मेंटलहुड रिव्यू - ये सीरीज़ देखकर आप भी कहेंगे, बच्चों की परवरिश करना कितनी टेढ़ी खीर है
करिश्मा कपूर का वेब डेब्यू, एकता कपूर की सीरीज़ मेंटलहुड के साथ हो चुका है। 10 एपिसोड की इस सीरीज़ में 6 माओं की दिक्कतें दिखाई हैं कि कैसे एक इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ने वाले उनके बच्चों को पालने में कितनी दिक्कतें आती हैं। इतनी दिक्कतें कि माएं पागल हो जाती हैं।
सीरीज़ में करिश्मा कपूर को कानपुर से आई एक महिला दिखाया है जिसे केवल इस बात के लिए जज किया जा रहा है कि वो कानपुर से आई है। हालांकि वो भी बिल्कुल उन्हीं औरतों की तरह है जो मुंबई में रहती है।

मीरा (करिश्मा कपूर) लेकिन ये नहीं दिखाना चाहती है कि उसकी परवरिश किसी से कम है। इसलिए अच्छी मां बनने की होड़ में वो बच्चे छोड़ कर खुद पर फोकस करना शुरू कर देती है।
और शायद बस यहीं से इस सीरीज़ का कथानक भटक जाता है। सारी महिलाएं आपस में ही किसी तरह की होड़ में लगी हुई हैं। पैरेंटिंग पर बनी एक सीरीज़ में आपको बच्चे याद रह जाने चाहिए थे।
लेकिन इस सीरीज़ में बच्चे दिखते ही नहीं है। सारा स्क्रीन टाईम औरतें और उनकी दिक्कतों पर है। सीरीज़ के एक सीन में शिल्पा शुक्ला से करिश्मा कपूर पूछती दिखती हैं - तुम घर और बाहर दोनों कैसे संभालती हो और शिल्पा जवाब देती हैं कि क्या तुम किसी मर्द से ये सवाल पूछती?
लेकिन सीरीज़ खुद ही इस जवाब में बुरी तरह उलझ जाती है कि औरतें घर और बाहर सब कुछ संभालती हैं। वहीं मां के साथ पैरेंटिंग में पिता की कितनी भूमिका होती है ये केवल एक ही पात्र से दिखाने की कोशिश की गई जिसे डीनो मोरिया निभाते हैं।
पैरेंटिंग पर सोनी इंटरटेनमेंट टेलीविजन पहले ही एक शानदार सीरीज़ ला चुका है जिसका नाम था परवरिश। इस सीरीज़ में श्वेता तिवारी और रूपाली गांगुली ने दो बहनों का किरदार निभाया था जो अपने बढ़ते बच्चों को सही परवरिश देने में कभी गलती करती हैं तो कभी सख्ती।
इस सीरीज़ में आपको सारे बच्चे भी याद रह जाएंगे और आप इससे इमोशनल तरीके से भी जुड़ेंगे। मेंटलहुड में आपको वो जुड़ाव कम मिलेगा।


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