुरी समाज में थी लिहाजा ये फिल्में सफल रही लेकिन बहुत सारी फिल्में फ्लाप भी हुई क्योंकि भोजपुरी फिल्मों के निर्माण में आयी तीव्रता से ऐसे लोग जिन्हें भोजपुरी भाषा और परिवेश का जरा भी ज्ञान नही था, वे भोजपुरी फिल्मों के निर्माण की ओर दौड़ पड़े लिहाजा भोजपुरी के फिल्मों में भी भाषा की अपनी मिठास, समस्याएं अनुपस्थित होने लगा और फिल्में फ्लाप होने लगी इससे एक दशक तक भोजपुरी फिल्म निर्माण के क्षेत्र में खामोशी छा गयी।

    भोजपुरी सिनेमा के पहले दौर पर यदि गौर करें तो ज्यादातर फिल्मों में प्रेम और परिवार एक बड़ा मूल्य था। ये फिल्में सामाजिक जीवन में मौजूद जड़ता, रूढ़िवाद और जातिवाद पर हमला करती हैं। दहेज, नशाखोरी, छुआछूत, आर्थिक विषमता और नागर संस्कृति को भी अधिकांश फिल्मों ने अपना मुद्दा बनाया। स्थानीय लोकनृत्यों और गीतों के अलावा इन फिल्मों में आइटम गीत और नृत्य का चलन शुरू से ही रहा। आइटम गीतों को छोड़ दिया जाय तो उस दौर के फिल्मों की अधिकांश शूटिंग भोजपुरी अंचल में ही की गई जिनमें भोजपुरी क्षेत्र के गांव और संस्कृति को सूक्ष्मता से दर्ज किया गया। इन फिल्मों में गीत-संगीत, खेत-खलिहान, बैठका, हुक्का-बीड़ी, कहावतें, मुहावरे, लोकोक्तियां, खेल- सब कुछ जीवंत दस्तावेज की तरह हैं।

    ए बाबू गंउवा छूटल जाता...

    इसी दौर में नजीर हुसेन की फिल्म हमार संसार भी आई। जिस पर बहुत लोगों का ध्यान नहीं गया। इसका निर्देशन नसीम ने किया था। यह भोजपुरी अंचल के परिवारों के जीवन का जीवंत दस्तावेज है। हालांकि फिल्म विमल राय की 'दो बीघा जमीन" से प्रेरित लगती है। परन्तु भोजपुरी वातावरण और गंवई तत्वों के खूबसूरत प्रयोग, इस फिल्म को जीवन्त बनाते हैं। इस फिल्म के जरिये नसीम पलायन के सामाजिक और आर्थिक पहलुओं की तह में जाने की कोशिश करते हैं। और विकास के मॉडल पर भी सवाल खड़े करते हैं। यह परिवार को टूटने-बिखरने से बचाने की कहानी है। इसमें प्रेमचंद की कहानियों की गंध महसूस की जा सकती है। फिल्म में गांव छोड़कर शहर की ओर जाते परिवार का ट्रेन सिक्वेंस बहुत ही मार्मिक बन पड़ा है। भागती हुई ट्रेन के पीछे गांव, खेत, बधार छूटते जा रहे हैं। किसान का बच्चा बार-बार इस वाक्य को दोहराता है कि 'ए बाबू गंउवा छूटल जाता, ए बाबू गंउवा छूटल जाता" (बाबूजी गांव पीछे रह गया, गांव पीछे रह गया)। इस साधारण से वाक्य से नजीर असाधारण पीड़ा रचते हैं। गांव का छूटना, देश का छूटना, भोजपुरी का जबरदस्त मुहावरा है। यानी सब कुछ लुट जाना।

    इस बिम्ब को विकास के मॉडल पर भी टिप्पणी के रूप में देखा जा सकता है। आधुनिकता के नाम पर सामूहिकता की जगह व्यक्तिपरकता, त्याग और स्नेह की जगह स्वार्थपरता हावी है। इस फिल्म की असफलता यह सवाल खड़ा करती है कि क्या दर्शक अपने यथार्थ से घबराता है ? वह अपनी रोजमर्रा से इतर कुछ नया, कौतूहलपूर्ण या स्वप्न को ही स्वीकार कर पाता है कारण जो भी रहा हो भोजपुरी जमीन के यथार्थ को परदे पर लाने की इस संजीदा कोशिश की नाकामयाबी ने भोजपुरी फिल्मों में इस धारा को कुंद कर दिया।

    जिजीविषा को खा गया व्यापार

    पहली भोजपुरी फिल्म के निर्माण में जो उत्साह और जीजिविषा नजर आयी थी उसमें भोजपुरी स्वतत्व की रचना और पहचान की बात प्रमुख थी। परन्तु फिल्म के सफल होते ही वह व्यावसायिक हितों में उलझ गयी। जिस तरह से कारोबारी इस ओर झपटे अस्मिता और अस्तित्व वाला प्रश्न पीछे छूट गया। संस्कृति गौण हो गयी व्यवसाय प्रमुख हो गया। रचना की जगह लाभ अहम हो गया। हालांकि एक के बाद एक फिल्में बनती रहीं लेकिन यह स्पष्ट था क उसके लिए स्थाई अधोरचना का कोई इंतजाम नहीं हो सका था। सारा तामझाम हिन्दी सिनेमा पर आश्रित था। काम करने वाले लोग भी वहीं से तकनीशियन से लेकर कलाकार तक। अगर भोजपुरी फिल्म को एक उद्योग की तरह चलना था तो उसे अपने लिए अधोरचनाओं का सृजन भी करना था। लेकिन दुर्भाग्य से जिस संरचना की जरूरत थी वह खड़ी नहीं हो सकी।

    आगे पढ़िएः समय के साथ बदलने लगा भोजपुरी सिनेमा का रंगढंग

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