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    नटखट रिव्यू: रेप, जेंडर इनइक्वालिटी, जैसे गंभीर विषय, 6 साल की सानिका और विद्या बालन का जबरदस्त काम

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    Rating:
    4.0/5

    डायरेक्टर - शान व्यास
    स्टारकास्ट- विद्या बालन, सानिका पटेल, राज अर्जुन, अतुल तिवारी आदि
    प्लेटफॉर्म - यूट्यूब चैनल We Are One

    मेरी (ईश्वर) हर रचना अनोखी है लेकिन समान है.... ये पंक्ति विद्या बालन की फिल्म का सार है। यही वह पाठ है जो 33 मिनट की फिल्म में देखने को ही नहीं बल्कि सीखने को मिलता है। पहली बार प्रोडक्शन में किस्मत अजमा रहीं विद्या बालन और चाइल्ड आर्टिस्ट सानिका पटेल ने जबरदस्त काम किया है। ये शॉर्ट फिल्म सीधे समाज में जारी लड़का लड़की के भेदभाव जैसे कई विषयों पर चोट करती है।

    शॉर्ट फिल्म के जरिए लिंग भेदभाव, रेप कल्चर, घरेलू हिंसा और पुरुषसत्तात्मक सोच जैसे विषय को उकेरा गया है। जहां कई कथानक आपको इस विषय पर सीख देते दिखेंगे। फिल्म छोटी जरूर है लेकिन विषय बड़े समेटे हैं। कुल मिलाकर लॉकडाउन में ऐसी फिल्म के लिए 33 मिनट जरूर हर दर्शक को निकालने चाहिए।

    'नटखट' फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर जियो मामी फिल्म समारोह में हो चुका है। इस बार मामी फिल्म फेस्टिवल यूट्यूब पर हुआ और यही इस शॉर्ट फिल्म को दिखाया गया। शान व्यास के डायरेक्टशन में बनी फिल्म 'नटखट' एक छोटे से बच्चे और उसकी मां के इर्द-गिर्द घूमती है।

    फिल्म की कहानी

    फिल्म की कहानी

    'नटखट' की कहानी मध्य प्रदेश के हरदा से जुड़ी है। जहां एक 5-6 साल का बच्चा सोनू (सानिका पटेल) समाज और परिवार की गतिविधियों को देखकर ये सीख रहा है कि स्थिति कोई भी हो लेकिन 'लड़का लड़का' होता है। जहां एक आर्दश पत्नी की जगह केवल नौकरानी या सिर्फ बिस्तर गरम करने के तौर पर है। वहीं चाचा, दादा और पिता की पुरुषसत्तात्मक सोच का प्रतिबिंब जब सोनू में पड़ता मां (विद्या बालन) को दिखाई पड़ता है तो वह सन्न रह जाती है। इससे पहले तक वह सब सहने को तैयार थी लेकिन वह अपने बेटे को ऐसी सोच के दलदल में नहीं फंसने देना चाहती। सोनू की मां एक कहानी के जरिए बेटे को ऐसी नीच सोच से परे करने का प्रयत्न करती है। जो कहानी मां बेटे को सुनाती है, वह वास्तव में उसी की पीड़ा, दर्द, मनोदशा, स्थिति से जुड़ी है।

    निर्देशन

    निर्देशन

    शान व्यास ने इस शॉर्ट फिल्म का निर्देशन किया है। इससे पहले वह कई फिल्मों को प्रोड्यूस कर चुके हैं। इस फिल्म में उन्होंने समाज के आइने को दिखाने का जबरदस्त प्रयत्न किया है। नए आइडिए के साथ इस कहानी को पिरोया गया है। सोनू यानी सानिका का काम इस फिल्म में जबरदस्त रहा है, इस छोटी सी बच्ची से, लड़के के किरदार को निभाना व ऐसे गंभीर विषय पर काम करवाने का श्रेय निर्देशक को जरूर जाएगा। वहीं कई सारे डायलॉग और सोनू के भाव आपको 33 मिनट तक पकड़ कर रखते हैं।

    अभिनय

    अभिनय

    सानिका ने तो अपने अभिनय से कमाल ही किया है साथ ही विद्या बालन इस फिल्म का मजबूत पक्ष है। जिनका काम एक बार फिर आपको सुकून देता है। शांत, आदर्श, सुलझी हुई महिला का रोल निभाने वाली विद्या बालन ने एक नरेटर का काम भी शानदार तरीके से निभाया है। जबरदस्त लेखन के साथ विद्या की खूबसूरत आवाज कहानी को बहाती ले चलती है। एक मिनट भी आपको इसे रोकने का मन नहीं करेगा।

    देखने लायक

    देखने लायक

    सोनू की मां (विद्या बालन) के चेहरे पर चोटें एक बार को आपके भी रोंगटे खड़ा कर देती हैं। दिनभर काम, फिर रात को पति की मार-पीट और उसका नोचना....आपको हिला कर रख देता है। वहीं विद्या बालन के भाव और सोनू का नटखट अंदाज आपको जरूर पसंद आएगा। फिल्म का अच्छा पक्ष ये भी है कि जो महिला खुद इस समाज की छोटी सोच के तले दब गई थी उसने अपने बेटे को इस सोच से दूर करने के लिए कई प्रयत्न किए। वहीं ये फिल्म सिर्फ जेंडर इनक्वालिटी पर ही नहीं, बल्कि रेप, शराब, बच्चों की बढ़ती उम्र में उनके ख्याल और उनपर पड़ता समाज का असर, घरेलू हिंसा जैसे कई विषय समेटे हुए हैं।

    संवाद

    संवाद

    'नटखट' के कई संवाद इस फिल्म को मजबूती देते हैं। "सीखों कुछ 'छोटे' से", ''जब कोई लड़की तंग करें उसको उठा कर जंगल ले जाओ... फिर वो कभी तंग नहीं करेगी'' , ''फांसी पर चढ़ा दोगे क्या, लड़का है हो जाता है'', ''लड़की भला लड़के को मार थोड़ी मार सकती हैं''। इस तरह के ढेरों संवाद आपको फिल्म से बांधे रखते हैं। जेंडर इनक्वालिटी जैसे विषय पर इन डायलॉग्स का काफी महत्व है। फिर अंत भी जबरदस्त डायलॉग के साथ होता है, जब मां बेटे से कहती है, भगवान की हर रचना अनोखी है लेकिन समान है...। बता दें शान व्यास के साथ राइटर अनुकम्पा हर्ष ने ये कहानी लिखी है।

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    English summary
    vidya balan natkhat Movie review in hindi and rating: based on gender equality
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