शेरदिल: द पीलीभीत सागा मूवी रिव्यू- पंकज त्रिपाठी के कंधों पर टिकी है एक अहम संदेश देती ये औसत फिल्म
निर्देशक- सृजित मुखर्जी
कलाकार- पंकज त्रिपाठी, नीरज कबी, सयानी गुप्ता
"कुछ तो हो रहा है कि जानवर गांव की ओर भाग रहे हैं, गांव वाले शहर की ओर और शहर वाले हैं कि उनकी भूख ही खत्म नहीं होती.." गंगाराम अरचज, बेचारगी और व्यथित भाव लिए कोर्ट में कहता है। निर्देशक सृजित मुखर्जी की यह फिल्म जंगल, गांव, शहर, सरकार, गरीबी जैसे विषय के तार से जुड़ी हुई है। फिल्म पर्यावरण और इंसान से जुड़ी कई विचारों को रखना चाहती है, कुछ बातें दिल तक पहुंचने में सफल होती है, कुछ नहीं होती।
यह फिल्म सच्ची घटनाओं से प्रेरित है, जब पीलीभीत टाइगर रिजर्व के पास स्थानीय परिवारों के बुजुर्गों को कथित तौर पर मुआवजे के लिए शिकार के रूप में जंगल में भेज दिया गया था।

शेरदिल कहानी है झुंडाव गांव के सरपंच गंगाराम (पंकज त्रिपाठी) की, जो अपने गांव की गरीबी और भुखमरी की शिकायतों को लेकर सरकारी कार्यालयों के चक्कर काट काटकर थक चुके हैं। ऐसे में एक दिन गंगाराम की नजर एक नोटिस पर पड़ती है, जिसमें लिखा होता है कि अगर कोई आदमी बाघ अभयारण्य के पास बाघ का शिकार हो जाता है, तो उसके परिजनों को सरकार की ओर से 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा। इसके बाद गंगाराम भी इसी रास्ते पर चलने का मन बना लेता है। वह अपनी पत्नी लाजो (सयानी गुप्ता) और गांव वालों को समझा बुझाकर घने जंगल में बाघ का भोजन बनने की योजना से जाता है, ताकि उसका गांव उसकी मौत के मुआवजे का दावा कर सके। लेकिन जंगल की दुनिया गंगाराम के लिए किसी मायाजाल से कम नहीं होती है। जंगल में उनकी मुलाकात एक शिकारी जिम अहमद (नीरज कबी) से होती है। एक बाघ का शिकार बनने आया है और एक शिकार करने..ऐसे में दोनों किस तरह अपने फैसले को अंजाम देते हैं, इसी के इर्द गिर्द घूमती है पूरी कहानी।
निर्देशन
निर्देशक प्रकृति, विकास, गरीबी, धर्म जैसे मुद्दों पर महत्वपूर्ण संदेश देने की कोशिश करते हैं। लेकिन कमजोर लेखन का शिकार होते हैं। खासकर फर्स्ट हॉफ पटकथा काफी सुस्त और ढ़ीली लगती है और सिर्फ पंकज त्रिपाठी की संवाद अदायगी की सिग्नेचर शैली पर निर्भर करती है। सेकेंड हॉफ में पंकज त्रिपाठी और नीरज काबी के बीच हुए संवाद ध्यान आकर्षित करते हैं। लेकिन फिल्म और किरदार पटकथा से जिस मजबूती की डिमांड करती है, वह यहां अपर्याप्त साबित हुई।
तकनीकी पक्ष
तियाश सेन की सिनेमेटोग्राफी कहानी को मजबूत बनाती है। घने जंगल की हरियाली से लेकर सरकारी कार्यालय तक, उन्होंने अपने कैमरे में बड़ी खूबसूरती से उतारा है। प्रणय दासगुप्ता की एडिटिंग थोड़ी और कसी हुई हो सकती थी। फिल्म में कई दृश्य दोहराते से लगते हैं, जो अवधि बढ़ाने के अलावा कोई योगदान नहीं देते। फिल्म का संगीत दिया है शांतनु मोइत्रा ने, जो कहानी की वास्तविकता को बनाए रखती है। फिल्म में चार गाने हैं और अच्छी बात है कि सभी कहानी के साथ साथ आगे बढ़ते हैं।
अभिनय
अभिनय की बात करें तो पहले दृश्य से लेकर अंत तक पंकज त्रिपाठी ने अपनी पकड़ बनाए रखी है। कह सकते हैं कि वो एकमात्र कारण है जो आपको फिल्म से जोड़े रखते हैं। भोलापन, बेचारगी, गुस्सा, व्यथा, हिम्मत.. सभी तरह के भाव को उन्होंने सहजता से पर्दे पर उतारा है। नीरज कबी अपने किरदार में जमे हैं। दोनों कलाकारों के बीच फिल्म के कुछ सबसे मजबूत सीन्स फिल्माए गए हैं। सयानी गुप्ता अच्छी कलाकार हैं, लेकिन यहां उनके हाथ में कोई यादगार संवाद या सीन नहीं आया है।
देखें या ना देखें
कुल मिलाकर, 'शेरदिल' एक अच्छी नीयत और अच्छे कलाकारों के साथ बनी औसत फिल्म है। फिल्म के लेखन और एडिटिंग को यदि थोड़ा चुस्त किया गया होता तो यह काफी तगड़ी फिल्म बन सकती थी। शेरदिल के एक दृश्य में पंकज त्रिपाठी का किरदार गंगाराम एक ग्रामीण से कहता है, "हम दोनो हैं, निडर भी और लीडर भी.."। दिलचस्प बात यह है कि किरदार की ही तरह, अभिनेता पूरी फिल्म को अपने मजबूत कंधों पर निडरता से ढोते हैं। फिल्मीबीट की ओर से 'शेरदिल' को 3 स्टार।


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