क्रिमिनल जस्टिस: अधूरा सच रिव्यू- इस मर्डर मिस्ट्री को मजबूत बनाते हैं पंकज त्रिपाठी और स्वास्तिका मुखर्जी
निर्देशक- रोहन सिप्पी
स्टारकास्ट- पंकज त्रिपाठी, श्वेता बसु प्रसाद, पूरब कोहली, स्वास्तिका मुखर्जी, आदित्य गुप्ता, देशना दुगद, गौरव गेरा, कल्याणी मुले
प्लेटफॉर्म- डिज़्नी प्लस हॉटस्टार
एपिसोड - 8 एपिसोड/हर एपिसोड की अवधि - 40 मिनट
"अदालत के ट्रायल में सिर्फ एक जज होता है, जबकि ये मीडिया के ट्रायल में हर आदमी जज होता है", ज़ारा आहूजा मर्डर केस पर काम करते हुए वकील माधव मिश्रा आरोपी मुकुल आहूजा से कहते हैं। पहले दो सीजन की तरह यहां भी मीडिया की गैर- जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग पर काफी फब्तियां कसी गई हैं।

देश की चहेती 14 वर्षीय टीवी चाइल्ड स्टार जारा आहूजा की बॉडी समुंद्र में मछुआरों को मिलती है। उसके शरीर को एसिड से गलाकर उसकी हत्या कर दी गई है। पूरे देश में इस खबर से सनसनी मच जाती है। सभी सबूत जारा के सौतेले भाई मुकुल की ओर इशारा करते हैं, जिसके बाद पुलिस इसे ओपन एंड शट केस मान लेती है। लेकिन मुकुल की मां न्याय पाने के लिए वकील माधव मिश्रा का दरवाजा खटखटाती है। अब ये सिर्फ एक मां की ममता है या सच में मुकुल निर्दोष है, इस सीरीज में माधव मिश्रा इसी राज को बाहर लाने की कोशिश करते हैं।

क्रिमिनल जस्टिस: अधूरा सच
डिज़्नी प्लस हॉटस्टार की चर्चित वेब सीरिज क्रिमिनल जस्टिस का तीसरा सीजन स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध हो चुका है। 8 एपिसोड्स में बंटा बिजेश जयराज द्वारा लिखित यह सीरिज टीनएजर्स से संबंधित कई प्रासंगिक और महत्वपूर्ण मुद्दों को संस्पेंस के साथ लपेटकर परोसता है। खास बात है कि पहले एपिसोड से ही यहां कहानी कहने का तरीका काफी संयमित दिखता है, लिहाजा आप हर एपिसोड के साथ आगे की कहानी के लिए उत्सुक होंगे।

कहानी
लोकप्रिय टीवी बाल कलाकार ज़ारा आहूजा ना सिर्फ दर्शकों की बल्कि अपने मां-पिता की भी चहेती है। हर वक्त उसे स्टारडम का अहसास दिलाया जाता है। उसकी सौतेली मां, अवंतिका (स्वास्तिका मुखर्जी), उसकी मैनेजर भी है और उसके पिता, नीरज (पूरज कोहली), उसके काम के व्यावसायिक पक्ष की देखभाल करते हैं। इस परिवार में 17 वर्षीय बेटा मुकुल भी है, जो अवंतिका की पिछली शादी से है, वह इस परिवार में अलग थलग महसूस करता है। अपनी बहन की स्टारडम की चमक में वह अंधेरे में गुम होता चला गया। नतीजतन उसे गुस्सा / व्यवहार संबंधी समस्याएं होने लगीं और साथ ही वह ड्रग्स का भी सहारा लेने लगा। ऐसे में एक सुबह समुंद्र में मछुआरों को ज़ारा की लाश मिलती है। वीभत्स तरीके से किसी ने उसकी हत्या की है। इस मर्डर में सारे सबूत मुकुल की ओर इशारा करते हैं। जिसके बाद उसे रातों रात गिरफ्तार कर लिया जाता है। हर दिन ज़ारा केस से जुड़े कई तार सामने आते हैं और मुकुल की ज़िंदगी जेल और ब्रेकिंग न्यूज के बीच बंधकर रह जाती है।

अधूरा सच!
जहां पूरी दुनिया की नजरों में मुकुल ही दोषी है। उसकी मां अवंतिका को विश्वास है कि उसके बेटे ने ये अपराध नहीं किया है। वह वकील माधव मिश्रा के पास पहुंचती है, जिसके बाद केस का अनदेखा पक्ष भी सामने आने लगता है। इधर माधव मिश्रा इस केस की तह तक जाने की कोशिश में लगे हैं.. उधर रिमांड होम में मुकुल को अन्य अपराधियों द्वारा बहुत प्रताड़ित किया जाता है। वहीं, मीडिया उसे वहशी, दरिंदा का टैग दे देती है। इस केस में अब माधव ही मुकुल की एकमात्र उम्मीद है। पूरी समाज के विरोध में खड़े होकर माधव मिश्रा कैसे अपने केस को पुख्ता करते हैं, इसी के इर्द गिर्द पूरा प्लॉट बुना गया है। इस मर्डर मिस्ट्री के साथ निर्देशक ने टीनएजर्स से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं, जो बेहद प्रासंगिक है।

अभिनय
क्रिमिनल जस्टिस के पहले सीज़न से जुड़े पंकज त्रिपाठी इस सीज़न में भी अपनी लय में दिखे हैं। अब वह इस किरदार को जिस सहजता के साथ निभा ले जाते हैं, लगता है माधव मिश्रा के किरदार में रच बस गए हों। खैर, रियल लाइफ में भी उनमें वही सहजता है, जो स्क्रीन पर भी उभर कर आती है। वहीं, विपक्ष वकील के किरदार में श्वेता बसु प्रसाद ने भी अच्छा काम किया है, लेकिन उनके किरदार को थोड़ा और गहरापन देने की जरूरत थी। वहीं, पूरब कोहली, स्वास्तिका मुखर्जी, गौरव गेरा, कल्याणी मुले जैसे कलाकारों ने कहानी को बांधे रखने में पूरा सहयोग दिया है। आरोपी की असहाय मां के रूप में स्वास्तिका इस सीरीज में सबसे दमदार रही हैं।
कहानी मुख्य तौर पर दोनों बच्चे आदित्य गुप्ता और देशना दुगद के इर्द गिर्द घूमती है और दोनों ही अपने किरदारों में मजबूत दिखाई दिये हैं। खासकर आदित्य कम डायलॉग्स में भी अपने हावभाव से इंप्रेस करने में सफल रहे हैं।

निर्देशन
पहले दो सीजन की बड़ी सफलता के बाद निर्देशक के लिए यह एक बड़ी चुनौती होती है कि अगला सीजन भी उम्मीदों पर खरी उतरे। बता दें, पहले सीजन का निर्देशन तिग्मांशु धूलिया और विशाल फुरिया ने किया था। दूसरे सीजन का रोहन सिप्पी और अर्जुन मुखर्जी ने। वहीं, इस बात निर्देशन का जिम्मा सिर्फ रोहन सिप्पी ने उठाया है। बता दें, 'क्रिमिनल जस्टिस: अधूरा' अंत तक बांधे रखने में सफल रही है। पटकथा और प्रभावशाली संवाद के अलावा, इसका श्रेय सीरीज के स्टारकास्ट को भी देंगे। मां- बाप के फैसलों का प्रभाव बच्चे की जिंदगी में कितना असर पैदा कर सकता है, इस सीजन में इस पर काफी फोकस किया गया है। चूंकि इस सीजन में विक्टिम और आरोपी, दोनों ही टीनएजर हैं। टीनएजर्स से और उनके पैरेंट्स से जुड़ी समस्याओं को, उनके रिश्ते में पनपती दूरियों को निर्देशक ने गहरे तक समझाने की कोशिश की है।

तकनीकी पक्ष
तकनीकि पक्ष की बात करें तो सिनेमेटोग्राफर सिरसा रे ने कोर्ट रूम ड्रामा को पर्दे पर बेहतरीन उतारा है। अनीरबन सेनगुप्ता का साउंड डिजाइन कहानी में एक उचित गंभीरता बनाए रखता है। वहीं, अभिजीत देशपांडे की एडिटिंग थोड़ी और कसी जा सकती थी।

क्या अच्छा क्या बुरा
इस सीरिज के संवाद और अभिनय इसके मजबूत पक्ष हैं। "न्याय बदला नहीं, बदलाव की उम्मीद है" जैसे संवाद सुनकर आजकर समाज में चल रहे कई मुद्दों की अनायास ही याद आ जाती है। वहीं, एक पक्ष जो कहानी को थोड़ा कमजोर करती है, वह है एपिसोड की लंबाई। लगभग 45 मिनट लंबे हर एपिसोड थोड़ा खिंचे हुए लगते हैं। साथ ही कुछ किरदारों को काफी अधपका छोड़ दिया गया है। श्वेता बसु प्रसाद का ट्रैक कहीं नहीं जाता, ज़ारा और उसके माता-पिता के बीच की कॉम्लेक्स रिश्ते को भी अच्छे से नहीं उभारा गया है।

रेटिंग
क्रिमिनल जस्टिस को पंकज त्रिपाठी के कोर्ट रूम दृश्यों और स्वास्तिका मुखर्जी के परफॉर्मेंस के लिए देखें। पहले दो सीजन की तुलना में तीसरा सीजन लेखन के मामले में थोड़ा कमजोर है, लेकिन यदि आप मर्डर मिस्ट्री देखना पसंद करते हैं तो निराश नहीं होंगे। फिल्मीबीट की ओर से सीरिज को 3 स्टार।


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