REVIEW KHOJ: दिल दहला देगी एक छोड़ी हुई दुल्हन की अधूरी तलाश
दहेज प्रथा का मामला तब संगीन हो जाता है जब शादी के सर्टिफिकेट से एनआरआई जुड़ जाता है। उत्तर भारत में ऐसे कई घर मिल जायेंगे। जहां पर ब्याही दुल्हन अपने पति के इंतजार में मायके की चौखट पर जिंदगी बीता देती हैं। एक ऐसा धोखा जो कि उसके लाल जोड़े के साथ हमेशा बंधा रहता है।
अभिनेता राज बब्बर की भतीजी कजरी बब्बर की 'खोज' एनआरआई शादी का शिकार हुई एक ऐसी लड़की की कहानी है , जो अपने पति की तलाश में घर छोड़ने का फैसला लेती है। 71वें कान फिल्म फेस्टिवल में 'खोज' ने जमकर तारीफ बटोरी है। फिल्म की शूटिंग ब्रिटेन और पंजाब में हुई है। यह अंग्रेजी और पंजाबी दोनों भाषा में ZEE5 पर रिलीज की गई है। इसे आप पंजाबी में देखें या अंग्रेजी में । ये फिल्म भाषा को कहानी की बाधा बनने नहीं देती है।

27 मिनट 44 सेकंड की ये लघु फिल्म महज 3 मिनट में आपकी सोच का हिस्सा बन जाएगी। ये कहानी है गुरप्रीत की। गुरप्रीत जिसे बचपन में शिक्षक बनना था। मां उसे दुल्हन बनने का सपना दिखाती है। ये सपना बड़े होकर उसके मामा-मामी पूरा करते हैं। सुहागरात के बाद गुरप्रीत की जिंदगी से लाल चुड़ा ऐसे बंध जाता है जैसे जीवन के साथ मौत।
पति विक्रम की खोज में गुरप्रीत समाज के खिलाफ जाकर लंदन जाती है। जहां पर उसका सामना एक ऐसी गुरप्रीत से होता है जिसकी वो कभी कल्पना भी नहीं कर सकती। इस फिल्म का क्लाइमैक्स एक अनसुलझी पहेली बनकर सामने आता है। आत्मा को झकझोर जाता है।
'खोज' सही मायने में सुहागरात की सेज पर लाल चूड़े के टूटने की असहनीय कहानी है। कजरी बब्बर के लेखन में फिल्मी पन नहीं है। एक हकीकत है जो कि सिनेमा के पर्दे से लंबे समय से गायब हो चुका है। 'खोज' एक आईना है जिसके चकनाचूर होने की कामना आप फिल्म देखने के बाद जरूर करेंगे।
कजरी बब्बर ने लिखावट और निर्देशन के जरिए एक छोड़ी हुई दुल्हन के जलते हुए अरमानों को ईमानदारी से पेश करने की कवायद की है। गुरप्रीत के किरदार में जारा खान ने हर उस अनकहें दर्द को बखूबी दिखाया है जिसे लफ्जों में जाहिर करना नामुमकिन है। आधे घंटे से भी कम समय में ये शॉर्ट फिल्म कहानी,कलाकार और निर्देशन के लिहाज से संतुष्ट करती है।


Click it and Unblock the Notifications
