Caught Out Review: क्रिकेट की दुनिया को हिलाकर रख देने वाला सबसे बड़े कांड को दिखाती है ये डॉक्यूमेंट्री

निर्देशक- सुप्रिया सोबती गुप्ता
भारत में क्रिकेट को लेकर लोगों में अलग ही स्तर का जुनून है। लोग खिलाड़ियों को भगवान तक का दर्जा दे देते हैं। यही कारण है कि 90 के दशक में जब क्रिकेट पर सट्टेबाजी का दाग लगा तो देशभर के क्रिकेट प्रेमियों को गहरा धक्का पहुंचा। नेटफ्लिक्स की 1 घंटा 17 मिनट ये डॉक्यूमेंट्री उन्हीं कड़वी यादों को सामने लाती है, जब इस खेल से जुड़े बड़े से बड़े नाम शक के दायरे में आ गये थे। जब क्रिकेट की चकाचौंध और ग्लैमर में फंसकर कुछ खिलाड़ियों ने इस खेल को शर्मसार कर दिया था।
ये मामला है साल 1997 का, जब पूर्व क्रिकेटर मनोज प्रभाकर ने कपिल देव पर आरोप लगाया था कि उन्होंने मनोज को खराब प्रदर्शन के लिए 25 लाख रुपए ऑफर किये थे। उन्होंने बताया कि कपिल लगातार एक बुकी के संपर्क में थे। फिर यहां से बढ़ते बढ़ते मामला मोहम्मद अजहरुद्दीन तक पहुंच जाता है।
कुछ बड़े पत्रकारों और सीबीआई अधिकारियों के लाइनअप के साथ, क्रिकेट के इस स्कैंडल को धीरे धीरे दर्शकों के सामने रखा जाता है। आउटलुक के पत्रकार अनिरुद्ध बहल ने बताया कि कैसे उनका ध्यान सट्टेबाजी की ओर गया। जब वो क्रिकेट मैच कवर करने के लिए जाते थे तो कुछ पत्रकारों को बुकी के द्वारा कुछ जरूरी जानकारियां मिलती रहती थी। यहीं से अनिरुद्ध ने इस मामले के तह तक जाने का फैसला किया। जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है, कई सनसनीखेज़ खुलासे होते हैं। हैंसी क्रोन्ये कांड पूरे मामले को एक अलग दिशा में ले जाता है। वहीं, बुकी एम के गुप्ता का कुबुलनामा, कपिल देव के बारे में प्रभाकर का दावा और उस समय के स्टार क्रिकेटर मोहम्मद अजहरुद्दीन का सीबीआई द्वारा पकड़े जाना भी इसमें शामिल किया गया है। डॉक्यूमेंट्री में कई पत्रकार और सीबीआई अधिकारी इस मामले पर अपना अनुभव साझा करते हैं, जो कि दिलचस्प है। साथ ही कुछ चर्चित स्टिंग ऑपरेशन भी दिखाए गए हैं, जो सट्टेबाजों के साथ खिलाड़ियों के सांठगांठ को दिखाता है। पत्रकारों ने बताया कि कैसे स्टिंग ऑपरेशन के लिए वो लंदन से खास कैमरा लेकर आए थे, क्योंकि उस वक्त भारत में ये सब उपलब्ध नहीं था।
बहरहाल, ये घटना कितनी ही रोमांचक क्यों ना हो, लेकिन क्रिकेटप्रेमियों के लिए नई नहीं है। डॉक्यूमेंट्री कुछ नए पहलू सामने लाने की कोशिश करती है, जैसे- सट्टेबाजों का नेटवर्क, अंडरवर्ल्ड से कनेक्शन, खिलाड़ियों की बेबसी आदि, लेकिन ये सब काफी धीमी गति में आगे बढ़ता है। डॉक्यूमेंट्री में गति की कमी दिखती है। हालांकि, एडिटिंग काफी अच्छा किया गया है। सभी ट्रैक अच्छे तरीके से बुने गए हैं उस वक्त के प्रेस कॉफ्रेंस के कुछ रियल फुटेज जोड़े गए हैं, जो इसे दिलचस्प बनाते हैं। अंत में जब सीबीआई अधिकारी बताते हैं कि भारत में सट्टेबाजी अवैध है, लेकिन दुर्भाग्य से मैच फिक्सिंग एक आपराधिक अपराध नहीं है.. कहीं ना कहीं दिल को ठेस पहुंचती है।
आज देश और दुनिया में मैच फिक्सिंग शायद आम बात न हो और 'कॉट आउट' हमें बताता है कि इस गंदगी को कैसे साफ किया गया। क्रिकेट प्रेमी हों या ना हों, ये डॉक्यूमेंट्री एक बार जरूर देखी जा सकती है। "कॉट आउट- क्राइम, करप्शन, क्रिकेट" मूल रूप से अंग्रेजी में है, मगर हिंदी, तमिल और तेलुगु डबिंग के साथ भी उपलब्ध है। यह 17 मार्च से नेटफ्लिक्स पर स्टीम कर रही है।


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