Shastry Virudh Shastry Review: इमोशनल सी कहानी और परेश रावल- मिमी चक्रवर्ती का दिल छूने वाला परफॉमेंस

निर्देशक- शिबोप्रसाद मुखर्जी, नंदिता रॉय
कलाकार- परेश रावल, कबीर पाहवा, शिव पंडित, नीना कुलकर्णी, मिमी चक्रवर्ती, मनोज जोशी, अमृता सुभाष, टीकू तलसानिया
"बच्चे को इंसान बनाने के लिए पेरेन्ट्स चाहिए.." मल्हार शास्त्री (शिव पंडित) को सामने बैठा दोस्त समझाता है कि क्यों उसे अपने 7 साल के बेटे को साथ रखने की जरूरत है। 2017 में आई बांग्ला फिल्म 'पोस्तो' की ये हिंदी रीमेक शास्त्री परिवार में चल रही उथल पुथल के माध्यम से पेरेंटहुड पर बातें करती है।
कहानी
कहानी है यमन शास्त्री उर्फ मोमोजी (कबीर पाहवा) की। जो तीन महीने की उम्र से ही अपने दादाजी मनोहर शास्त्री (परेश रावल) और दादी (नीना कुलकर्णी) के साथ पंचगनी में रहता है। वह नटखट है, पढ़ाई और संगीत में अव्वल और मोहल्ले भर का दुलारा है। उसे प्रकृति से प्रेम है और कामकाजी मम्मी- पापा जब वीकेंड पर मुंबई से मिलने आते हैं तो उसे कोई शिकायत भी नहीं है। संगीत के शिक्षक रहे मनोहर शास्त्री उसे कहीं कोई कमी होने ही नहीं देते।
सबका जीवन बने बनाए ढ़र्रे पर चल रहा होता है, जब एक दिन मोमोजी के पिता यानि मल्हार शास्त्री को अमेरिका में बिजनेस का ऑफर मिलता है और वो अपने बेटे के साथ वहां जाना चाहते हैं। लेकिन क्या ये इतना आसान होने वाला था? दादा- दादी अपने पोते को अभी देने के लिए तैयार नहीं थे। बात इतनी बढ़ जाती है कि मामला कोर्ट तक पहुंच जाता है। आखिर में मोमोजी किसके साथ रहेगा? इसी के इर्द गिर्द घूमती है बाकी की कहानी।
निर्देशन व तकनीकी पक्ष
शिबोप्रसाद मुखर्जी और नंदिता रॉय निर्देशित ये फिल्म कुछ सामाजिक पहलूओं को छूती हुई, पेरेंटहुड जैसी गंभीर विषय पर बात करती है। हालांकि फिल्म का आधार भावनाओं पर टिका है। अपने पोते के लिए दादा- दादी का प्यार और अपने बेटे के लिए मां- पिता का लगाव। ये आज के परिवार को दिखाती है, जहां आजीविका के लिए बेटे- बहू दोनों घर से बाहर कदम निकालते हैं और ऐसे में बच्चे की जिम्मेदारी कभी परिवार तो कभी क्रेच पूरी करते हैं। यहां कोई सही या गलत नहीं है। बस समय का अभाव है।
फिल्म इमोशनल स्तर पर काफी बेहतरीन काम करती है। लेकिन गति काफी धीमी है, खासकर सेकेंड हॉफ में। साथ ही इसमें एक दमदार कोर्ट रूम ड्रामा साबित होने की काबिलियत थी। लेकिन चूक जाती है। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी शानदार है, जो शहर को भी एक कैरेक्टर की तरह बना देती है। संगीत खास प्रभाव नहीं छोड़ती।
अभिनय
वहीं, अभिनय की बात करें तो इसके कलाकार इस फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष हैं। दादाजी/गुरुजी के किरदार में परेश रावल में एक सहजता है, उन्होंने अपने की व्याकुलता, गंभीरता और भावुक पलों को पर्दे पर बेहतरीन उतारा है। मिमी चक्रवर्ती की यह पहली हिंदी फिल्म है, लेकिन हाव भाव पर उनकी मजबूत पकड़ है। मोमोजी के मां के किरदार को उन्होंने प्रभावी बनाया है। नीना कुलकर्णी, शिव पंडित, मनोज जोशी, अमृता सुभाष, टीकू तलसानिया ने भी अच्छा काम किया। वहीं, मोमोजी के किरदार में कबीर पाहवा दिल जीतते हैं।
पेरेंटहुड जैसे महत्वपूर्ण और प्रसांगिक विषय पर बनी ये फिल्म अपने इमोशंस और कलाकारों के बल पर दिल और दिमाग में जगह बनाने में सफल होती है। फिल्मीबीट की ओर से "शास्त्री विरुद्ध शास्त्री" को 3 स्टार।


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