..................... जी5, धूप की दीवार रिव्यू Review Zee5 web series Dhoop ki deewar based on martyrs’ families painfull stories - Hindi Filmibeat

Review धूप की दीवार: ये सीरीज दिखाती है - शहीद भी मरते हैं, शहीद के बच्चे भी यतीम होते हैं

Rating:
2.5/5

वेब सीरीज- धूप की दीवार

ओटीटी प्लेटफॅार्म- जी5

कलाकार-अहद रजा मीर,सजल अली

जब एक मां दर्द में चिखते हुए ये कहती है कि शहीद भी मरते हैं, एक पत्नी जब ये कहती है कि शहीद की पत्नी भी बेवा होती है, उसके बच्चे यतीम होते हैं। ये सुनकर ऐसा प्रतीत होता है कि किसी सैनिक की शहादत के बाद उसके परिवार पर बिछी हुई मातम की चादर हम क्यों अनदेखा कर देते हैं?

Dhoop ki deewar

शहीद होना। देश के लिए बलिदान देना बेशकिमती हैं। ये ऐसी कुर्बानी है जिसका मोल कोई भी देश कभी नहीं चुका सकता। जी5 की सीरीज धूप की दीवार अपने 10 एपिसोड में लगातार शहीद के परिवार के दर्द की चीख कानों में घोलती रहती है। गंभीर कारगर डायलॅाग ने धूप की दीवार को मजबूती से खड़ा किया है। जो ये कहानी की शुरुआत में सूचित कर देता है कि देश कोई भी हो। भारत या पाकिस्तान। सैनिक देश की रक्षा के लिए अपनी जिंदगी का बलिदान देता है।

भारत- पाकिस्तान के शहीद परिवार की कहानी

ये कहानी है पाकिस्तान से सारा शेरअली और भारत के विशाल मल्होत्रा की। भारत और पाकिस्तान मैच की हार-जीत के बीच जब घर की चौखट पर शहीद बेटे-पिता और पति की लाश आती है, तो क्या होता है? इसी पर आधारित है ये सीरीज। बॅार्डर का संघर्ष दो परिवार को कैसे उजाड़ता है इसी को बारीकी से समझाती हैं धूप की दीवार।

यहां अगर आप लव स्टोरी की उम्मीद कर रहे हैं तो भूल जाइए। ये जिंदगी खोने का दर्द बयांन करती हैं। जहां अपने पिता के शहीद होने के बाद सारा और विशाल सोशल मीडिया के जरिए एक दूसरे को इल्जाम से बांधते हैं। मेरे पिता की शहादत सबसे बड़ी का मोर्चा खोलते हैं। जिस पर मीडिया की दखलअंदाजी से लेकर रिश्तेदारों की जबरदस्ती जैसे कई भाव के बीच बिखरते दो परिवार की कहानी गमगीन कर देती है।

शहीद के जाने के बाद शहीद परिवार का क्या? बस इसी सवाल को खंगालती है ये सीरीज। वेब सीरीज में अहद रजा मीर और सजल अली प्रमुख भूमिकाओं में हैं। जो कि अपने परिवार को बटोरने की कोशिश में खुद बिखरते हुए इंटरनेट के जरिए दुश्मनी को भुलाकर इंसानियत का सहारा बनते हैं।

अभिनय में दिखा दम, किरदारों की कहानी

सजल अली को इससे पहले श्रीदेवी की मॅाम में नजर आ चुकी हैं। सजल और अहद रजा मीर ने सादगी से अपनी भूमिकाओं से उस खोखलेपन को सहजता से दिखाया है जो शहीद के परिवार के जख्म को वक्त के साथ गाढ़ा करता जाता है। जैब रहमान, सवेरा नदीम, सामिया मुमतात,समीना अहमद, मंजर सहबाई जैसे कलाकारों ने शहीद की मां, पिता और पत्नी के घाव को स्क्रीन पर अपनी अदायगी से हरा किया है।

पाकिस्तानी टीवी शोज की महक, डायलॅाग ने मारी बाजी

हबीब हसन निर्देशित और उमेरा अहमद का लेखन, लिखावट और निर्देशन से पाकिस्तानी टीवी शोज की महक यहां बरकरार रखता है। डायलॅाग, कहानी और किरदार को स्क्रीन पर हर फ्रेम में खड़ा होने का भरपूर अवसर मिला है। उर्दू शब्दों के साथ जमकर डॅायलॅाग बाजी है- जैसे तुम्हारे और मेरे मुल्क ने कितने लोगों की जान ली होगी लेकिन इसे ज्यादा कई खूनी रिश्तों को सफेद किया है। ये देश हमें कैसे भूल जाएगा, मेरे पापा शहीद हुए हैं।

हालांकि खामी ये है कि सीरीज की धीमी रफ्तार कहानी को काफी लंबा खींच ले जाती है। कसापन ना होना इसकी कमजोरी है। हर किरदार और हर रिश्ते को बारीकी से दिखाने की कोशिश में स्क्रीनप्ले नॅावेल जैसा प्रतीत होने लगता है जो कि पढ़ने के लिए ठीक है। देखने के लिहाज से ये टीवी शो मालूम होता है। जान पड़ता है कि एपिसोड बनाने का दबाव कहानी पर लगातार बना हुआ है। संगीत के लिहाज से एक ही गीत को कई बार दोहराया गया है।

(देखने की वजह जानने के लिए पढ़िए ये शॉर्ट रिव्यू )

सवाल ये आता है कि ये सीरीज क्यों देखी जानी चाहिए। तो हम कहेंगे जरूर देखी जानी चाहिए। हम सभी के लिए ये समझना जरूरी है कि बॅार्डर पर शहीद देश की रक्षा के लिए केवल अपने प्राण नहीं देता बल्कि वह अपनी मां, पत्नी और परिवार के मुस्कान, उम्मीद और हिम्मत को भी उस बलिदान में शामिल करता है। जो ताउम्र शहीद के परिवार के लिए गहरा आघात होती है। और हां, अगर आप पाकिस्तानी टीवी शोज के डायलॅाग, स्टोरी लाइन और लिखावट को पसंद करते रहे हैं तो ये सीरीज आपके लिए खरी उतरेगी। फिल्मीबीट की तरफ से 2.5 स्टार।

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