राजनीति में खूनी तरावट परोसती रक्त चरित्र

निर्माता - शीतल विनोद तलवार, मधु मंटेना
संगीत - बापी, टुटुल
कलाकार - विवेक ओबेराय, शत्रुघ्न सिन्हा, सुशांत सिंह, अभिमन्यु सिंह
समीक्षा - राम गोपाल वर्मा, विवेक ओबेराय, हिंसा, गैंग वॉर, अन्याय के खिलाफ जाकर नायक का हिंसा का रास्ता चुन लेना और भी तमाम टिपकल बॉलीवुड मसाला फॉर्मूले इस फिल्म की जान, आन-बान और शान हैं।
फिल्म की कहानी आंध्र प्रदेश की प्रमुख राजनीतिक पार्टी तेलुगूदेशम के एक नेता की कहानी से प्रेरित है। ये नेता आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले से संबंधित थे। कथित रूप से इन नेता की हत्या कांग्रेस के बाहुबलियों ने कराई थी। फिल्म 3 भाषाओं में रिलीज हुई है। हिंदी, तमिल, तेलुगू में रिलीज इस फिल्म से रामू की उम्मीदें स्वाभाविक हैं। तो इस फिल्म में राजनीति का तड़का भी पूरे अंदाज में लगाया गया है। फिल्म इन्ही तत्वों में से कहानी निकालकर लोगों को नायक के प्रति संवेदित करने की पूरी कोशिश करती दिखाई पड़ती है।
रामू कैंप में वापसी करके शायद विवेक अपनी कंपनी की सफलता को दोहराना चाहते हैं। इससे पहले विवेक की फिल्म प्रिंस भी टिपकल फंडों से सजी बॉलीवुड मसाला फिल्म थी। शायद युवा, साथिया और ओंकारा जैसी फिल्मों में अपने शानदार अभिनय के लिए पहचाने जाने वाले विवेक को इस समय एक बड़ी हिट की दरकार सबसे ज्यादा है। ये फिल्म उनकी आशाओं पर खरी उतरेगी या नहीं ये तो दर्शक तय करेंगे। फिर भी विवेक का उम्दा अभिनय इस फिल्म के बासीपन में एक सुकून भरी तराहट देता महसूस हो रहा है।
आजकल बॉलीवुड फिल्मों में साउथ की फिल्मों के कथानक या उनके अंदाज पर फिल्म बनाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। हालांकि बॉलीवुड के लिए ये कई नयी बात नहीं है, फिर भी वांटेड में सलमान खान की ताबड़तोड़ सफलता इस तरह के निर्माता, निर्देशकों के लिए एक प्रेरक घटना के रूप में काम कर रही है। राम गोपाल वर्मा ने रण और फूंक 2 के बाद फिर एक बार लगभग उसी चिर परिचित अंदाज और कहानी के साथ दर्शकों का मन जीतने की पूरी कोशिश की है। अब देखना ये है कि वह इसमें कितने सफल रहते हैं। वैसे दबंग फिल्म की सफलता भी इस ओर इशारा करती है कि अगर कहानी का ट्रीटमेंट बेहतर हो तो पुरानी कहानी नई फिल्म के जामें में दर्शक पसंद करते रहेंगे।


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