अजीब दास्तान्स एक हिंदी एंथोलॉजी ड्रामा फिल्म है, जिसमे चार अलग-अलग कहानी है। पहली कहानी मजनू है, जिसका निर्देशन शशांक खेतान द्वारा किया गया है। दूसरी कहानी खिलौना है जिसका निर्देशन राज मेहता द्वारा किया गया है। तीसरी कहानी गीली पुच्ची है जिसका निर्देशन नीरज घायवन द्वारा गया है। चौथी कहानी अनकही है जिसका निर्देशन कायोज ईरानी द्वारा किया गया है।
कहानी - मजनू
पहली कहानी का निर्देशन शशांत खेतान ने किया है। लिपाक्षी (फातिमा सना शेख) और बबलू (जयदीप अहलावत) एक नविवाहित जोड़ा है, जिनकी शादी 'गठबंधन की शादी' है। बबलू कमरे में घुसते ही कहता है- "हम किसी और से प्यार करते थे, तो आपसे कभी प्यार नहीं पाएंगे। सॉरी नहीं कहेंगे क्योंकि इस शादी से दोनों ही परिवार का फायदा हुआ है।" लिपाक्षी पल भर को ठिठकती है और फिर खीझ के साथ कहती है- "इस देश के सभी मर्द ढ़ोंगी क्यों हैं?" पहले दृश्य से ही निर्देशक यह स्थापित कर देते हैं कि यह शादी का रिश्ता सिर्फ समाज के लिए, यहां लेश मात्र भावनाएं नहीं हैं। लेकिन लिपाक्षी कोई डरी- सहमी या जबरदस्ती रिश्ते में बंधे रहने वाली लड़की नहीं है। वह अपने जीवन में एक मर्द का साथ चाहती है, जो साथ उसे मिलता है राज (अरमान रहलान) से, जो कि बबलू के ड्राइवर का बेटा है। बबलू के नाक के नीचे राज और लिपाक्षी की प्रेम कहानी पनपने लगती है। अब उनकी प्रेम कहानी का अंजाम क्या होता है और इस बीच बबलू की जिंदगी का सबसे अहम पहलू कैसे खुलकर आता है!
कहानी - खिलौना
चारों कहानियों में सबसे मजबूत कहानी खिलौना है, जो आपको सरप्राइज करने में पूरी तरह से सफल होती है। फिल्म के निर्देशक हैं राज मेहता। कहानी समाज को दो वर्गों में बांटती है- एक हैं कोठीवाले.. और दूसरे होते हैं कटियावाले। एक दृश्य में मीनल (नुसरत भरूचा) शिकायती भाव के साथ सुशील (अभिषेक बनर्जी) से कहती है- "ये कोठी वाले किसी के सगे नहीं होते हैं।" सोसाइटी के बाहर एक छोटी दुकान लगाकर इस्त्री का काम करता है सुशील। जबकि मीनल इन्हीं में से एक कोठी में काम करती है और सोसाइटी के बिजली के तारों पर कटिया डालकर अपने घर में बिजली का इंतजाम रखती है। बीच में कुछ अनहोनी घटनाएं घटती हैं, जब मीनल, बिन्नी और सुशील तीनों इस 'कोठीवाले' को सजा देना चाहते हैं। कब, कहां और कैसी सज़ा? यह देखकर आप कांप जाएंगे।
कहानी - गीली पुच्ची
भारती मंडल (कोंकणा) फैक्टरी में बतौर मशीन-मैन काम करती है, जहां लंबे समय से डाटा ऑपरेटर का पद पाने की कोशिश कर रही होती है। अपनी योग्यता पर उसे पूरा भरोसा है। उसे तारीफ तो मिलती है, लेकिन पद नहीं.. क्योंकि वह 'पिछड़ी जाति' से आती है। फैक्टरी का मालिक उसकी जगह एक नई लड़की को ज्वॉइन कराता है, जो है प्रिया शर्मा (अदिति राव हैदरी)। दोनों एक दूसरे से विपरीत महिलाए हैं। शुरुआती तकरार के बाद दोनों के बीच दोस्ती होती है, और फिर बात दोस्ती से आगे बढ़ती है। लेकिन प्रिया शादी शुदा है और यह दिल से यह मानने को तैयार नहीं कि वह समलैंगिक है। वह इसे 'बीमारी' कहती है। वह सामाजिक नियमों और सोच से बंधी है। जबकि भारती हर दिन असहजताओं से गुजरती है। वह भी टूटती है, लेकिन वह मजबूत है।
कहानी - अनकही
नताशा (शेफाली शाह) और रोहन (तोता रॉय चौधरी) की बेटी है समायरा, जिसके सुनने की क्षमता धीरे धीरे जा रही है। नताशा उससे बातचीत करने के लिए साइन लैंग्वेज सिखती है, लेकिन अपने काम में व्यस्त रोहन की बेटी से दूरी बढ़ती ही जाती है। सिर्फ बेटी से ही नहीं, बल्कि नताशा और रोहन का रिश्ता भी बस रेत की महल की भांति टिका हुआ है, जो कभी भी टूट सकता है। ऐसे में नताशा की मुलाकात एक फोटोग्राफर (मानव कौल) से होती है, जो बोल और सुन नहीं सकता। दोनों साइन लैंग्वेज में बात करते हैं। पहली ही मुलाकात में दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ती हैं। धीरे धीरे दोनों एक दूसरे के साथ काफी समय गुजारते हैं। लेकिन क्या अपने बने बनाए रिश्तों और परिवार से दूर जाने की हिम्मत नताशा कर पाएगी? यही इस फिल्म की कहानी है।