द मैरीड वुमन Review: द मैरिड से बटरफ्लाई वुमन बनने का खास सफर, खुद से खुद की मुलाकात
वेब सीरीज: द मैरिड वुमन
ओटीटी- ऑल्ट बालाजी और जी5
कलाकार-ऋद्धि डोगरा, मोनिका डोगरा,सुहास आहूजा, इमाद शाह और नादिरा बब्बर
निर्देशन-साहिर रजा
किसी चर्चित किताब को पर्दे पर उतरते देखना का प्रयास सिनेमा में कई बार किया गया है। समलैंगिकता, हिन्दू - मुस्लिम के बीच दबी प्रेम कहानी को सांस लेते हुए भी कई बार स्क्रीन पर देखा है। शादी के बंधन में घुटती हुई औरत की दास्तान टीवी शो के जरिए प्राइम टाइम पर टीआरपी भी लेती हैं।

जब सवाल महिला प्रधान फिल्मों का आता है तो पर्दे पर बैठने वाली कहानी की सोच समाज से होकर आती है। फिर अगर एक बार से अधिक पुराने मसाले में लिपटी कहानी देखने को मिले तो इससे परहेज नहीं करना चाहिए। द मैरिड वुमन भले ही मंजू कपूर के लोकप्रिय नॅावेल ए मैरिड वुमन पर आधारित हो, लेकिन ये है दादी मां के नुस्खे की तरह। वो कैसे चलिए आपको बताते हैं।

90 के दशक में सेट आस्था की कहानी
एक औरत के उड़ते हुए पंख को कुचलते, टूटते बिखरते आपने कई बार महिला प्रधान फिल्मों और टीवी शो में देखा हो। लेकिन उड़ान का मीठा रस किसे नहीं भाता। एकता कपूर फिर किरदार के मामले में यहां बाजी मार लेती हैं। एकता के शो की पहचान तुलसी, पार्वती और प्रेरणा जैसे किरदार रहे हैं।
इन्हीं का मॉडर्न वर्जन है आस्था। 90 के दशक में सेट ये कहानी शादी शुदा आस्था की है। आस्था मां, पत्नी-बहू , अपने जीवन के हर रिश्ते को सहजता से निभा रही है। खुद वो खो चुकी है।जाहिर सी बात है 30 साल पहले की महिला कैसी होगी? ठीक ऐसी ही आस्था जैसी। वैसे आस्था जैसी महिलाएं आज के दशक की महिलाओं में भी पनपती हैं।

आस्था की जिंदगी का पहला पड़ाव, ऐसे शुरू होती है कहानी
हैप्पी मैरिड लाइफ से उसकी जिंदगी 2 बच्चों की मां से लेकर परिवार की जिम्मेदारी के बोझ तले घर के आंगन में धसती चली जाती है। वो एक शिक्षक है। कॅालेज के नाटक में प्ले भी लिखती है। परिवार के बीच अपने अरमान को दबा चुकी है।
तभी उसकी जिंदगी में आता है रंगमंच का ऐसा निर्देशक जो उसको अपनी और खिंचता है। आस्था उड़ती है, अपने प्यार का इजहार करती है और फिर अचानक उसका प्यार धुंआ हो जाता है। इस धुंए से निकली है एक महिला पिपीलिका खान।

राम जन्म भूमि संवेदनशील विषय को छूने की कोशिश
मोह के धागे में पिरोह कर आस्था को पिपीलिका द मैरिड वुमन से द बटरफ्लाई वुमन बनाती है। पिपीलिका ,आस्था के जिंदगी में आंधी की तरह आती है और उसे शीतल छाव दे जाती है। बात करें स्क्रीनप्ले की तो कहानी के मुख्य में केवल आस्था है। द मैरिड वुमन के शीर्षक को सार्थक किया गया है।
इस बीच 90 के दशक का राम जन्म भूमि मामला, हिन्दू मुस्लिम दंगे जैसे संवेदनशील बातों को केवल छूने भर की कोशिश हुई है। हर एपिसोड में फ्रेम में केवल दिखाई देती है एक तरफ आस्था 'मैरिड वुमन'। पिपीलिका 'आजाद वुमन'। विषय को कहीं भी भटकने नहीं दिया है।

किरदारों की कहानी छोड़ती है छाप
आस्था की भूमिका में ऋद्धि डोगरा छाप छोड़ती हैं। मोनिका डोगरा को पिपीलिका के किरदार में पहली बार इतना बड़ा स्क्रीन टाइम मिला जिसके साथ वह इंसाफ करती हैं।इमाद शाह कम समय में ऐसा रंग जमाते हैं कि कहानी को खड़ा कर देते हैं।
सुहास आहूजा भी पति की भूमिका में अपनी मौजूदगी दर्ज करवाते हैं। निर्देशक साहिर रजा कम किरदार के साथ कहानी को स्क्रीन प्ले के हिसाब से सटीक प्रस्तुत करते हैं। बाकी आस्था की जिंदगी को इस तरह निचोड़ कर रखा गया है कि आपकी नजर उस पर से हटती ही नहीं है।

नयापन नहीं फिर भी अच्छा होने का अहसास है..
कहीं ना कहीं इस सारी कहानी और किरदार के बीच आस्था और पिपीलिका का किरदार एक ऐसी महिला को लाकर खड़ा करता है जो खुद लड़खड़ाती है लेकिन आपकी सोच को खड़ा करती है। कुछ नया पन ना होने के बाद भी अच्छा लगता है आस्था की जिंदगी की उलझन को देखना। अच्छा लगता है उसे रिश्तों की कैद से निकलते देखना।
अच्छा लगता है उसे प्रेम में पड़ते देखना। अच्छा लगता है उसकी खाली जिंदगी के पन्नों पर पिपीलिका के समलैंगिक प्रेम के सतरंगी रंग को देखना। आस्था को खुद के साथ उड़ते देखना। आस्था को एक मैरीड वुमन से वुमन बनते देखना। अच्छा लगता है।

क्यों हर समय क्रांति की तलाश है ? सुकून भी जरूरी है
जरूरी नहीं है कि कोई महिला प्रधान कहानी आए तो क्रांति जगाए। हर कहानी में नयापन खोजना, उसके किरदार, स्क्रीन प्ले डायरेक्शन में सही गलत को तलाशना। ये बोलते हुए कि यार ये तो देखा हुआ माल है हम कई बार ऐसी ऊर्जा से खुद को दूर करवाते हैं जो हमें एक सुकून के सफर पर ले जाती है।
जो ये बताती है कि कुछ कहानी आपको भीतर से अच्छा महसूस कराती है।दादी मां के देसी नुस्खे की तरह जिसका जिक्र मैंने शुरू में किया था। जो भले ही घिसा-पिटा हो लेकिन चोट को हल्का जरूर करता है।

क्यों देखें ये सीरीज
हम कितना भी महिला दिवस मना लें। अभी भी दस से आठ महिलाएं ऐसी हैं जिनकी जिंदगी में रंग है, लेकिन उनके मन के पन्ने बेरंग हैं। बाकी, आस्था की जिंदगी आस्था जरूर जगाती है। द मैरिड वुमन में पुराने मसाले हैं, लेकिन नमक स्वादानुसार है। ये सीरीज महसूस कराती है कि प्यार इंसान देखता है, महिला-पुरुष नहीं। बाकी, देखिए बेमतलब ही सही।अच्छा लगेगा।


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