'रक्षाबंधन' फिल्म रिव्यू : अक्षय कुमार स्टारर दहेज प्रथा पर बनी एक गैर- जिम्मेदार फिल्म
निर्देशक- आनंद एल राय
कलाकार- अक्षय कुमार, भूमि पेडनेकर, सादिया खातीब, सहजमीन कौर, दीपिका खन्ना, स्मृति श्रीकांत, सीमा पाहवा
कुछ फिल्में अच्छी होती हैं, कुछ बुरी होती हैं, लेकिन बहुत कम फिल्में आपत्तिजनक होती हैं। 'रक्षाबंधन' उन्हीं फिल्मों में शामिल होती है, जिसकी कहानी, जिसका विषय आपत्तिजनक है। दहेज प्रथा जैसे संवेदनशील विषय पर बनी ये फिल्म पहली दृश्य से ही आपको परेशान करती है। आप सोचते हैं कि शायद आगे चलकर कहानी में निर्देशक ने इसकी भरपाई की होगी या कोई कड़ी जोड़ी होगी, लेकिन नहीं, ऐसा कुछ नहीं होता है। यहां भाई अपनी एक बहन को "अमावस की रात" बुलाता है क्योंकि उसका रंग सांवला है, दूसरी को "डबल डेकर" क्योंकि उसका वजन ज्यादा है। फिल्म में इस तरह की तमाम बातें शामिल हैं, जो आपको भौहें सिकोड़ने पर मजबूर कर देगी। हां, अंत तक जाते जाते "दहेज देना उतना ही बड़ा अपराध है, जितना दहेज लेना.." जैसी बातें की जाती हैं, लेकिन ये संवाद कोई असर नहीं छोड़ते हैं।
कहानी
4 बहनों में सबसे बड़ा और इकलौता भाई लाला केदारनाथ (अक्षय कुमार) चांदनी चौक में एक चाट- गोलगप्पे की दुकान चलाता है, जिसे उनके पिताजी ने शुरू किया था। लाला ने अपनी मां से उनकी मृत्यु पर वादा किया कि वह अपनी चारों बहन की शादी करवाने के बाद ही, अपनी शादी करेगा। अपने वादे को पूरा करने के लिए लाला अथक प्रयास करता है। लेकिन लड़के वालों की मांग हर बार बढ़ती ही जाती है। फिर भी वह अपनी हैसियत से उठकर दहेज जुगाड़ करता है। इस दौरान उसकी निजी जिंदगी में भी कई हिचकोले आते हैं। वह अपनी प्रेमिका सपना (भूमि पेडनेकर) से दूर होने लगता है। लाला की अपनी बहनों के प्रति प्रतिबद्धता.. उसकी और सपना की प्रेम कहानी को आगे बढ़ाने के लिए एक बड़ी बाधा है। इस बीच सबसे बड़ी बहन गायत्री (सादिया खातीब) का विवाह पक्का हो जाता है। खूब सारा दहेज देकर हंसी खुशी उसकी शादी हो जाती है। फिर लाला बाकी तीन बहनों की शादी को लेकर चप्पल घिसता है। लेकिन इस बीच कुछ ऐसी घटनाएं घटती हैं, जो उसे अंदर तक हिला डालती हैं। दहेज को लेकर उसकी सोच में बदलाव आता है। ऐसे में लाला अपनी बहनों के लिए और सपना के लिए क्या फैसला लेता है.. इसी के इर्द गिर्द घूमती है कहानी।
अभिनय
लाला केदारनाथ की भूमिका में अक्षय कुमार ने कुछ हिस्सों में अच्छा काम किया है। बहनों के साथ इमोशनल दृश्यों में उनकी बॉण्डिंग अच्छी दिखी है। लेकिन कहीं कहीं वह ओवर द टॉप दिखे हैं, खासकर जहां उनके लंबे संवाद हैं। उनके किरदार में कोई नयापन नहीं दिखता है। कहना गलत नहीं होगा कि यहां किसी भी किरदार में गहराई नहीं है। बहरहाल, भूमि पेडनेकर भले ही छोटी सी भूमिका में हैं, लेकिन जितनी देर वो स्क्रीन पर रहती हैं, नजरें बांधे रखती हैं। भूमि ने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है। वहीं, चारों बहनों के किरदार में सादिया खातीब, सहजमीन कौर, दीपिका खन्ना, स्मृति श्रीकांत अच्छी लगी हैं। काश निर्देशक ने उनके किरदार को थोड़ा और तराशा होता।
निर्देशन
आपत्ति की एक साथ वजह ये भी है कि ये फिल्म साल 2022 में बनाई गई है। इस सच्चाई से कोई इंकार नहीं है कि भारत में कई जगहों पर अभी भी दहेज का प्रचलन जारी है, कई बार 'उपहार' की आड़ में दिया जाता है, तो कई बार विवशता में। लेकिन आनंद एल राय की "रक्षाबंधन" के साथ समस्या यह है कि दहेज प्रथा की बुराई के बारे में दर्शकों को शिक्षित करने के लिए, फिल्म पहले इसे काफी हद तक महिमामंडित करती है। आनंद एल राय जैसे निर्देशक से इतनी कमजोर पटकथा वाली फिल्म की उम्मीद नहीं होती है, जिन्होंने इससे पहले रांझणा, तनु वेड्स मनु, अतरंगी रे जैसी फिल्में दी हैं। यहां फिल्म अपना आखिरी मैसेज देने में बुरी तरह फेल रही है। कहीं लड़कियों पर उनके रंग, चाल ढ़ाल और वजन को लेकर तंज कसा गया है, तो कहीं उन्हें बाप- भाई की बोझ बताया गया है। एक दृश्य में अक्षय कुमार का किरदार लाला केदारनाथ मोहल्ले के लड़कों को पीटते हुए कहता है कि यदि कोई लड़का किसी लड़की को छेड़गा तो उसे उसी लड़की से शादी करना होगा। आपत्ति ये नहीं है कि फिल्म में ये सभी बातें हैं.. आपत्ति इससे है कि अंत तक भी निर्देशक इन बातों को गलत साबित करने की चेष्टा करते नहीं दिखे हैं।
तकनीकी पक्ष
फिल्म की पटकथा लिखी है हिमांशु शर्मा और कनिका ढ़िल्लौ ने, जो कि बेहद कमजोर है। लेखक फिल्म के द्वारा दहेज प्रथा को लेकर जो भी संदेश देना चाह रहे हैं, वहां बुरी तरह फेल रहे हैं। शुरुआत से ही फिल्म को लेकर ये बात काफी चर्चा में रही है कि फिल्म महज 1 घंटे 50 मिनट की है। फिल्म की एडिटिंग की है हेमल कोठारी ने, जिन्हें इसका श्रेय मिलना चाहिए.. क्योंकि सच कहा जाए तो यहां मेकर्स के पास कहानी में कहने के लिए ज्यादा कुछ था भी नहीं। फिल्म की प्रोडक्शन डिजाइन और केयू मोहनन की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है।
संगीत
फिल्म का संगीत दिया है हिमेश रेशमिया ने और ईशान छाबड़ा ने मूल बैकग्राउंड स्कोर बनाया है। इरशाद कामिल ने गीत लिखे हैं। कहना गलत नहीं होगा कि संगीत फिल्म का एक मजबूत पक्ष है। गाने ही फिल्म में इमोशन लाते हैं और किरदारों से जोड़ते हैं। श्रेया घोषाल और अरिजीत सिंह द्वारा गाया गया "धागों से बंधन" और रोमी द्वारा गाया "बिदाई" कहानी के भावनात्मक पक्ष को सामने लाने में कुछ हद तक सफल होता है।
रेटिंग
भाई- बहनों के रिश्ते पर बनी और दहेज प्रथा के मुद्दे को दिखाती यह फिल्म अपने मैसेज को देने में बहुत लापरवाही बरतती है। फिल्म का लेखन बहुत ही गैर जिम्मेदाराना है, जिससे सारे किरदार और परिस्थितियां झूठी प्रतीत होती हैं। फिल्मीबीट की ओर से अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म 'रक्षाबंधन' को 1 स्टार।


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