पंकज त्रिपाठी से कुमुद मिश्रा तक - बॉलीवुड में बदल रही है पिता की छवि, ये रहे हैं सबसे मज़बूत पिता
बचपन से हर किसी ने एक बात सीखी है कि मां दोस्त होती है और पिता से डरना होता है। पापा को आने दो, वाले जुमले तो आपने, हमने हर किसी ने सुने होंगे। लेकिन बॉलीवुड धीरे धीरे अब ये जुमले बदलने लगे हैं। पिता की सख्त इमेज से इतर, ये पिता सख्त और मज़बूत तो हैं लेकिन ये सख्ती और मज़बूती अपने बच्चों के लिए कंधा बनने के इस्तेमाल आ रही है।
हालांकि, पुराने दिनों में भी पिता की छवि सख्त और मज़बूत ही थी। लेकिन ये सख्ती और मज़बूती पिघलते पिघलते, फिल्म का क्लाईमैक्स आ जाता है। कभी कभी इस सख्ती के कारण पिता सब कुछ खो देते थे, जैसे मोहब्बतें का शंकर नारायण।

हालांकि धीरे धीरे, बदलाव की बयार के साथ बॉलीवुड में भी पिता के किरदारों पर बारीकी से काम किया गया है और एक परिवार में और एक बच्चे के जीवन में उनके त्याग और उनके समर्पण की कहानियों ने भी परदे पर जगह ली है।
20 जून को फादर्स डे के मौके पर हम आपके लिए लाए हैं बॉलीवुड के सबसे यादगार पिता के किरदार

ईश्वरचंद्र ठाकुर - वक्त
विपुल अमृतलाल शाह द्वारा निर्देशित, वक्त - द रेस अगेन्सट टाईम एक ऐसे पिता की कहानी थी जिसने लाड़ - दुलार में कब अपने बेटे को बिगाड़ दिया, उसे एहसास ही नहीं हुआ। ऐसे में ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव पर खड़े ईश्वरचंद्र, वो सब कुछ करने की कोशिश करते हैं जो उनके बेटे को आत्मनिर्भर बना सके। भले ही इसके लिए उन्हें अपने बेटे को खुद से दूर रखना पड़े। फिल्म में अक्षय कुमार ने अमिताभ बच्चन के बेटे की भूमिका निभाई थी और ईश्वरचंद्र के किरदार में अमिताभ बच्चन ने सबकी आंखें नम कर दीं थी।

आलोक नाथ - विवाह
आलोक नाथ पर लगे मी टू के आरोपों से पहले उनकी ऑन स्क्रीन छवि बिल्कुल इसके विपरीत थे। वो परदे के सबसे संस्कारी बाऊजी थे और यही कारण था कि राजश्री प्रोडक्शन्स की फिल्मों में पिता का Prototype आलोक नाथ थे। उनके निभाए सभी किरदार यादगार थे लेकिन विवाह में अमृता राव के पिता की भूमिका में उन्होंने उस वक्त दर्शकों का दिल ज़रूर जीता था।

विनय पाठक - चिंटू का बर्थ डे
शायद ही ये फिल्म ज़्यादा लोगों ने देखी हो लेकिन हम आपको सलाह देंगे कि ईराक - अमरीका के युद्ध में फंसे बग़दाद और बग़दाद में फंसे एक पिता मदन तिवारी, कैसे अपने छह साल के बेटे चिंटू का छठवां जन्मदिन एक केक के साथ मनाने की हर संभव कोशिश करते हैं, ये जानने के लिए ये फिल्म ज़रूर देखिए। एक पिता के तौर पर विनय पाठक की लाचारगी लेकिन उसके बावजूद अपने छोटे से बेटे को नकारात्मक ना होने देने की कोशिश सबका दिल जीतने के लिए काफी थी।

सुनील दत्त - मुन्नाभाई एमबीबीएस
मुन्नाभाई एमबीबीएस में सुनील दत्त बेहद छोटे से किरदार में दिखाई दिए थे। लेकिन एक पिता, जीवन में कितने मायने रखता है, ये उन्होंने एक छोटे से किरदार में ही सिखा दिया था। फिल्म में अपने बेटे मुरली को डॉक्टर बनते देखने के सपना और फिर उसे एक गुंडा मुन्ना बना देख टूट कर बिखरना हर किसी को एक टीस दे गया था।

परेश रावल - संजू
फिल्म संजू में परेश रावल, सुनील दत्त की भूमिका में दिखाई दिए थे। सुनील दत्त ने किस तरह, संजय दत्त को उनकी ज़िंदगी के सबसे अंधेरे भाग से उबारा था परेश रावल ने रणबीर कपूर के साथ मिलकर उस किरदार में जान फूंक दी थी। ज़िंदगी के सबसे कमज़ोर दिनों में एक पिता का कंधा कितना ज़रूरी होता है ये सुनील दत्त की भूमिका में परेश रावल ने सिखाया था।

अभिषेक बच्चन - पा
कुछ पिता ऐसे होते हैं जो भले ही शुरू में कुछ गैर ज़िम्मेदाराना गलतियां करते हैं लेकिन उन गलतियों को सुधारने में ज़्यादा वक्त नहीं लेते और फिर अपनी गलतियों को ठीक करने के लिए वो एड़ी चोटी का ज़ोर लगाने से नहीं कतराते हैं और ना ही अपनी ज़िम्मेदारियां लेने से।

कमल हासन - चाची 420
कुछ पिता होते हैं जो ना आव देखते हैं और ना ताव। बस उनके लिए अपने बच्चे के साथ से ज़्यादा ज़रूरी कुछ नहीं होता। फिर ना कुछ सही होता और ना गलत। अपने बच्चे के चेहरे पर एक मुस्कान लाने के लिए वो हर जतन करने को तैयार रहते हैं। ऐसा ही एक किरदार निभाया था कमल हासन ने चाची 420 में।

अनुपम खेर - दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे
अगर दुनिया के सबसे Cool Dad का अवार्ड देना होगा तो वो शायद अनुपम खेर को जाएगा क्योंकि जितना बेस्ट फ्रेंड वो अपने बेटे के इस फिल्म में थे उतने बेस्ट फ्रेंड तो वाकई बेस्ट फ्रेंड भी नहीं होते। भले ही ये किरदार काफी ज़्यादा काल्पनिक था क्योंकि कोई भी पिता अपने बेटे को उसकी गर्लफ्रेंड भगाने में मदद ना करेगा और ना ही ऐसा करना चाहिए। लेकिन जो भी कहिए, धरमवीर मल्होत्रा थे बड़े कूल!

राजेश खन्ना - अवतार
अवतार किशन के किरदार में राजेश खन्ना उस पिता की मिसाल थे जो ये दिखा देता है कि किसी भी उम्र में अपनी काबिलियत के दम पर अपने पैरों पर खड़ा हुआ जा सकता है। तब भी जब आपके बच्चे गलत रास्तों पर चल जाएं और अपने माता पिता की इज़्जत करना छोड़ दे। लेकिन एक पिता अपना सम्मान वापस जीतना जानता है। अमिताभ बच्चन ने बाग़बान में भी कुछ ऐसा ही किरदार निभाया था।

अमरीष पुरी - दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे
परंपरा, प्रतिष्ठा, अनुशासन वाले Zone से बाहर निकल कर जा सिमरन जी ले अपनी ज़िंदगी बोलना वाकई पूरा personality makeover है और इसलिए अमरीश पुरी का किरदार चौधरी बलदेव सिंह ढेर सारी तालियों के हक़दार हैं। क्योंकि बहुत मुश्किल होता है अपनी सोच को बच्चों के लिए वक़्त के हिसाब से बदल देना। और कई पिता उनसे प्रेरणा ले सकते हैं। आपकी सोच और विचार कितने ही ज़मीन से जुड़े हों लेकिन वो जड़ें तब काट देनी चाहिए जब वो आपके और आपके बच्चों के बीच फंदा बनने लगें।

बरेली की बर्फी - पंकज त्रिपाठी
पिता बेटे का दोस्त तो होता ही है लेकिन लेकिन पिता एक बेटी का भी दोस्त हो सकता है ये दिखाया पंकज त्रिपाठी के किरदार नरोत्तम मिश्रा ने। वो अपनी बेटी के साथ सिगरेट के दो कश मारकर उसकी दिक्कतों को धुंए में उड़ाने की कोशिश भी करता है और अपनी बिट्टी को उसके जीवन के दो राहे पर मदद करने की कोशिश भी बखूबी करता है।

अनिल कपूर - दिल धड़कने दो
फिर आते हैं कमल मेहरा जैसे पिता जो भले ही दुनिया के लिए कितने ही अमीर और कितने ही Sophisticated क्यों ना हो लेकिन दिल से वो अभी भी वही पंजाबी गबरू हैं जो दो घूंट अंदर जाने के बाद अपने बच्चों के साथ जमकर भांगड़ा कर सकता है। बेटे और बेटी में फर्क करता है लेकिन गलती दिखाने पर उसे सुधारने की हिम्मत भी दिखाता है।

अमिताभ बच्चन - 102 नॉट आउट
ज़िंदादिली के मामले में अगर कोई पिता परदे पर अपनी उम्र से ज़्यादा जिया है तो वो हैं दत्तात्रेय वखारिया। अमिताभ बच्चन ने इस किरदार में उसकी ज़िंदगी से भी ज़्यादा जान फूंकी थी। एक 102 साल का पिता, अपनी ज़िंदगी खत्म होने से पहले अपने 80 साल के बेटे को ज़िंदगी खुलकर जीने का सलीका बता जाता है। फिल्म में अमिताभ बच्चन के बेटे की भूमिका निभाई थी ऋषि कपूर ने।

इरफान खान - अंग्रेज़ी मीडियम
इरफान खान की आखिरी फिल्म थी अंग्रेज़ी मीडियम जिसमें इरफान एक ऐसे पिता की भूमिका में नज़र आए जो अपनी इकलौती बेटी को विदेश भेजने के मत में नहीं है क्योंकि वही बेटी उसकी ज़िंदगी की इकलौती साथी है। लेकिन बेटी की इच्छा के आगे वो पिता अकेलेपन को चुन लेता है जिसके कि उसकी नन्हीं परी आसमान में उड़ सके।

अमिताभ बच्चन - पीकू
फिर होते हैं भास्कर बनर्जी जैसे पिता जो दिन भर आपको इरिटेट कर सकते हैं लेकिन उनकी कुछ आदतें इतनी क्यूट होती हैं कि आप उनसे ज़्यादा देर नाराज़ नहीं रह सकते। ये वो पिता हैं जो अपनी बेटियों को इतना मज़बूत और आत्मनिर्भर बनाते हैं कि वो नहीं चाहते कि उनकी बेटी किसी ऐसे आदमी को ज़िंदगी भर साथ निभाने का वादा करे जिसके कारण उसकी बेटी का Skill set केवल घर चलाना रह जाए। भले ही बेटी को ज़िंदगी भर अकेला रहना पड़े।

फ़ारूख़ शेख़ - ये जवानी है दीवानी
और कुछ पिता होते हैं संजय थापर की तरह। जो परछाई की तरह केवल अपने बेटे के साथ ना होकर भी उसे साथ होने का एहसास दिलाते हैं। जो भले ही हर रात चिंता में जगते हैं लेकिन फिर भी अपने बच्चों को उड़ने देते हैं, फिसलने देते हैं, संभलने देते हैं और गिरने भी देते हैं।

आमिर खान - दंगल
महावीर फोगाट जैसे पिता आपको भले ही रूढ़ीवादी और बहुत ही ज़्यादा सख्त लग सकते हैं। लेकिन ऐसे पिता हीरे तराशते हैं जिन पर उनके समाज और देश को गर्व होता है। इनके बच्चों को भले ही लगे कि उनके पिता उनसे प्यार नहीं करते हैं, उनकी सोच पिछड़ी है लेकिन बाद में ये बच्चे भी मानते हैं कि अनुभव से बड़ा गुरू और पिता से बड़ा मार्गदर्शक कोई नहीं होता।

ऋषि कपूर - कपूर एंड सन्स
और कुछ पिता होते हैं अमरजीत कपूर जैसे। जो दादाजी भले ही हों लेकिन फिर भी ज़िंदगी में उस खालीपन को पूरा करते हैं जो कुछ पिता दे जाते हैं। अमरजीत कपूर को परिवार को बांध कर रखना आता है चाहे वो ज़ोर - ज़बरदस्ती से हो या ज़िद से या फिर केवल ड्रामा कर सबका ध्यान अपनी ओर खींचने से। लेकिन फिर भी अमरजीत कपूर को परिवार को बांध कर रखना आता है। भले ही ये सारी कोशिश एक फैमिली फोटो के लिए ही क्यों ना हो।

कुमुद मिश्रा - थप्पड़
कुमुद मिश्रा जैसे पिता धीरे धीरे समाज में दिखाई दे रहे हैं और ये हमारी और आपकी कोशिशों का नतीजा है। और ये हम सबके लिए एक उपलब्धि है। थप्पड़ में कुमुद मिश्रा का एक डायलॉग हर किसी के दिल को छू गया होगा। जब पति से थप्पड़ खाने के बाद उनकी बेटी अलग होने का फैसला करती है और अपने पिता से पूछती है कि मैं गलत तो नहीं कर रही। तो उसका पिता उसे सब ठीक हो जाएगा के सपने नहीं दिखाता है। बल्कि वो कहता है - हम तो हमेशा सही सोच कर करते हैं बेटा, गलत तो बाद में पता चलता है। कई बार सही करने का रिज़ल्ट हैप्पी नहीं होता, तो ठीक है।

अमिताभ बच्चन - कभी खुशी कभी ग़म
पिता एक बड़े सायेदार पेड़ की तरह होता है जो अपने बच्चों को हर तरह का संरक्षण देता है। लेकिन जब ये पेड़ ठूंठ हो जाए तो फिर वो बच्चे आपसे दूर होने लगते हैं। इसलिए जब फल लगने लगें तो पेड़ को झुक जाना चाहिए, एक पिता को भी विनम्र हो जाना चाहिए ये सिखाया था अमिताभ बच्चन के किरदार यशवर्धन रायचंद ने।


Click it and Unblock the Notifications











