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    'रूही' फिल्म रिव्यू: ना हंसा पाती है, ना ही डरा पाती है जान्हवी, राजकुमार, वरुण की यह 'हॉरर- कॉमेडी'

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    Rating:
    2.0/5

    निर्देशक- हार्दिक मेहता

    कलाकार- जान्हवी कपूर, राजकुमार राव, वरूण शर्मा

    कुछ फिल्मों के ट्रेलर आपकी उम्मीद को दुगुना कर देते हैं। ये आपको सिनेमाघर तक खींच ले जाते हैं। दिनेश विज़न के बैनर तले बनी हॉरर- कॉमेडी फिल्म 'रूही' भी ऐसी ही है। खासकर इसीलिए भी क्योंकि इसी बैनर की फिल्म 'स्त्री' ने बॉलीवुड में हॉरर- कॉमेडी शैली को एक नई दिशा दी थी। फिल्म के विषय को खूब तारीफ मिली थी।

    roohi

    "शादी वाले घर पे नजर रहती है उसकी, इधर दुल्हे की आंख लगी, उधर दुल्हन को उठा ले जाएगी वो.." शादी में शामिल एक महिला सभी को सचेत करते हुए कहती है। इधर पत्तों में सरसराहट होती है और बैकग्राउंड स्कोर आपको सोचने पर मजबूर करता है कि कुछ बड़ा घटने वाला है। लेकिन यहीं पर 'रूही' विश्वास तोड़ती है। फिल्म में एक दमदार- दिलचस्प मोड़ आने के इंतजार में आप क्लाईमैक्स तक पहुंच जाएंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता है।

    फिल्म की कहानी

    फिल्म की कहानी

    बागड़पुर नामक जगह में एक पुरानी प्रथा है 'पकड़ विवाह', जहां दुल्हन को किडनैप करके शादी की जाती है (और किसी को इस प्रथा से आपत्ति नहीं है)। कुछ मौकों पर लड़की की हामी होती है, कुछ में नहीं। लेकिन यह बागड़पुर की सदियों से चलती आ रही प्रथा है.. और अब एक तरह का बिजनेस भी। इसी बिजनेस में हैं भंवड़ा सिंह (राजकुमार राव) और कट्टन्नी (वरुण शर्मा)। दोनों लड़की उठाने का काम करते हैं। लेकिन ख्वाहिश नोएडा जाकर क्राइम रिपोर्टर बनने की है।

    बहरहाल, इसी पकड़म पकड़ाई में एक दिन दोनों एक लड़की को उठाते हैं, जिसका नाम है रूही (जाह्नवी कपूर)। लेकिन किसी कारणवश वह रूही को उस लड़के तक नहीं पहुंचा पाते हैं, जिससे उसकी शादी करनी है। अपने बॉस के आदेश पर दोनों कुछ दिनों के लिए रूही को दूर जंगल में एक टूटे फूटे कारखाने में लाकर रखते हैं। लेकिन यहां से कहानी में एंट्री होती है अफ्ज़ा की.. एक 'मुडियापैरी चुड़ैल'.. जिसकी ख्वाहिश होती है शादी करना। वह बिन ब्याही लड़की के शरीर में घुस कर तब तक रहती है, जब तक उसकी शादी नहीं हो जाती। इधर, भंवड़ के दिल में रूही के लिए जज्बात जगते हैं, तो अफ्ज़ा के लिए कट्टन्नी के दिल में प्यार। इस लव ट्रैंगल के बीच इन तीनों की जिंदगी में ऐसे मोड़ आते हैं, कि इनकी दोस्ती से लेकर जान तक दांव पर लग जाती है..

    क्या अफ्ज़ा के चंगुल में फंसी मासूम सी रूही को क्या भंवड़ा और कट्टन्नी बचा पाएगें? या उन पर आएगी कोई बड़ी मुसीबत.. इसी के इर्द गिर्द घूमती है फिल्म की पूरी कहानी।

    निर्देशन

    निर्देशन

    फिल्म के सबसे कमज़ोर पक्षों में है इसका निर्देशन। कहानी की शुरुआत पकड़उआ शादी से होती है, लेकिन उस प्रथा को लेकर फिल्म में फिर आगे कुछ बातें नहीं होती। ऐसा लगता है कि कुछ मिनटों के बाद निर्देशक बागड़पुर को भूल ही जाते हैं। फिल्म में ऐसी कई कड़ियां हैं, जो अधपकी सी रह गई हैं। मृगदीप सिंह लांबा और गौतम मेहरा द्वारा लिखी यह पटकथा बेहद कमजोर है। फिल्म के औसत फर्स्ट हॉफ के बाद आप उम्मीद करते हैं कि दूसरे हॉफ में विषय को कुछ दमदार तरीके से समेटा गया होगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता। फिल्म सीन दर सीन कमज़ोर पड़ती जाती है। जान्हवी, राजकुमार और वरुण से अच्छे अभिनय के बावजूद फिल्म बांधने में सफल नहीं हो पाती है। खासकर फिल्म का अटपटा क्लाईमैक्स मन और खट्टा कर जाता है।

    अभिनय

    अभिनय

    रूही और अफ्ज़ा.. दोनों ही किरदारों में जान्हवी कपूर ने अपना बेहतरीन दिया है। रूही बनकर मासूम लगीं हैं, तो अफ्ज़ा बनकर डराने में सफल रही हैं। लेकिन फिल्म की पटकथा उनके किरदार के साथ इंसाफ नहीं करती है। जान्हवी के हाथों में गिने चुने संवाद लगे हैं, और गिने चुने हाव भाव। आप उन्हें फिल्म में और देखना चाहते हैं, लेकिन निर्देशक ने दोनों किरदारों को सीमित कर दिया है।

    वहीं, राजकुमार राव भी कुछ नया करते नजर नहीं आए। खासकर उन्हें जो भाषा देने की कोशिश की गई है, वह बेहद फिजूल है। कई संवाद ऐसे बोले गए हैं कि समझ ही नहीं आते। शायद यही कारण है कि वरुण शर्मा कई दृश्यों में राजकुमार राव से बेहतर लगे हैं। वरुण ने अपने किरदार के साथ न्याय किया है। सह कलाकारों में कोई किरदार छाप नहीं छोड़ता है।

    तकनीकि पक्ष

    तकनीकि पक्ष

    मृगदीप सिंह लांबा और गौतम मेहरा की पटकथा बेहद कमजोर है, जिसके बाद ज्यादा गुंज़ाइश ही नहीं रह जाती। कहानी शुरुआत से ही हिचकोले खाती है, और अंत तक सपाट चलती है। इक्के -दुक्के पंच कॉमेडी का काम करते हैं। हुज़ेफा लोखंडवाला की एडिटिंग बिखरी पटकथा को बांधने की कोशिश करती है, लेकिन हिस्सों में ही सफल हो पाती है। अमलेंदु चौधरी की सिनेमेटोग्राफी फिल्म को रिएलिटी के थोड़ा करीब ले जाती है, चाहे बागड़पुर जैसा छोटा शहर हो या घने जंगल।

    संगीत

    संगीत

    फिल्म का संगीत दिया है सचिन- जिगर ने, जो कि प्रभावित करती है। गाने लिखे हैं अमिताभ भट्टाचार्य और आईपी सिंह और जिगर ने। राजकुमार- जान्हवी पर फिल्माया गाना 'किश्तों में' कहानी में एक रोमांटिक फील लेकर आता है। दोनों के बीच की कैमिस्ट्री अच्छी लगी है।

    क्या अच्छा, क्या बुरा

    क्या अच्छा, क्या बुरा

    फिल्म के एकमात्र पॉजिटिव पक्ष हैं, इसके कलाकार। तीनों ने इस बेदम कहानी को अपने अभिनय से ऊपर उठाने की काफी कोशिश की है। वहीं, जो बात इसके पक्ष में नहीं है- वह यह पटकथा। 'स्त्री' ने सफलता अपने किरदारों या कलाकारों की वजह से नहीं..बल्कि अपनी दमदार पटकथा की वजह से पाई थी। उसकी पटकथा काफी गहनता के साथ लिखी गई थी, वहां एक तगड़ा संदेश था। और वही गहनता यहां मिसिंग है। किरदारों की अटपटी भाषा, बेतुकी प्रथा, जबरदस्ती ढूंसी गई कॉमेडी, हॉरर के साथ रोमांस.. यह सभी बातें स्क्रिप्ट को बेदम करती है।

    देखें या ना देखें

    देखें या ना देखें

    साल भर घर में बंद ऊब चुके हैं और सिनेमाघर जाने का आनंद लेना चाहते हैं, तो रूही देखी जा सकती है। लेकिन यदि एक अच्छी फिल्म का अनुभव लेना आपकी प्राथमिकता है.. तो रूही आपको निराश कर सकती है। फिल्मीबीट की ओर से फिल्म को 2 स्टार।

    English summary
    Janhvi Kapoor, Rajkummar Rao and Varun Sharma starrer horror-comedy film Roohi is so weak in script that good performances by the trio also fails to support it. Film directed by Hardik Mehta.
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