'आम' v/s 'खास' की कहानी है Zed Plus : डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी
फिल्म पिंजर के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी की अगली फिल्म 'जेड प्लस' रिलीज को तैयार है। यह फिल्म 28 नवंबर को सिनेमाघरों में दस्तक देगी। राजनीति के इर्द- गिर्द घूमती यह कहानी है एक 'आम' आदमी असलम की।

असलम राजस्थान के एक छोटे कस्बे में रहता है और पंक्चर की दुकान संभालता है। देश में गठबंधन सरकार का राज है जो भ्रष्टाचार और कंम्यूनलिज्म से जूझ रही है। हर कोई सरकार बचाने की जुगत में लगा है। ऐसे में असलम की मुलाकात होती है, देश के प्रधानमंत्री से, जिसके बाद कुछ ऐसा होता है कि सरकार उसे जेड प्लस सेक्योरिटी मुहैया करा देती है। यहां से कहानी मोड़ लेती है।
फिल्म ''जेड प्लस'' के बारे में निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी का क्या कहना है, आइए जानते हैं। पेश है बातचीत के मुख्य अंश:
एक वाक्य में Zed plus क्या है?
एक वाक्य में 'जेड प्लस' आम vs खास की कहानी है। हमारे समाज में सिर्फ धर्म और जाति की वजह से ही अलगाव नहीं होते। बल्कि हमारे समाज में अलगाव की एक खास वजह है, आम vs खास की लड़ाई। हम सब उन्ही दो वर्गों में बंटे हैं। और इसी की कहानी है जेड प्लस। समाज की विडंबना है कि, जो लोग खास होते हैं, वे कहीं न कहीं आम लोगों की मदद से ही ऊंचाइयों तक पहुंचते हैं, लेकिन वहां पहुंचने के बाद वे सबसे पहले आम जनता को भूल जाते हैं। मेरा मानना है कि देश में वीआईपी जैसी कोई परिभाषा ही नहीं होनी चाहिए। जो लोगों को एक दूसरे से दूर कर दे। आज देश में राजनीति और कॉरपॉरेट जगत से जुड़े लोग जो ऊपर बैठे हैं, उन्हें आम लोगों के साथ सबसे ज्यादा जुड़ा होना चाहिए, लेकिन यही दो क्षेत्र है, जो आम जनता से सबसे दूर हैं।
फिल्म के किरदारों में क्या अलग दिखेगा?
आदिल हुसैन हो या मोना सिंह, कुलभूषण खरबंदा, संजय मिश्रा, मुकेश तिवारी; इन सबको हमने अलग अलग तरह के किरदार निभाते देखा है। लेकिन आज के पहले आपने कभी कुलभूषण खरबंदा को प्रधानमंत्री(किरदार) का पद संभालते नहीं देखा होगा। वहीं, मोना सिंह ने भी फिल्म में काफी संजीदा अभिनय किया है। इसे देखने के बाद शायद आप सबके दिमाग से 'जस्सी जैसी कोई नहीं' और '3 इडियट्स' वाली मोना की छवि बदल जाएगी। वहीं आदिल हुसैन जैसे अभिनेता को भी अभी तक किसी निर्देशक ने उतना स्क्रीन स्पेस नहीं सौंपा है, लेकिन इस फिल्म आप असलम को देखकर हैरान रह जाएंगे। कुल मिलाकर फिल्म के कलाकार अपनी पुरानी छवि तो तोड़ते, काफी अलग नजर आएंगे।
राजनीति तो कई फिल्मों में दिखाई जा रही है, Zed Plus में क्या अलग दिखेगा?
डॉ. द्विवेदी: जेड प्लस की राजनीति सॉफिसटिकेटेड है। अक्सर हमारी फिल्मों में राजनीति को काफी भद्दे ढ़ंग से पेश किया जाता है। शायद ही कभी किसी नेता की सकारात्मक छवि को बॉलीवुड ने दर्शकों के सामने रखा होगा। लेकिन जेड प्लस में ऐसा नहीं है। इसमें ''खास'' वर्ग को दिखाया गया है, व्यंग्य कसा गया है, लेकिन राजनीति को बुरा नहीं दिखाया गया है। जेड प्लस में सरकार और आम जनता के बीच की दूरी को दिखाया गया है। आजकल कई फिल्में बनती हैं, कोई 100 करोड़, तो कोई 200 करोड़ कमाती है, लेकिन किसी भी फिल्मों में आम आदमी को नहीं दिखाया जाता। मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि भाई! कभी आम की भी बात कर लो।
आपकी फिल्मों और सीरियल(चाणक्य) में साहित्य और इतिहास का काफी महत्व रहा है, Zed plus में हमें क्या मिलेगा?
डॉ. द्विवेदी: (हंसते हुए) यह फिल्म भी उपन्यास पर आधारित होती, लेकिन रोक लिया गया। जेड प्लस' राजस्थान की पृष्ठभूमि पर लिखी रामकुमार सिंह की कहानी पर आधारित है। दरअसल, रामकुमार इस कहानी को किताब का रूप देना चाहते थे। लेकिन जब हमें कहानी पता चली , तो इस दिलचस्प कहानी को बड़े पर्दे पर उतारने के लालच को रोक न पाए। हालांकि, फिल्म रिलीज होने के बाद जेड प्लस उपन्यास के रूप में आप तक जरूर पहुंचेगी। चाणक्य एक राष्ट्र निर्माण की महागाथा थी, पिंजर एक राष्ट्र के बंटवारे की त्रासदी की कहानी थी, उसी तरह जेड प्लस मौजूदा भारत में आम आदमी की दास्तान है।
Zed Plus को लोग क्यों देंखे?
डॉ. द्विवेदी: आजकल बॉलीवुड फिल्मों के बारे में अक्सर कहा जाता है कि फिल्म देखनी है तो दिमाग घर में छोड़कर आओ। लेकिन मैं सभी दर्शकों से यह कहना चाहूंगा कि जेड प्लस देखने के लिए दिमाग साथ लेकर आएं। क्योंकि यह एक ऐसी कहानी है जिससे आप को जोड़ पाएंगे। जहां तक क्यों देंखे कि बात है तो, मेरा मानना है कि फिल्म जेड प्लस पैसा वसूल साबित होगी। यदि आपको तर्कसंगत कहानी के साथ सभी कलाकारों की उम्दा अभिनय और कर्णप्रिय संगीत सुनना है तो जेड प्लस जरूर देंखे।


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