Sukhee Movie Review: फेमिनिज्म पर बात करती शिल्पा शेट्टी स्टारर 'सुखी' करती है 'दुखी', कुछ भी नया नहीं

Rating:
2.0/5

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निर्देशक- सोनल जोशी
कलाकार- शिल्पा शेट्टी कुंद्रा, अमित साध, कुशा कपिला, दिलनाज ईरानी, पवलीन गुजराल, चैतन्य चौधरी

"मेरी जिंदगी तो बस सुबह की चाय और रात की दूध के बीच लटक रही है.." अपनी जिगरी दोस्त के साथ बैठी सुखी उर्फ सुखप्रीत कालरा (शिल्पा शेट्टी) कहती है। पिछले कुछ सालों में हमने कई ऐसी फिल्में देखी हैं, जहां महिला सशक्तिकरण की बात होती है, गृहस्थी संभालने वाली महिलाओं को समान इज्जत दिये जाने की बात होती है, खुलकर जीने और अपनी ख्वाब पूरे करने की बात होती है। 'सुखी' भी इन्हीं फिल्मों की सूची में आती है।

कहानी

ये फिल्म 38 वर्षीय पंजाबी गृहिणी सुखप्रीत 'सुखी' कालरा की एक हल्की-फुल्की जिंदगी के इर्द गिर्द घूमती है। जो अपनी रोजमर्रा जिंदगी से तंग आकर, अपने पति और बेटी को छोड़कर, अपने स्कूल के रियूनियन में भाग लेने के लिए पंजाब से दिल्ली चली आती है। दिल्ली वो शहर है, जहां सुखी पली बढ़ी है, स्कूल- कॉलेज लाइफ जी है। एक समय पर इस शहर की जान हुआ करती थी सुखी, जो शादी के बाद पंजाब जाकर गृहस्थ जीवन में खुद को फंसा पाती है। लिहाजा, रियूनियन के बहाने सात दिनों में वो अपनी तीन दोस्तों के साथ फिर से अपनी पुरानी जिंदगी जी लेना चाहती है। इस दौरान वह अलग अलग अनुभवों से गुजरती है। सिर्फ एक पत्नी और एक मां के तौर पर नहीं.. वह एक महिला होने की आजादी को जीती है। आखिर.. कॉलेज के दिनों में इन चार लड़कियों की ग्रूप का मोटो हुआ करता था- बेधड़क, बेपरवाह और बेशर्म..

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निर्देशन

राधिका आनंद, पौलोमी दत्ता और रुपिंदर इंद्रजीत द्वारा लिखित इस फिल्म का विषय काफी दिलचस्प है, लेकिन पटकथा के स्तर पर यह मार खाती है। हल्के फुक्ले ढ़ंग से महिला सशक्तिकरण की बात करती ये फिल्म कई जगहों पर कंफ्यूज्ड दिखती है। कुछ जगहों पर यह आपको श्रीदेवी स्टारर 'इंग्लिश विंग्लिश' की याद दिलाती है, तो कुछ जगहों पर 'वीरे दी वेडिंग' बनना चाहती है। निर्देशक सोनल जोशी ने फिल्म का फर्स्ट हॉफ अच्छी गति में बढ़ाया है, वहां सभी किरदारों को अच्छे से स्थापित करने की कोशिश की गई है। कहानी में एक तर्क समझ आता है। लेकिन सेकेंड हॉफ में फिल्म इतनी धीमी हो जाती है कि आप सिर्फ इसके खत्म होने का इंतजार करते हैं। बहरहाल, कुछ सीन काफी अच्छे बन पड़े हैं, जैसे जब गुरु पहली बार अपनी बेटी के साथ पैड खरीदने के लिए दुकान जाता है। पिता और बेटी के बीच का बॉण्ड वहां काफी खूबसूरत दिखता है।

अभिनय

सुखी के किरदार में शिल्पा शेट्टी ने अच्छा काम किया है। कॉमेडी सीन्स हो या इमोशनल, उन्होंने सुखी के साथ न्याय किया है। लेकिन कमजोर पटकथा यहां किरदारों से कनेक्ट होने का ज्यादा मौका ही नहीं देती है। फिल्म 'सुखी' देखी जाए तो चार दोस्तों की कहानी है, लेकिन यहां निर्देशक ने बाकी तीन दोस्तों (कुशा कपिला, दिलनाज ईरानी, पवलीन गुजराल) की कहानी को पूरी तरह से इग्नोर किया है। और यही वजह है कि फिल्म सेकेंड हॉफ में खिंचती हुई लगती है। तीनों अभिनेत्रियों ने अपने सीमित रोल में काफी अच्छा काम किया है। विक्रम के किरदार में अमित साध जंचे हैं। वहीं, चैतन्य चौधरी ने भी प्रभावी काम किया है।

रेटिंग

"यार सुखी तू मुझे कब सुखी होने देगी", गुस्से से भरा गुरु अपनी पत्नी सुखी से कहता है। इधर बतौर दर्शक आप यही सवाल फिल्म के निर्देशक से पूछना चाहते हैं.. क्योंकि इस 2 घंटे 20 मिनट की फिल्म से आप ऊब चुके होते हैं। फिल्मीबीट की ओर से सुखी को 2 स्टार।

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