Pataakha Movie Review: सुनील ग्रोवर ने आग लगा दी, सान्या-राधिका ने जीत लिए दिल, शानदार फिल्म
Recommended Video

नाम की तरह ही ये फिल्म पहले ही सीन से धमाकेदार है। जिसमें दो लड़कियों का क्लोजअप दिखाया जाता है जो एक-दूसरे से कसमें खाती हुईं नजर आती है। साल गुजरते जाते हैं लेकिन इन दोनों बहनों का एक-दूसरे के लड़ाई-झगड़े और गाली-गलौच कम नहीं होती है।
दोनों का नाम फूलों पर रखा गया है, चंपा aka बड़की (राधिका मदान) और गेंदा aka छुटकी (सान्या मल्होत्रा) दोनों ही न तो शांत हैं और नही शिष्ट.. मोटे और बेढंगे झाडू जैसे बाल, बीडी पीकर पीले और गंदे हुए दांत और गालीयों से भरी बातें.. ये लड़कियां झगडालू हैं और बात-बात पर लड़ाई के लिए तैयार हो जाती हैं। दोनों एक दूसरे पर कैंची की तरह जबान और जहर से भरे हुए शब्द का इस्तेमाल करते नहीं थकती हैं, और हैं 'गोबर लड़ाई' कोई बड़ी बात नहीं है। इन सबके बीच एक जरूरत से ज्यादा दखलअंदाजी करने वाला पड़ोसी डिप्पर (सुनील ग्रोवर) जो दोनों बहनों के बीच लड़ाई लगवाने का एक मौका भी नहीं छोड़ता है।
छुटकी स्कूल जाने का सपना देखती है ताकि वो खुद का स्कूल खोल सके। दूसरी तरफ बड़की स्कूल से दूर रहना चाहती और अपना डेरी बिजनेस शुरू करना चाहती है। लड़ाई-झगड़े और महत्वाकांक्षाओं के बीच दोनों बहनों को मिलते हैं पहले प्रेमी। एक इंजीनियर है और दूसरा आर्मी में है और उसे अंग्रेजी बोलने का बहुत शौक है।

वहीं फिल्म में नाटकीय मोड़ तब आता है जब दोनों बहनों के पिता (विजय राज) को अपने बिजनेस को बचाने की नौबत आती है जिसके चलते रिशवत देने के लिए पैसों की जरूरत पड़ती है। उनके पास अपनी एक बेटी की शादी अमीर और विधुर पटेल (सदानंद वर्मा) से करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता है। जिसके चलते दोनों लड़कियां अपने-अपने ब्वॉयफ्रेंड के साथ भाग जाती हैं। जहां दोनों को पता चलता है कि वे एक ही घर में ब्याह कर आ गई हैं वो भी देवरानी-जेठानी बनकर।
फिल्म में कहा गया है कि 'हम अपने दुश्मन तो चुन सकते हैं पर पड़ोसी नहीं, रिश्ते तो चुन सकते हैं पर रिश्तेदार नहीं'
विशाल बारद्वाज की क्रिएटिविटी और शानदार परफॉर्मेंसेस ने फिल्म को और भी एंटरटेनिंग बना दिया है। ग्लैमर से हटकर छोटे शहर की ये कहानी अपने देसीपन से आडिएंस के दिलों में उतर जाती है। हमारी तरफ से इस फिल्म को 3.5 स्टार्स


Click it and Unblock the Notifications











