पान सिंह तोमर वर्ष 2012 में रिली हुई एक बायोग्राफिकल ड्रामा है, जिसका निर्देशन तिग्मांशु धुलिया ने किया है। तोमर ऐसे नौजवान की कहानी, जो गरीबी के कारण फौज में भर्ती होता है, भूख मिटाने के लिए रेस के ट्रैक पर दौड़ता है, देश के लिए मेडल जीतता है, लेकिन फिर अचानक बंदूक उठाकर डाकू बन जाता है। यह फिल्म एक सच्ची घटना पर अधारित है।
पहले एक नौ जवान फौजी बनता है लेकिन उसे फौज में सलाह दी जाती है कि वो स्पोर्ट्स में चले जाए क्योंकि वह बहुत तेज दौड़ता था। वह पैसों के लिए खेलों में हिस्सा लेने लगा। कई तरह के रेकॉर्ड भी अपने नाम करता है। जब वह अपनी नौकरी से रिचारमेंट लेता है तब वह गांव आकर रहने लगता है। लेकिन तब से उसकी लाइफ में एक और बदलाव आता है उसे अपने चचेरे भाइयों के चलते बंदूक उठाना पड़ता है। वह बागी बन जाता है जमीन के विवाद के कारण उसे बागी बनना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि वह बंदूक उठाने से पहले किसी के पास भी अपनी फरियाद लेकर नहीं पहुंचा। वह थानेदार के पास भी जाता है। लेकिन वहा पर उसके सारे मेडल्स फेक दिए जाते हैं। डाकू बन चुके पान सिंह से जब पूछा जाता है कि आप डाकू कब बने, तो वह गुस्से में कहता है कि 'डकैत तो संसद में बैठे हैं, मैं तो बागी हूं' उसे खुद को बागी कहलाना पसंद था। जब उसे समाज से न्याय नहीं मिला तो वह बागी बन गया। इस बात का उसे अफसोस भी है लेकिन इसके सिवा उसके पास कोई चारा नहीं था।