Ray वेब सीरिज रिव्यू: सत्यजीत रे की चार रोचक कहानियां, मनोज बाजपेयी और गजराज राव ने जीता दिल
निर्देशक- श्रीजीत मुखर्जी, अभिषेक चौबे, वसन बाला
कलाकार- अली फज़ल, श्वेता बासु प्रसाद, मनोज बाजपेयी, गजराज राव, के के मेनन, राजेश शर्मा, हर्षवर्धन कपूर आदि
प्लेटफॉर्म- नेटफ्लिक्स
एपिसोड- 4/ प्रति एपिसोड 55 मिनट
महान फिल्मकार और लेखक सत्यजीत रे के अतुलनीय काम को ट्रिब्यूट देने का इससे बेहतर तरीका क्या हो सकता था! श्रीजीत मुखर्जी, अभिषेक चौबे, वसन बाला ने उनकी चार लघु कहानियों - स्पॉटलाइट, बहुरूपी, बिपिन चौधरी स्मृतिभ्रम और बरीन भौमिक की बीमारी को स्क्रीन पर लाने की जिम्मेदारी उठाई है। इन सभी फिल्मों को जो एक चीज एक दूसरे से जोड़ती है वह है.. खुद के 'पहचान' की तलाश।

'रे' एक एंथोलॉजी है जिनमें ऐसे पुरुष पात्रों को बुना गया है, जो मुखौटे के पीछे हैं। संपूर्णता को पाने की कोशिश के बीच यहां अहंकार, ईष्या, विश्वासघात से जूझते नायक हैं। एक अकेला आदमी क्या सोच रहा है, उसके भीतर क्या भावनाएं उफन रही हैं और दुनिया को क्या दिखता है, इन कहानियों में आप देख सकते हैं। श्वेता बासु प्रसाद और राधिका मदान अपने कम समय में ही ध्यान आकर्षित करती हैं।

फॉर्गेट मी नॉट (Forget Me Not)- श्रीजीत मुखर्जी
कहानी शुरु होती है बिजनेसमैन इप्सित नायर (अली फज़ल) से। जिसकी याददाश्त कंप्यूटर की तरह तेज है और वह कभी कुछ भी नहीं भूलता। बिजनेस के एक एक आंकड़ों से लेकर छोटी से छोटी बात उसके दिमाग में छपी हुई है। ऐसे में एक दिन उसकी मुलाकात होती है रिया सरन (अनिंदिता बोस) से। रिया उसे याद दिलाती है कि वो दोनों 2017 में औरंगाबाद में मिल चुके हैं और दोनों के बीच कुछ दिनों का रिलेशन था। रिया उसे ट्रिप से जुड़ी हर छोटी बड़ी डिटेल बताती है, लेकिन इप्सित को रिया से जुड़ी कोई बात याद नहीं आती। उस वक्त वह उन बातों को नजरअंदाज कर देता है, लेकिन धीरे धीरे रिया की बातें उसके दिमाग पर हावी होने लगती हैं। उसका भ्रम और तेज हो जाता है, जब वह देखता है कि उसके अलावा उसकी औरंगाबाद ट्रिप सभी को याद है। क्या वह अपनी मजबूत चीज, अपने दिमाग को खो रहा है?

श्रीजीत मुखर्जी की फिल्म
निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी ने कहानी में शुरु से अंत तक एक संस्पेंस बरकरार रखा है। स्वपनिल सोनवाने की सिनेमेटोग्राफी और नितिन बेद की एडिटिंग कहानी को मजबूती देती है। हालांकि शिराज अहमद द्वारा लिखित पटकथा में किरदारों में एक गहराई की कमी दिखती है। अभिनय की बात करें तो अली फज़ल ने इप्सित रमा नायर के किरदार में बढ़िया प्रदर्शन किया है। एक तेजतर्रार और दंभी बिजनेसमैन से लेकर बेचैन और उद्विग्न इंसान बनने का सफर अली फज़ल ने बेहतरीन दिखाया है।

बहरूपिया- श्रीजीत मुखर्जी
"आप पहले इंसान नहीं है और आखिरी इंसान भी नहीं होंगे जो आपके आप को खुदा, भगवान समझ लेता है और फिर मुंह के बल गिरता है".. इंद्राशीष साहा (के के मेनन) की आंखों में आंखे डालकर पीर बाबा कहते हैं। इस कहानी का मुख्य पात्र इंद्राशीष साहा एक मेकअप आर्टिस्ट है, जिसकी जिंदगी में बेढ़ंग तरीके से आगे बढ़ रही है। ना पैसा है, ना इज्जत। ऐसे में उसे दादी की मृत्यु के बाद अच्छी खासी जायदाद और प्रोस्थेटिक्स मेकअप से जुड़ी एक किताब मिल जाती है। प्रोस्थेटिक्स मेकअप के इस्तेमाल से वह उन लोगों से बदला लेने निकल पड़ता है, जिन्होंने कथित तौर पर उसके साथ गलत किया है। लेकिन एक दिन वो अपने ही खेल में बुरी तरह उलझकर रह जाता है।
श्रीजीत मुखर्जी के निर्देशन में बनी लगभग एक घंटे की यह कहानी कहीं कहीं धीमी लगती है। यह काफी डार्क है और आपको असहज कर सकती है। के के मेनन अपने किरदार में शुरु से अंत तक एक लय में दिखते हैं। सागर कपूर का बैकग्राउंड स्कोर और प्रणय दासगुप्ता की एडिटिंग बेहतरीन है।

हंगामा क्यों है बरपा- अभिषेक चौबे
फिल्म में ट्रेन का सफर कई बार कहानियों को काफी दिलचस्प मोड़ देता है। यहां कहानी शुरु होती है गजल गायक मुसाफिर अली (मनोज बाजपेयी) से, जो भोपाल से नई दिल्ली की यात्रा कर रहे हैं। उनके सह यात्री है असलम बेग (गजराज राव), जो कि एक पूर्व पहलवान हैं। मुसाफिर और असलम पहले कहीं एक दूसरे से मिल चुके हैं, लेकिन दोनों को ही बिल्कुल याद नहीं है। सफर के दौरान मुसाफिर को अचानक याद आता है कि वह दोनों 10 साल पहले ऐसे ही एक ट्रेन के सफर में मिले थे। लेकिन यह कोई साधारण सफर नहीं था। फ्रेम दर फ्रेम कहानी दिलचस्प होती जाती है। अभिषेक चौबे के निर्देशन में बनी यह फिल्म अंत तक आपको बांधे रखती है।

दमदार दिखे हैं मनोज बाजपेयी और गजराज राव
वहीं, मनोज बाजपेयी और गजराज राव अपने किरदारों में बेहद प्रभावशाली दिखे हैं। दोनों के हाव भाव दिल जीतते हैं। यदि आपको डार्क कॉमेडी पसंद है, तो 'हंगामा क्यों है बरपा' आपको जरूर पसंद आएगी। कहानी का ज्यादातर हिस्सा ट्रेन में ही गुजरता है, ऐसे में अनुज राकेश धवन का कैमरा वर्क काफी शानदार है। मानस मित्तल की एडिटिंग कहानी को एक मजबूती देती है।

स्पॉटलाइट
'भारत में सिनेमा ना सौ सालों से ही आया है, धर्म हजारों साल पुराना है', फिल्म स्टार विक्रम मल्होत्रा (हर्षवर्धन कपूर) को उसका मैनेजर कहता है। एक पॉपुलर फिल्म स्टार और एक धर्म गुरु 'दीदी' के इर्द गिर्द शुरु होती है ये कहानी। विक्रम aka विक अपनी फिल्म की शूटिंग के लिए एक होटल में रूका है। सब सही चल होता है, जब अचानक स्थिति उस वक्त बदल जाती है, जब उसी होटल में 'दीदी' आकर रूकती हैं। विक देखता है कि उसके फिल्म के निर्देशक- निर्माता से लेकर उसकी गर्लफ्रैंड (आकांशा रंजन कपूर), होटल का मैरेजर तक, हर कोई दीदी से मंत्रमुग्ध है। धीरे धीरे उसके लिए यह सब असहनीय हो जाता है और वह 'दीदी' से मिलने की ठानता है। आगे कहानी दिखाती है कि एक स्टार और धर्म गुरु के बीच 'स्पॉटलाइट' कौन और कैसे चुराता है?

कुछ हिस्सों में है कमजोर
वसन बाला के निर्देशन में बनी यह फिल्म कुछ हिस्सों में कमजोर दिखती है। कहानी में एक दोहरावपन लगता है, वहीं अभिनय की बात करें तो हर्षवर्धन कपूर ने कुछ दृश्यों में ध्यान आर्कषित किया है, लेकिन कई जगह वह हाव भाव दिखाने में विफल रहे हैं। विक्रम के मैनेजर/दोस्त के किरदार में चंदन रॉय सान्याल अच्छे लगे हैं।

देंखे या ना देंखे
कुल मिलाकर देखा जाए तो, 'रे' की हर कहानी में ऐसे किरदार हैं, जिसे लेकर फिल्म भी बनाई जा सकती है, जिससे किरदार को और गहराई से जानने- समझने का मौका मिलेगा। बहरहाल, इन चारों में हंगामा है क्यों बरपा और फॉर्गेट मी नॉट ज्यादा उभरकर सामने आती है। इनकी मजबूती से बुनी हुई पटकथा और दमदार किरदार आपको सत्यजीत रे के प्रभावशाली सोच में झांकने का मौका देते हैं। फिल्मीबीट की ओर से सीरिज को 3 स्टार।


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