गुल्लक सीज़न 3 रिव्यू: 1 और 2 से बेहतर, दिल पर राज करता है सोनी लिव सीरीज़ का नया सीज़न
सीरीज़ - गुल्लक
प्लेटफॉर्म - सोनी लिव
स्टारकास्ट - गीतांजली कुलकर्णी, जमील खान, वैभव राज गुप्ता, हर्ष मयार, शिवांकित परिवार
डायरेक्टर - पलाश वासवानी
प्रोड्यूसर - अरूणाभ कुमार
क्रिएटर - टीवीएफ, श्रेयांश पांडे
एपिसोड/अवधि - 5 एपिसोड, 30 मिनट प्रति एपिसोड
घर का खर्चा कैसे चलेगा मिश्रा जी? एक बार फिर से गुल्लक लौटा है मिसेज़ मिश्रा के इस सवाल के साथ। एक मध्यम वर्गीय परिवार की वही दिक्कतों के साथ जिनके साथ हर मिडल क्लास परिवार रोज़ जूझता है। परिवार के मुखिया हैं संतोष मिश्रा जो अपनी पत्नी शांति देवी और दो बेटों अन्नू मिश्रा और अमन मिश्रा के साथ रोज़मर्रा किसी ना किसी दिक्कत से उलझते हैं और फिर परिवार के ड्रॉइंग रूम में बैठकर उन समस्याओं का समाधान निकालते हैं।

मिडिल क्लास का सुख सार्वजनिक होता है। दुख सार्वजनिक होता है। भरा हुआ पेट सार्वजनिक होता है। भूख सार्वजनिक होती है। बीत रहे दिन सार्वजनिक होते हैं। हवा का बदला हुआ रूख सार्वजनिक होता है। जब तक ये मिडिल क्लास अपनी डिक्शनरी से ये सार्वजनिक शब्द को निकालकर फेंकेगा नहीं ना, तब तक उसके जीवन में समस्याओं का भंडार कम नहीं होगा। और पांच एपिसोड के इस सीज़न में एक बार फिर गुल्लक यही समझाने की कोशिश करता दिखता है।
ये सीरीज़ चार किरदारों की कहानी है। शांति मिश्रा (गीतांजली कुलकर्णी), अन्नू मिश्रा (वैभव राज गुप्ता), अमन मिश्रा (हर्ष मयार) और संतोष मिश्रा (जमील खान)। लेकिन गुल्लक का मुख्य किरदार है गुल्लक यानि कि इस सीरीज़ के सूत्रधार। और इस गुल्लक को अपनी मज़बूत आवाज़ दी है शिवांकित परिहार ने। जानिए क्यों बेहतरीन है ये सीरीज़।

गुल्लक की कहानी
गुल्लक की कहानी नहीं है। क्योंकि मिडिल क्लास परिवारों की कहानियां नहीं होती। उनके लिए हर दिन की शुरूआत एक समस्या के साथ होती है और दिन का अंत समाधान के साथ। गुल्लक का नया सीज़न भी इन्हीं दिन और रातों के बीच की सारे किस्से आप तक पहुंचाता है। कभी कभी समाधान आपको सुकून की नींद देते हैं तो कभी कभी आपको सोने ही नहीं देते हैं। लेकिन यही मिडिल क्लास का जीवन है।

तकनीकी पक्ष
गुल्लक का तकनीकी पक्ष बेहतरीन है। यही कारण है कि आप पांच एपिसोड की इस सीरीज़ में खो जाते हैं। इसके लिए इस सीरीज़ की पूरी टीम बधाई की पात्र है। लेकिन इस सीरीज़ का सबसे मज़बूत पक्ष है दुर्गेश सिंह का लेखन जो इस पूरी सीरीज़ में जान फूंक देता है। दुर्गेश सिंह के साथ स्क्रीन प्ले और डायलॉग्स में उतनी ही मज़बूती से साथ दिया है विदित त्रिपाठी। दोनों मिलकर सीरीज़ के डायरेक्टर पलाश वासवानी को खेलने का पूरा मौका देते हैं और इस तरह एक आम से मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी बेहद खास बन जाती है। गौरव गोपाल झा की एडिटिंग कहीं से भी कसे हुए लेखन और बेहतरीन निर्देशन की बीच की कड़ी को टूटने नहीं देती है। वहीं पूरी सीरीज़ को चार चांद लगाता है अनुराग सैकिया का म्यूज़िक।

हर सीज़न के साथ बेहतर
गुल्लक के क्रिएटर हैं श्रेयांश पांडे जिन्होंने छोटी छोटी बारीकियों का ध्यान रखते हुए इस सीरीज़ को आकार दिया है। वहीं गुल्लक का प्लॉट बेहद सटीक है - मिडिल क्लास की दिक्कतें। ऐसा मुद्दा, जो ना कम होता है, ना ही पुराना। ना बोझिल होता है और ना ही बोरिंग। ऐसे मुद्दे जो आपको हो चाहे ना हो लेकिन आपके दिल से तुरंत जुड़ जाते हैं। यही वजह है कि तीन सीज़न के बाद भी गुल्लक के किस्से उतने ही ताज़े और उतने ही ज़रूरी लगते हैं। और शायद आगे भी लगते रहेंगे। कानपुर का मिश्रा परिवार आपके दिल में अपनी जगह बनाता है और क्योंकि हम से कोई ना कोई, कभी ना कभी इस परिवार की जगह रहा है।

अभिनय
गुल्लक की कास्टिंग बेहद शानदार है। गीतांजली कुलकर्णी, टिपिकल मां है जो गुस्से में जहां करण अर्जुन वाली राखी बन सकती है तो बाकी समय निरूपा राय की छवि रहती है। कुल मिलाकर पूरी मदर इंडिया। वहीं संतोष मिश्रा के किरदार में जमील खान का किरदार ताज़ी हवा के झोंके की तरह। पुरूष प्रधान समाज में संघर्ष करता वो पुरूष जो समय के साथ बदलने की पूरी कोशिश करता है। अब चूंकि जड़ें ही पुरूष प्रधान हैं, इसलिए वो उन रूढ़ीवादी भावनाओं में बह कर गलतियां करता हैं लेकिन वो गलतियां क्षणिक होती है। उन गलतियों का सुधार दिल जीतता है। वहीं आनंद और अमन के रूप में वैभव राज गुप्ता और हर्ष मयार की भाईयों की जोड़ी है हर उस भाईयों की जोड़ी जैसी है जो एक दूसरे का खून पीने को तैयार हैं लेकिन एक दूसरे के लिए खून बहाने को तत्पर रहते हैं। उनकी नोंक झोंक से लेकर इमोशनल सीन आपके दिल जीत लेंगे।

सपोर्टिंग किरदार
गुल्लक की सपोर्टिंग किरदार हैं बिट्टू की मम्मी जिनका किरदार परफेक्शन के साथ निभाती हैं सुनीता राजवार। मिडिल क्लास के साथ सिस्टम, सरकार, कानून नहीं खड़े होते तो कुछ लोग खड़े होते हैं। बिट्टू की मम्मी वही लोग हैं। जो आपके सुख में भले ही सुखी नहीं होते लेकिन आपके दुख में दुख बांटने ज़रूर आते हैं। दुर्गेश सिंह के लेखन में अगर उनका किरदार बताया जाए तो प्यार का चेहरा अगर दिखता तो इन्हीं कुछ लोगों के चेहरे जैसा होता। अस्पताल में संतरे की थैलियां यही लोग लेकर आते हैं। पासबुक में पैसा हो ना हो, रिश्ते यही लोग निभाते हैं। You can call them दुख के Superheroes.

पांच एपिसोड
गुल्लक का ये सीज़न भी हर बार की तरह पांच एपिसोड्स में बंटा है। पहला एपिसोड है मिशन एडमिशन जो अमन के टॉप करने के बाद उसके अच्छी पढ़ाई की चिंता में घुले जा रहे मिश्रा परिवार की कहानी बताता है। इसके बाद LTA हर वो परिवार है जो सालाना ट्रिप प्लान करता है पर कभी कहीं घूमने नहीं जा पाता। क्यों का कारण, ये एपिसोड देता है। तीसरा एपिसोड अगुआ सीरीज़ की monotony को तोड़ने की कोशिश करता है वहीं चौथा एपिसोड सत्यनारायण व्रत कथा हल्का सा चूकता है। सीरीज़ को चमकाता है क्लाईमैक्स और पांचवा एपिसोड इज़्जत की चमकार।

क्या है अच्छा
गुल्लक में सब कुछ बेहतरीन है। और इसकी अच्छी बात ये है कि ये सीरीज़ भटकती नहीं है। जैसा कि सीरीज़ की शुरूआत में गुल्लक कहता है - वही सुर वही राग, वही साबुन वही झाग, भाग भाग भाग, पैसा कमाने के लिए भाग, पैसा बचाने के लिए भाग। मिडिल क्लास ने ये ठानी है कि बदलाव की उम्मीद करना बेमानी है। लेकिन बिना बदलाव के भी मिडिल क्लास परिवारों का जीवन कितना बदलता है ये किस्से गुल्लक बखूबी सुनाता है।

क्या करता है निराश
गुल्लक इतनी सटीक तरीके से बनाई गई सीरीज़ है कि अगर इसमें कमियां हैं भी तो वो आपको दिखाई नहीं देती हैं। या फिर आप उन कमियों को देखना ही नहीं चाहते।

सीरीज़ का असली हीरो
इस सीरीज़ में यूं तो किसी एक को हीरो कहना बेमानी है। हर किसी ने अपना काम बेहतरीन ढंग से किया है। फिर भी गुल्लक में दो लोग दिल जीतते हैं। और वो दोनों ही दिखाई नहीं देते हैं। पहले हैं इस सीरीज़ के लेखक दुर्गेश सिंह और दूसरे सूत्रधार यानि कि गुल्लक, जिसकी आवाज़ बनकर शिवांकित परिहार दिल को छू लेने वाली कुछ अहम बातें कर जाते हैं। सीरीज़ में एक डायलॉग के साथ गुल्लक को हीरो बनाया भी गया है। अपने बारे में बताते हुए गुल्लक कहता है - गुल्लक को पिग्गीबैंक से कन्फ्यूज़ नहीं किया जा सकता है। क्योंकि पिग्गीबैंक प्लास्टिक का होता है और गुल्लक, मिट्टी से। उसी मिट्टी से जहां से कहानियां बनती हैं।

देखें या नहीं
गुल्लक में एक जगह जमील खान का किरदार संतोष मिश्रा कहते हैं -मिडिल क्लास आदमी, पैसा नहीं, इंसान कमाता है। खुश रहना चाहिए आदमी को। खुश रहने के लिए जो करना है करो। और इसलिए हम भी आपको ये सलाह देंगे कि खुश रहने के लिए गुल्लक देखिए।


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