'रॉकेट्री: द नंबी इफेक्ट' फिल्म रिव्यू- ये कहना कोई रॉकेट साइंस नहीं है कि बेहतरीन है आर माधवन की फिल्म
निर्देशक- आर माधवन
कलाकार- आर माधवन, सिमरन, रजित कपूर, सैम मोहन
देश के साथ गद्दारी के आरोप में नंबी नारायणन को जब जेल में टॉर्चर किया जा रहा था, तो इसरो (ISRO) ने उनके पक्ष में कोई कदम क्यों नहीं उठाया! सीबीआई के इस सवाल का जवाब देते हुए नंबी नारायणन (आर माधवन) कहते हैं- "साइंटिस्ट शायद होते ही ऐसे हैं, रॉकेट फेल हो जाए तो रिएक्ट करना जानते हैं, लेकिन इंसान फेल हो जाए तो कैसे रिएक्ट करना है, ये नहीं जानते.."

खिलाड़ियों और राजनेताओं पर तो हमने कई बॉयोपिक देखनी है। लेकिन किसी वैज्ञानिक की कहानी को शायद ही कभी बड़ी स्क्रीन नसीब हुई हो। नंबी नारायणन की जिंदगी को दिखाने की जिम्मेदारी उठाने के लिए आर माधवन की तारीफ होनी चाहिए। उनकी जिंदगी की उपलब्धियां, उनके जुनून, उनकी देशभक्ति, उनसे जुड़े विवाद और बड़ा संघर्ष बड़े पर्दे पर देखने लायक हैं। यह अपने खोए सम्मान को पाने की कहानी है। महत्वपूर्ण है कि ज्यादा से ज्यादा लोग पद्म भूषण सम्मानित नंबी नारायणन के बारे में जानें।
कहानी
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के पूर्व वैज्ञानिक और एयरोस्पेस इंजीनियर नंबी नारायणन के जीवन पर आधारित है फिल्म रॉकेट्री। कहानी फ्लैशबैक में चलती है जहां नंबी नारायणन एक चैनल पर इंटरव्यू के दौरान सुपरस्टार शाहरुख खान को अपनी कहानी सुनाते हैं। बिना हड़बड़ी किये, निर्देशक हमें दिखाते हैं कि 1969 में नारायणन ने नासा फैलोशिप जीती और प्रिंसटन विश्वविद्यालय चले गए। वहां, उन्होंने दस महीने के रिकॉर्ड में प्रोफेसर लुइगी क्रोको के अंदर लिक्विड फ्यूल रॉकेट टेक्नोलॉजी में अपनी थिसीस को पूरा किया। नासा (NASA) में नौकरी की पेशकश के बावजूद, नारायणन भारत लौट आए क्योंकि वो अपनी योग्यता से अपने देश को आगे बढ़ाना चाहते थे। इसरो में उन्होंने विक्रम साराभाई, सतीश धवन और एपीजे अब्दुल कलाम के साथ मिलकर काम किया। 1970 में नंबी ने लिक्विड फ्यूल रॉकेट टेक्नोलॉजी की शुरुआत की, जिसका उपयोग ISRO ने अपने कई रॉकेट के लिए किया। रॉकेट्री से जुड़ी तकनीकों को समझने और अपने देश तक लाने के लिए वो फ्रांस से लेकर रूस तक गए। लेकिन 1994 में उनकी सारी उपलब्धियों पर पानी फेरते हुए उन पर जासूसी और देशद्रोह के झूठे आरोप लगाए गए।
खोए सम्मान को पाने की कहानी
उन पर आरोप थे कि उन्होंने रॉकेट प्रोग्राम से जुड़ी जानकारी मालदीव के दो जासूसों को दी है, जिन्होंने उसे पाकिस्तान को बेच दिया। इसके बाद केरल पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और 50 दिनों तक जेल में अत्याचार किया। नंबी और उनके परिवार ने तमाम यातनाएं झेलीं। साल 1996 में सीबीआई ने इस मामले में नंबी नारायणन को क्लीन चिट दी। फिर 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें बेकसूर बताया। साल 2019 में नंबी नारायणन को भारत सरकार के प्रतिष्ठित पद्म भूषण पुरस्कार से भी नवाजा गया। फिल्म नंबी नारायणन की कहानी के साथ हमारे सिस्टम का बदसूरत चेहरा दिखाने से नहीं चूकती है।
निर्देशन
इस फिल्म के साथ आर माधवन ने निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा है। लेकिन कहना गलत नहीं होगा कि अपनी डेब्यू फिल्म और नंबी नारायणन की कहानी के साथ माधवन बेहद ईमानदार रहे। उन्होंने वैज्ञानिक की यात्रा के हर पहलू को शामिल करने की कोशिश की है, जो कि काफी रोमांचक और चुनौतियों से भरा रहा था। कुछ दृश्य आपको हैरान करते हैं, कुछ रुलाते हैं, जबकि कुछ मूकदर्शक बने रहने के लिए अपराध बोध कराते हैं। हालांकि फिल्म के फर्स्ट हॉफ में बहुत ज्यादा तकनीकी शब्दावली का प्रयोग किया गया है, जिस वजह से कहानी थोड़ी पकड़ खोती है। लेकिन सेकेंड हॉफ काफी मजबूत है.. और यह आपके इमोशंस को इतने कसकर पकड़ती है कि आपकी आंखें नम कर जाती है।
अभिनय
आर माधवन ने नंबी नारायणन के किरदार को पूरे दिल से जीया है। अपने मेकअप से लेकर संवाद और हाव भाव तक पर माधवन ने काफी काम किया है, जिस वजह से वो पर्दे पर सहज नजर आते हैं। माधवन अपने किरदार में एक अकड़, गरिमा और संवेदनशीलता बनाकर रखते हैं। कोई शक नहीं कि उन्होंने इस फिल्म को 6 साल दिए हैं। 10 से 12 मिनट लंबे कैमियो में शाहरुख खान हमेशा की तरह अपने आत्मविश्वास और इमोशंस से आकर्षित करते हैं। नंबी नारायणन की पत्नी मीना नारायणन की भूमिका में सिमरन ने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है। सहायक अभिनेताओं में सैम मोहन और रजित कपूर ध्यान खींचते हैं।
तकनीकी पक्ष
ना सिर्फ अभिनय और निर्देशन, बल्कि इस फिल्म के लेखन की जिम्मेदारी भी आर माधवन ने ही उठाई थी। फिल्म के संवाद अच्छे हैं, खासकर सेकेंड हॉफ में यह आपको लगातार बांधे रखता है। लेकिन शुरुआती एक घंटे में तकनीकी शब्दों का बहु प्रयोग थोड़ा कंफ्यूज करता है। फिल्म की एडिटिंग और वीएफएक्स मजबूत है। इस फिल्म को 8 देशों में शूट किया गया है। सिनेमेटोग्राफ सिरसा रे ने रॉकेट, इंजिन और बाकी उपकरणों के साथ साथ सभी देशों की खूबसूरती को अपने कैमरे में बखूबी उतारा है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर दिया है सैम सीएस ने, जो कि काफी जबरदस्त है। गानों की बात करें तो वो कहानी के साथ साथ चलते हैं, जो कि माधवन द्वारा लिया गया एक बहुत अच्छा कदम है।
देंखे या ना देंखे
साइंटिस्ट नंबी नारायणन की कहानी को जिस सच्चाई और हिम्मत के साथ आर माधवन ने बड़े पर्दे पर दिखाने की कोशिश की है, इसके लिए उनकी तारीफ होनी चाहिए। साथ ही ये फिल्म सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम अपने वैज्ञानिकों को उतना सम्मान देते हैं, जितने के वो हकदार हैं! रॉकेट्री एक महत्वपूर्ण कहानी है, जो जरूरी ही कहनी और सुननी चाहिए। नंबी नारायणन की उपलब्धियों को जानने और आर माधवन के शानदार अभिनय को देखने के लिए 'रॉकेट्री' जरूरी देखी जानी चाहिए। फिल्मीबीट की ओर से फिल्म को 3.5 स्टार।


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