फिल्म समीक्षा- एमएलए ने दिखाई क्या होती है सत्ता की भूख
निर्माताः बी एल के
निर्देशकः शिव दूबे
संगीतः संदेश सांडिल्य
कलाकारः चैतन्य नायडू, ओमकार दास मनिकपुरी, मुकेश तिवारी, कृष्णा श्रीवास्तव, दीप राज राना, पंकज त्रिपाठी
इस हफ्ते रीलीज हुई एमएलए आम जनता के हित से खेलते पॉलिटिशियन की कहानी है। इस फिल्म में निर्देशक शिव दूबे ने यह दिखाने की कोशिश की है कि किस तरह एक ईमानदार बिज़नेसमैन को अपने रौब के दम पर बदलकर एक भ्रष्ट पॉलिटीशियन आम जनता के हित से खिलवाड़ करने की कोशिश करता है।

फिल्म की कहानी की शुरुआत होती है भागलीपुर के एक गांव से जहां लोगों को रोजगार दिलाने के लिए उद्दोगपति कमल कुशवाहा (चैतन्य नायडू) एक मिल्क फैक्ट्री खोलता है। उसी गांव का एक भ्रष्ट एमएलए (मुकेश तिवारी) अपने फायदे के लिए और गांव के लोगों का फायदा उठाने के लिए कमल को अपनी दोस्ती का हाथ बढ़ाता है। पर कमल जो कि हमेशा सच का ही साथ देता है एलएमए की दोस्ती के पीछे के इरादों को भांप जाता है और गांव के लोगों को एमएलए की असलियत बता देता है।
गांव के लोग एक नये एमएलए के चुनाव की मांग करते हैं पर उस भ्रष्ट एमएलए को ये पसंद नहीं आता और वो काफी कोशिश करता है कि अपनी कुर्सी बचा ले। गांव का एक किसान (ओमकार दास मनिकपुरी) गांव के हालातों में बदलाव लाने की पूरी कोशिश करता है। अब उसकी ये कोशिश किस हद तक सफल होती है और क्या गांव में नया एमएलए बन पाता है इन्ही सब सवालों के घेरे में पूरी फिल्म घूमती है।
फिल्म का सबसे बड़ा कमजोर पहलू है इसका स्टारकास्ट। किसी भी बड़े स्टार का न होना इस फिल्म के पॉपुलर होने में काफी मुश्किलें ला सकता है। मुकेश तिवारी, ओंकार दास, पंकज त्रिपाठी, दीप राज राना और कृष्णा श्रीवास्तव ने अपने किरदारों के साथ पूरा इंसाफ किया है पर चैतन्य नायडू एक ईमानदार बिज़नेसमैन के रुप में कुछ खास प्रभाव नहीं छोड़ पाए। निर्देशन की दृष्टि से फिल्म काफी अच्छी है पर परदे पर कहानी काफी जल्दी जल्दी भागती प्रतीत होती है।


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