Thackeray Movie Review: चीते की तरह दहाड़े नवाजुद्दीन सिद्दीकी, इसलिए जरूर देखें 'ठाकरे'
'मैं आर्टिस्ट हूं, मजदूर नहीं'.. बाल ठाकरे (नवाजुद्दीन सीद्दीकी) ये बात अपने एडिटर को तब कहते हैं जब उनसे एक बड़े आदमी पर बनाए गए मजाकिया कार्टून को हटाने के लिए कह दिया जाता है। जिसके बाद खुद के बनाए कार्टून के जरिए ठाकरे एडिटर को इस्तीफा थमाकर न्यूज पेपर ऑफिस से बाहर निकलते हैं।
अभिजीत पेनसे की ठाकरे उनके फ्री प्रेस के कार्टूनिस्ट से लेकर माहाष्ट्र के सबसे बड़े राजनेता बनने तक के सफर को कवर करती है। वे शुरूआत करते हैं कि किस तरह प्रवासी भारतीयों खासकर दक्षिण भारतीयों की बढ़ती आमद के जवाब में बालासाहेब ठाकरे अपने 'मराठी मानुष जागा हो' से राज्य में एक हलचल मचा देते हैं। अपने स्व-प्रकाशन मार्मिक के माध्यम से, वे मराठियों के क्रोध को हवा दे देते हैं और धीरे-धीरे अपनी पॉलीटिकल पार्टी शिवसेना के जरिए लोगों के मसीहा बन जाते हैं।

नहीं कहानी में लेखकर संजय राउत कुछ प्रासंगिक राजनीतिक घटनाओं को छोड़ देते हैं जैसे कि 1969 में मोरारजी देसाई प्रकरण, कम्युनिस्ट ट्रेड यूनियनों के कुचलने, आपातकाल के दौरान ठाकरे की इंदिरा गांधी से मुलाकात, जावेद मियांदाद की दिलीप वेंगसरकर के साथ शिवसेना प्रमुख के घर पर शिष्टाचार मुलाकात और बाबरी मस्जिद विध्वंस।
पूरी फिल्म की बात करें तो, 'ठाकरे' बाला साहेब के बारे में अनजानी बातें बताने के बजाए राजनीतिक पहलू पर ज्यादा ध्यान देती है। फिल्म में ऐसी कई जगहे हैं जहां पर मेकर ने जबरदस्ती ठाकरे को स्वयंभू आदमी दिखाने की कोशिश की है। जिसके चक्कर में नवाजुद्दीन से कुछ ऐसे डायलॉग भी बुलवाए हैं- 'मेरे लिए देश पहले, राज्य बाद में' और 'मैंने पहले कलम उठाया था, पर कुछ नहीं हुआ' ये सारे डायलॉग ठाकरे की पार्टी द्वारा फैलाई जा रही हिंसा का औचित्य साबित करने के लिए हैं।
हालांकि जल्द ही मेकर्स एकदम अलग साइड पर चले जाते हैं तब डायलॉग्स भी बदल जाते हैं- 'मैं सही हूं, या गलत.. इसका फैसला आप नहीं.. देश की जनता करेगी क्योंकि सबसे ऊपर एक ही अदालत को मनता हूं वो है जनता की अदालत'
परफॉर्मेंस की बात करें तो बालासाहेब ठाकरे के किरदार में नवाजुद्दीन सिद्दीकी शेर की दहाड़ते नजर आते हैं। नवाज मात्र नकल उतार तक सीमित नहीं रहते हैं बल्कि ठाकरे का किरदार मूल पुरुष की आत्मा के साथ अपने अंदाज में निभाते हैं। मीनाताई ठाकरे के किरदार में अमृता राव अच्छी लगी हैं हालांकि ऑडिएंस उनका किरदार थोड़ा और देखना चाहती थी।
सुदीप चैटर्जी का कैमरा वर्क काफी शानदार है और प्रोडक्शन वैल्यू की बात करें तो फिल्म काफी अच्छा प्रदर्शन करती है। फिल्म का फर्स्ट हाफ ब्लैक एंड व्हाइट रखा गया है और ये फिल्म की कहानी के मुताबिक एकदम सटीक है। फिल्म की एडिटिंग टोन के साथ जाती है हालांकि फिल्म को और शार्प किया जा सकता था।
राहत ही बात ये है कि, मेकर्स ने इस फिल्म जबरदस्ती के गाने नहीं ठूंसे हैं जिससे ऑडिएंस की अटेंशन नहीं भटकती।
ठाकरे बायोपिक के तौर पर हर जगह ठीक तो नहीं है लेकिन ये फिल्म शानदार डायलॉग और नवाजुद्दीन सिद्दीकी की जबरदस्त परफॉर्मेंस से ऑडिएंस को इंप्रेस जरूर करती है। हमारी तरफ से इस फिल्म 3 स्टार।


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