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    'सीरियस मेन' फिल्म रिव्यू- सुधीर मिश्रा के इस प्रभावी व्यंग्य में दमदार दिखे हैं नवाजुद्दीन सिद्दीकी

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    Rating:
    3.0/5

    निर्देशक- सुधीर मिश्रा

    कलाकार- नवाजुद्दीन सिद्दीकी, इंदिरा तिवारी, अक्षत दास, नास्सर, श्वेता बसु प्रसाद

    प्लैटफॉर्म- नेटफ्लिक्स

    शुरुआती दृश्य में ही अपने अंधेरे कमरे में बंद अय्यन मणि (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) जिंदगी की व्याख्या करते हुए कहता है- "जिंदगी ऐसी ही है, कॉम्प्लेक्स.. आदमी बेमतलब ही पैदा होता है, मरता भी बेमतलब ही है.." उसे हमेशा अपने दादाजी की मृत्यु की घटना याद आती है, कि किस तरह को वो चलती ट्रेन ही चल बसे थे, जब किसी ने उनके कान में आकर इतना भर कह दिया था कि वो फर्स्ट क्लास कपार्टमेंट में चढ़ आए हैं, जो सिर्फ ब्राह्मणों के लिए होता है।

    मनु जोसफ के इसी नाम से लिखी गई किताब पर आधारित फिल्म 'सीरियस मेन' जाति, वर्ग और वर्ण के आधार पर बंटे हुए समाज पर तंज कसती है। फिल्म का संदेश गंभीर और सामाजिक ताने बाने के लिए अति महत्वपूर्ण है, लेकिन निर्देशक सुधीर मिश्रा ने आसान तरीके से इसे सामने रखने की कोशिश की है।

    कहानी

    कहानी

    'सीरियस मेन' की कहानी एक तमिल दलित परिवार के इर्द गिर्द घूमती है। अय्यन मणि (नवाजुद्दीन) अपने बेटे आदि (अक्षत दास) को जीवन में वह सबकुछ पाते हुए देखना चाहता है, जो इस पक्षपाती समाज में उसे नहीं मिल पाया- बराबरी का अवसर और समाज के हर वर्ग से इज्जत। लेकिन अपने बच्चे को विलक्षण प्रतिभा संपन्न दिखाने हेतु वह कई हदें पार करता जाता है। जैसा कि अय्यन एक दृश्य में अपनी पत्नी से कहता है- "मैंने अपनी महत्वाकांक्षा के सर्कस में अपने बेटे को ही जोकर बना दिया है"।

    किरदार

    किरदार

    सामाजिक पक्षपात और भेदभाव पर सालों से फिल्में बनती रही हैं, लेकिन 'सीरियल मेन' को इसके किरदार अलग बनाते हैं। बतौर पिता नवाजुद्दीन सिद्दीकी उम्दा दिखे हैं, वहीं फिल्म के मजबूत पक्ष बनकर उभरे हैं उनके बेटे के किरदार में अक्षत दास। वह हर दृश्य में नवाजुद्दीन से कंधे से कंधा मिलाकर चले हैं। फिल्म मूल रूप से इन्हीं दो किरदारों के बीच घूमती है। इनका रिश्ता एक दृश्य में भावुक करता है, दूसरे में व्यग्र। दोनों किरदारों से शुरुआत से ही आप खुद को जुड़ा हुआ पाते हैं।

    समाजिक व्यवस्था पर व्यंग्य

    समाजिक व्यवस्था पर व्यंग्य

    अय्यन मणि तेज तर्रार है और डॉ.आचर्या (नास्सर) के पर्सनल असिस्टेंट के तौर पर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फंटामेंटल रिसर्च में काम करता है। लेकिन सामने वालों की आखों में खुद के लिए इज्जत की कमी हमेशा उसे खलती है। वह समाज के नियम- कायदे से अभिज्ञ नहीं है। ऐसे में वह अपने बेटे को ऐसा बनाता है कि वह देश भर में अपनी विद्वता के लिए प्रचलित हो जाता है। लोग उसे जूनियर अब्दुल कलाम और आइंस्टीन जैसी उपाधि देते हैं। लेकिन इसके साथ ही छिपा है एक गहरा राज (spoiler), जिसे हम नहीं बताना चाहेंगे।

    क्या अच्छा, क्या बुरा

    क्या अच्छा, क्या बुरा

    फिल्म के कुछेक संवाद काफी प्रभावी हैं। वहीं, नवाजुद्दीन और अक्षत के बीच के कुछ दृश्य दिल को छूते हैं। फिल्म व्यंग्य से शुरु होते हुए गंभीर और फिर मार्मिक होती जाती है। नवाज की पत्नी के किरदार में इंदिरा तिवारी का किरदार अच्छा गढ़ा गया है। पिता और बेटे के बीच इंदिरा का किरदार पुल की तरह काम करता है। लेकिन, श्वेता बसु प्रसाद जैसी उम्दा अदाकारा को निर्देशक ने काफी कम जगह दी है, जिस पर अफसोस किया जा सकता है। किताब पर आधारित यह फिल्म कई हिस्सों में काफी धीमी हो जाती है। मुख्य पात्रों को स्थापित करने में काफी समय दिया गया है, जो थोड़ा ऊबा देती है और कहानी के प्रभाव पर असर डालती है।

    2 अक्टूबर को नेटफ्लिक्स पर

    2 अक्टूबर को नेटफ्लिक्स पर

    सिनेमेटोग्राफ Alexander Surkala ने मुंबई के सार को पकड़कर रखा है, सिर्फ एक तुलना हेतु शायद। यह खास है क्योंकि इस फिल्म में लोकेशन से ज्यादा कहानी और किरदारों के हाव भाव महत्व रखते हैं। सुधीर मिश्रा के निर्देशन में बनी 'सीरियस मेन' जातिगत भेदभाव के अलावा असमानता, अभाव, भष्ट्राचार, राजनीति जैसे विषयों को भी छूती जाती है। फिल्म 2 अक्टूबर को नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध होगी।

    English summary
    Serious Men is a satirical and hard hitting take on society divided by class and caste starring Nawazuddin Siddiqui and supremely talented Aakshath Das. Film directed by Sudhir Mishra.
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