Premanand Maharaj ने इसलिए छोड़ा घर, परिवार ने भी बना रखी है दूर, कैसी है वृंदावन के संत की निजी जिंदगी

Premanand Maharaj Family: वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज इन दिनों खूब खबरों में हैं। हाल ही में जगद्गुरू रामभद्राचार्य ने प्रेमानंद महाराज को अज्ञानी कहा था। साथ ही ये भी कहा था कि मैं उन्हें खुला चैलेंज देता हूं कि वो एक शब्द संस्कृत का बोलकर दिखा दें।
हालांकि, जगद्गुरू रामभद्राचार्य के इस बयान के बाद उन्हें काफी ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा। कई लोगों ने उन्हें घमंडी तक कह दिया। लोग प्रेमानंद महाराज को फुल सपोर्ट कर रहे हैं। लेकिन क्या आप उनके बचपन और उनके परिवार के बारे में डिटेल जानते हैं?
बचपन और परिवार
प्रेमानंद महाराज का जन्म कानपुर के सरसौल के अखरी गांव में हुआ था। उनका असली नाम अनिरुद्ध कुमार था। उनके दादा भी संन्यासी थे और पिता शंभू पांडेय ने भी संन्यास ले लिया था। मां रमा देवी दुबे बहुत धार्मिक थीं और मंदिरों में सेवा करती थीं। घर का यह धार्मिक माहौल देखकर अनिरुद्ध बचपन से ही अध्यात्म की ओर झुके।
पांचवीं कक्षा में ही उन्होंने भगवद गीता पढ़ना शुरू कर दिया था। वे शिवभक्त थे और अक्सर घर के सामने वाले मंदिर में घंटों पूजा करते रहते थे। गांव के लोग आज भी उन्हें "अनिरुद्ध पांडेय" के नाम से जानते हैं।
पढ़ाई और शुरुआती साधना
प्रेमानंद महाराज ने केवल आठवीं तक पढ़ाई की। नौवीं में स्कूल में दाखिला लेने के चार महीने बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया। 1985 में, जब उनकी उम्र लगभग 13 साल थी, उन्होंने शिव मंदिर की स्थापना करवाई।
एक दिन सुबह 3 बजे अचानक बिना किसी को बताए घर छोड़ दिया और पास के मंदिर में 14 घंटे भूखे-प्यासे ध्यान में बैठे। इसके बाद वे सैंमसी के शिव मंदिर में चार साल तक रहे और साधना करते रहे। फिर वे वाराणसी चले गए।
कड़ी तपस्या के दौरान उनकी दोनों किडनियां खराब हो गईं। डॉक्टर, जो राधा रानी के भक्त थे, ने उन्हें वृंदावन जाने की सलाह दी। वहां वे पहुंचे और श्री हित गौरांगी शरण महाराज के शिष्य बनकर राधा रानी के भक्त हो गए।
संन्यास और नया नाम
गांव छोड़ने की कहानी यह भी बताई जाती है कि अनिरुद्ध अपने दोस्तों के साथ शिव मंदिर के लिए चबूतरा बना रहे थे, लेकिन कुछ लोगों ने उन्हें रोक दिया। इससे उनका मन टूट गया और उन्होंने घर छोड़ने का फैसला किया। शुरुआत में उनका संन्यास नाम आर्यन ब्रह्मचारी रखा गया।
परिवार से दूरी
प्रेमानंद महाराज के बड़े भाई गणेश दत्त पांडेय बताते हैं कि वे और परिवार उनसे कभी नहीं मिलते। उनका कहना है कि वे गृहस्थ हैं और संत के चरण छूना उनके लिए पाप जैसा होगा। इसलिए वे प्रेमानंद महाराज से दूरी बनाए रखते हैं।


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