महारानी सीज़न 2 रिव्यू: सत्ता Vs सिद्धांत में जीतती हैं हुमा क़ुरैशी, सोहम शाह - अमित सियाल बने मज़बूत साथी
सीरीज़ - महारानी सीज़न 2
प्लेटफॉर्म - सोनी लिव
डायरेक्टर - रवींद्र गौतम
क्रिएटर - सुभाष कपूर
लेखक - सुभाष कपूर, नंदन सिंह, उमाशंकर सिंह
स्टारकास्ट - हुमा क़ुरैशी, सोहम शाह, अमित सियाल व अन्य
एपिसोड/अवधि - 10 एपिसोड/40 मिनट प्रति एपिसोड
राजनीति में रह कर अगर अपने पैसे से घर और गाड़ी खरीदनी पड़े तो उसे परम चूतिया समझना चाहिए। इस एलान के साथ असली राजनीति के असली पहलुओं के साथ और सशक्त होकर लौटा है महारानी का सेकंड सीज़न। पहले सीज़न की कमियों को ठीक करते हुए कहानी को मज़बूती से पकड़ते हुए और दर्शकों को पूरी तरह से मुट्ठी में करने के लिए।

बिहार की राजनीति को केंद्र में रखकर, महारानी का पहला सीज़न जहां एक मुख्यमंत्री की अनपढ़ पत्नी की अपने पति की गैर हाज़िरी में मुख्यमंत्री बनने के बाद पति की कठपुतली बनते हुए सत्ता संभालने की कहानी थी। वहीं दूसरा सीज़न, शुरू होता है एक साल मुख्यमंत्री पद संभालकर राजनीति के दांव पेंच समझने वाली मुख्यमंत्री के साथ।
महारानी है रानी भारती (हुमा क़ुरैशी) की कहानी जो अपने पूर्व मुख्यमंत्री पति भीमा भारती (सोहम शाह) को दाना घोटाले में जेल भिजवा चुकी है और एक साल से सरकार चला रही है। लेकिन अब भीमा भारती उसका पति कम राजनीतिक प्रतिद्विंदी ज़्यादा बन गया है। वो रानी भारती को मुख्यमंत्री का पद देना अपने राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी गलती मानता है।
जेल से बाहर निकलते ही भीमा भारती एलान कर देता है कि अब बिहार की जनता को अपने साहेब और महारानी में से किसी एक को चुनना होगा। वहीं रानी भारती एलान करती है कि वो अपने साहेब और बिहार में से अपने बिहार को चुन चुकी है और अपने माथे से सिंदूर पोंछती है। तो क्या इस बार रानी भारती की नज़र से बिहार की राजनीति, दिलचस्प लग पाती है? जानिए इस समीक्षा में।

पहले सीज़न का RECAP
महारानी की कहानी एक दंपति की। पति भीमा भारती (सोहम शाह) और उसकी पत्नी रानी भारती (हुमा क़ुरैशी)। भीमा भारती, बिहार का मुख्यमंत्री था लेकिन अचानक उसे गोलियों से भून दिया जाता है। अस्पताल में उसकी ही पार्टी के साथ गिद्ध की तरह नज़र गड़ाए बैठे हैं कि वो किसे अपनी सत्ता सौंपेगा। वहीं प्रतिद्विंदी पार्टियां उसकी सरकार गिरने का इंतज़ार कर रही है। लेकिन भीमा भारती, अपने सलाहकार मिश्रा जी (प्रमोद पाठक) की सलाह पर अपनी अनपढ़ पत्नी रानी को मुख्यमंत्री का पद सौंपता है। इसके बाद रानी भारती के लिए ये राजनीति की लड़ाई सिद्धांत और सत्ता की लड़ाई बन जाती है। रानी ईमानदार है और बिहार की राजनीति का इससे वास्ता नहीं है। पिछले सीज़न में उसे ये अंत में समझ आती है जब उसे पता चलता है कि विकास का बिहार इसलिए नहीं हुआ क्योंकि करोड़ों का भ्रष्टाचार उसका पति कर रहा है। रानी अपने पति को साहेब बुलाती है लेकिन वो साहेब की ग़ुलाम बनकर नहीं रहती है। उसे अपने फैसले लेने आ चुके हैं, वो फैसले जो बिहार को ऊपर लेकर जाएं और इसलिए वो अपने पति को जेल भेजती है।

दूसरे सीज़न की कहानी
महारानी का दूसरा सीज़न शुरू होता है भीमा भारती और रानी भारती के बीच की जंग के साथ। भीमा भारती जो जेल से भी भाषण दे रहा है और अपनी जनता को अपनी ही पत्नी के खिलाफ भड़का रहा है। वहीं रानी भारती को सत्ता संभालने आ चुकी है और अब वो मैडम जी हैं। हालांकि, मैडम और साहेब की इस लड़ाई के बीच जहां उनकी पार्टी के नेता पिस रहे हैं तो वहीं बिहार के हुक़्मरान भी। रानी के दिए आदेशों का पालन अचानक से तब रोक दिया जाता है जब साहेब उन फैसलों पर इंतज़ार करने को कहते हैं। जब रानी को इस बात की जानकारी मिलती है तो वो एलान करती है कि सत्ता उसकी है। ये एलान वो अपने पति से भी करती है और यहीं से शुरू होता है एक बेहद दिलचस्प खेल जो आपको बिहार की राजनीति के बिल्कुल ही अलग पहलू दिखाएगा।

मुख्य किरदार - बिहार की राजनीति
महारानी का मुख्य किरदार है बिहार। या यूं कहिए बिहार की राजनीति। राजनीति शब्द सुनते ही सबसे पहला ख्याल आता है कि बड़ी खराब चीज़ है। और ये खराब क्यों है ये आपको बिहार की राजनीति देखकर पूरी तरह समझ आएगा। दूसरा सीज़न शुरू होता है 1999 में जब बिहार कई मुद्दों से जूझ रहा था। पहला सीज़न जहां ठीक से किसी घटना का ज़िक्र नहीं करता है वहीं दूसरा सीज़न सिलसिलेवार बिहार की राजनीति की पलटती दशा और दिशा के साथ कहानी को मज़बूती से आगे बढ़ाता है। चारा घोटाले के बाद जाति गत आरक्षण, धार्मिक हिंसा से लेकर झारखंड के बंटवारे तक सभी मुद्दे, महारानी की कहानी का हिस्सा बनते हैं। और हर मुद्दा कैसे यहां की राजनीतिक पार्टियों के सामंजस्य या अलगाव का कारण बनता है ये भी बहुत ही दिलचस्प तरीके से दिखाई देता है।

कहानी के किरदार
महारानी के तीन मुख्य किरदार हैं - पहली रानी भारती (हुमा क़ुरैशी), दूसरे भीमा भारती (सोहम शाह) और तीसरे नवीन कुमार (अमित सियाल)। नवीन और भीमा किसी ज़माने में साथी रहे हैं और आज एक दूसरे के प्रतिद्विंदी। दोनों ने जब राजनीति में कदम रखा तो जेपी जैसे महान विचारक से प्रेरणा लेते हुए ये बिहार का समाज बदलना चाहते थे। लेकिन अब ये केवल राजनीति को खेल की तरह खेलना चाहते हैं। पांडव है बिहार का पूरा राज्य और कौरव हैं यहां की राजनीति। दोनों के बीच राजनीति के चौपड़ के इस खेल की द्रौपदी है रानी भारती। और रानी की कृष्ण बनती हैं उनकी असिस्टेंट कावेरी श्रीधरन (कनि कुसृति)। इस खेल के कर्ण हैं भीमा भारती के सलाहकार, मिश्रा जी (प्रमोद पाठक) वहीं इस खेल के शकुनी हैं बिहार के अनुभवी नेता गौरी शंकर पांडे (विनीत कुमार)। इस खेल के द्रोणाचार्य हैं महामहिम गोवर्धन दास (अतुल तिवारी)। इन सभी किरदारों को बिहार की राजनीति में बेहतरीन तरीके से बुना है सीरीज़ के क्रिएटर सुभाष कपूर और लेखक नंदन सिंह और उमाशंकर सिंह ने। वहीं डायरेक्टर रवींद्र गौतम ने एक कसी हुई पटकथा को बेहतरीन तरीके से परदे पर उतारने का काम बखूबी कर दिया है।

अभिनय
अगर अभिनय की बात करें तो रानी भारती के किरदार में हुमा क़ुरैशी का किरदार इतना कसा हुआ है कि जब वो इसे परदे पर उतारती हैं तो उनकी गलतियां भी नज़र अंदाज़ करते देर नहीं लगती है। पहले सीज़न की अपेक्षा इस सीज़न में हुमा कुरैशी पूरी तरह से रानी भारती के किरदार में ढल चुकी दिखाई देती हैं। हां, उनकी भाषा पर अभी भी थोड़ा सा प्रश्नचिन्ह लगाया जा सकता है लेकिन उनके चाल चलन और अपने किरदार पर पकड़ इतनी मज़बूत है कि आप बस उन्हें देखते रह जाते हैं। भीमा भारती के किरदार में सोहम शाह आपको उतना ही कन्फ्यूज़ करते दिखते हैं जितना कि राजनीति शब्द। कभी उनके किरदार के प्रति आपको सहानुभूति होती है तो कभी आप उनके घाघ चरित्र को देखकर वाह कह उठते हैं। इन दो किरदारों को पूरी तरह टक्कर देता है अमित सियाल का नवीन। सत्ता की भूख में अंधे हो चुके एक इंसान को कुर्सी की तलब के पीछे अपने उसूल भी तोड़ने में कोई शर्म कोई लाज नहीं है। उसे बस मुख्यमंत्री बनना है और इसकी कीमत कुछ भी हो सकती है। उसके साथी, उसका नेता, उसका धर्म, यहां तक कि उसका राज्य।

सपोर्टिंग किरदार
महारानी की कहानी को मज़बूत बनाने के लिए कई किरदार लगे हैं। और ये सब किरदार बिहार की राजनीति का कोई ना कोई चेहरा उजागर करते हैं। गौरी शंकर पांडे (विनीत कुमार), गोवर्धन दास (अतुल तिवारी), कुंवर सिंह (सुशील पांडे), शंकर महतो (हरीश खन्ना), परवेज़ आलम (इनामुलहक़), ख्याति (तनु विद्यार्थी), कीर्ति सिंह (अनुजा साठे) सब बिहार के नेताओं की भूमिका में है। हर नेता जैसे एक ब्लूप्रिंट है, नेताओं का। इनमें आपको सारे अवगुण मिल जाएंगे। इन सबका सत्ता का अपना अपना स्वार्थ है। लेकिन नेताओं की इस भीड़ में आपको कोई भी नैतिक तौर पर सभ्य नहीं दिखेगा। इसे राजनीति की कड़वी सच्चाई कह लीजिए या समाज का आईना। हर कोई राजनीति के तवे पर अपनी रोटियां सेंकता ये कहावत आपने कई बार सुनी होगी लेकिन रवींद्र गौतम इन रोटियों का बनना विस्तार से आपको अपनी सीरीज़ में दिखाएंगे। ये वो दुनिया है जो केवल लेन देन पर यकीन रखती है। सत्ता के अलावा यहां कोई किसी का सगा नहीं है।

तकनीकी पक्ष
इतने सारे किरदारों के बीच अक्सर कहानियां उलझ जाती हैं लेकिन दस एपिसोड में सुभाष कपूर और उनकी टीम ये गलती कहीं करती नहीं दिखती है। हर किरदार की अपनी भूख है, अपनी अलग कहानी है और अपना अलग राजनीतिक संघर्ष है। सबका लक्ष्य केवल एक है - कुर्सी। वहीं सीरीज़ में रोहित शर्मा के म्यूज़िक की खास तारीफ करनी चाहिए जो बिल्कुल गरम मुद्दे होने के बावजूद अपने म्यूज़िक से कहीं भी ज़बरदस्ती का ड्रामा नहीं बनाते हैं। महारानी का सारा ड्रामा इसकी कहानी से बुना जाता है। बाकी ये सीरीज़ पूरी तरह से ज़मीनी स्तर पर दिखती है। एक अच्छा राजनीतिक थ्रिलर की अगर परिभाषा देनी हो तो महारानी कई मायनों में उसमें फिट बैठती है।

क्या है अच्छा
सीरीज़ की कई अच्छी बातें तो हम आपको बता चुके हैं। महारानी की सबसे अच्छी बात ये है कि इसके छोटे से छोटे किरदार भी अपने संवाद के ज़रिए इतनी मज़बूती से पेश किए गए हैं कि आपको याद रह जाएंगे। एक सीन में रानी भारती के पिता अपनी बेटी से कहते दिखते हैं कि तुम भी उतनी ही व्यस्त हो चुकी हो जितना तुम्हारे साहेब रहते थे। तब तुम उनकी शिकायत करती थी लेकिन अब तुम खुद वैसी बन चुकी हो। वहीं अपनी बेटी को वो ये भी कहते दिखते हैं कि अपने पति को जेल भेजकर तुम पत्नी धर्म से चूक गई हो, मैं तुम्हें बेटी मान भी लूं तो ये गांव तुम्हें अब कभी अपनी बेटी नहीं मानेगा। रानी भारती अपने पति को भ्रष्ट बताते हुए जब खुद का बचाव करती है तो उसका पिता भ्रष्टाचार को छोटी मोटी लेन देन बताकर खारिज कर देता है। उसके लिए भ्रष्ट होने के बाद भी उसका दामाद भीमा भारती एक हीरो है जो समाज के लिए खड़ा रहता है। एक और सीन में जातिगत आरक्षण के विरोध में एक बच्चा अपनी जान देता है जिसके बाद रानी भारती उसकी मां से मिलने जाती है। यहां पर मुख्यमंत्री नहीं दो मां आमने सामने एक दूसरे के साथ बात करती हैं और ये संवाद सशक्त होते हैं।

क्या करता है निराश
महारानी में कुछ निराश करता है तो वो है एक मुख्यमंत्री के रूप में रानी भारती के सफर को पूरी तरह से ना दिखा पाना। जैसे कि सत्ता गिरने के बाद उसे अपनी पार्टी बनाने के लिए लोग कैसे मिले ये कहीं नहीं दिखता है। रानी ये एलान करती है कि उसकी पार्टी में किसी भ्रष्ट को टिकट नहीं मिलेगा तो फिर उसकी नई पार्टी कैसे बनती है क्योंकि उसकी पुरानी पार्टी का हर नेता भ्रष्ट था। वहीं इन सबके बीच वो अपनी मां की ज़िम्मेदारियां निभा रही है लेकिन इनकी झलकियां उसका निजी जीवन समझने के लिए काफी नहीं रहती हैं। वो अपने बच्चों को उनके पिता से मिलने नहीं देना चाहती है जिसके बाद भीमा भारती छल कपट का सहारा लेता है। लेकिन सीरीज़ में इनका ज़िक्र मात्र है।

कहानी की स्टार
महारानी की स्टार है इसके किरदारों का लेखन। हर किरदार उतनी ही बखूबी से तराशा गया है। Political Analyst के रूप में कल्पना का किरदार हो या फिर सत्ता के लिए भूखा एक नौजवान, रानी भारती के भाई के रूप में सन्यासी जिसे सौरभ कुमार ने बखूबी निभाया है। महारानी की सबसे अच्छी खूबी ये है कि इस सीरीज़ का पूरा भार हुमा क़ुरैशी के कंधों पर नहीं आता है। हर कोई अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी निभाता है और इसी वजह से ये सीरीज़ अपने पहले सीज़न से बेहतर चमकती है। सीरीज़ में एक जगह रानी भारती को उनकी सलाहकार समझाती दिखती हैं कि आरक्षण देकर वो पूरा राज्य जलाने वाली हैं। लेकिन रानी कहती है - भीमा भारती से लड़ने के लिए उसके जैसा बनना पड़ेगा। तो क्या रानी, भीमा भारती बन चुकी है? उसूलों और सत्ता की लड़ाई में रानी सामंजस्य बिठा पाती है या नहीं ये अंत तक आप इंतज़ार करेंगे।

देखें या ना देखें
महारानी का दूसरा सीज़न, इसके पहले सीज़न से बेहतर है और कोई दो राय ही नहीं है कि आप ये सीरीज़ छोड़े। बिहार की राजनीति पर बनी ये सीरीज़ आपको राजनीति के असल मायने और ज़मीनी स्तर की सच्चाई बताती है। जो भले ही देखने और सुनने में अच्छी ना हो लेकिन सच्चाई है। इसलिए हमारी ओर से ये सीरीज़ आप बिल्कुल देख सकते हैं।


Click it and Unblock the Notifications











