डिबुक एक बॉलीवुड की आगामी फिल्म है। जो मलयालम फिल्म इजरा की ही रिमेक है। फिल्म में इमरान हाशमी और निकिता दत्ता मुख्य किरदार निभाया है। फिल्म का निर्देशन जयक्रिश्णन ने किया हैं। भूषण कुमार और कृष्ण कुमार फिल्म को प्रोड्यूस किया है। देखें फिल्म के कास्ट और क्रू कहानी माही (निकिता दत्ता) एक नवविवाहित महिला है जो अपने घर में एक प्राचीन यहूदी बॉक्स लाती है। जब माही और उसके पति सैम (इमरान) को असामान्य अनुभव होने लगता हैं, तो उन्हें जल्द ही पता चलता है कि बॉक्स एक दुष्ट आत्मा वाला डिबुक है। इसके बाद दंपति इसके रहस्य को जानने के लिए एक रब्बी की मदद लेता है। क्या वे अपने अजन्में बच्चे को इस कठिन परीक्षा से बचा पाएंगे? यही डिबुक की कहानी है। नौकरी का एक नया अवसर सैम और माही (निकिता दत्ता) को मुंबई से मॉरीशस जाने का मौका देता है। अलग धर्म में शादी करने की वजह से माही का परिवार सैम से दूरी बनाकर रखता है। अपने गर्भपात से उबरने के लिए संघर्ष करते हुए माही को विदेश में नए सिरे से शुरुआत करने की उम्मीद है। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर है। ये नई शुरुआत बड़ी मुसीबतों का आगाज है। माही अपने घर की सजावट के लिए सामानों की खरीददारी कर रही होती है, जब उसकी नजर एक खूबसूरत नक्काशीदार बॉक्स पर जाती है। 16वीं शताब्दी के इस बॉक्स को वह घर लेकर आती है और उसकी खूबसूरती और रहस्य से मोहित वह बॉक्स को खोलती है। वह बॉक्स दरअसल एक डिबुक है। जैसे ही माही उस बॉक्स को खोलती है, उसमें से एक आत्मा निकलकर माही के शरीर में प्रवेश कर जाती है। एक ऐसी आत्मा जो जब तक सब बर्बाद ना कर दे, रूकती नहीं। इसके बाद उस घर में असामान्य घटनाएं होनी शुरु हो जाती हैं। सैम भूत प्रेत पर विश्वास नहीं करता लेकिन इन चीजों से निपटने के लिए वह फादर गेब्रियल की मदद लेता है। इस बीच कई तरह के ट्विस्ट आते हैं। सैम अपनी पत्नी को बुरी आत्मा के चंगुल से बचाने के लिए कहां तक जाएगा, आगे की कहानी इसी के इर्द गिर्द घूमती है।
डिबुक में बंद आत्मा की कहानी में रोमांच की कमी है, जो फिल्म को और कमजोर बनाती है। खासकर फिल्म का क्लाईमैक्स निराश करता है। फिल्म के स्पेशल इफैक्ट्स और बैकग्राउंड स्कोर एक पॉजिटिव पक्ष है। फिल्म के पक्ष जो काम नहीं करता है, वो है हर कदम पर रहस्य पैदा करने की कोशिश।
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