दिल को छूकर नहीं गुजरी माई नेम इज खान

By Neha Nautiyal

My Name is Khan
करन, शाहरुख और काजोल की तिगड़ी

लंबे अंतराल के बाद करन, शाहरुख और काजोल की तिगड़ी एक बार फिर एक साथ परदे पर उतरी है। इससे पहले आप इस तिगड़ी को कुछ-कुछ होता है और के3 जी में देख चुके हैं। ऐसा लगता है करन जौहर इस बार कुछ अलग हट कर करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने 'माई नेम इज खान' को चुना।

''दुनिया में सिर्फ दो किस्म के इंसान होते हैं एक वो जो बुरे होते हैं और दूसरे वो जो अच्छे होते हैं। मेरा नाम रिजवान खान है और मैं एक अच्छा इंसान हूं।'' फिल्म का ये संवाद शायद लोकप्रिय हो जाए। कहानी के मुख्य किरदार का नाम है रिजवान खान, हालांकि अन्य किरदारों की भी अपनी अहमियत है। रिजवान खान, मुंबई के बोरीवली इलाके में रहने वाला एक शख्स है जो 'एसपर्गर सिंड्रोम' से पीड़ित हैं। आजकल बॉलीवुड में किसी बीमारी को लेकर फिल्म बनाने का चलन शुरू हो गया है।

अच्छी बात है कि बॉलीवुड अब अपने कलाकारों को 'बल्ड कैंसर' का मरीज नहीं बनाता। जो सत्तर, अस्सी और नब्बे के दशक में बॉलीवुड की सबसे लोकप्रिय बीमारी रही है। आज उनके पास मरीज बनाने के लिए तरह तरह की बीमारियां मौजूद हैं। रिजवान बेहतर जीवन की तलाश में मुंबई से लॉस एंजेलिस चला जाता है। एसपर्गर से पीड़ित, बेहद शर्मीले और लोगों से घुलने-मिलने में कठिनाई महसूस करने वाले इस युवक को मंदिरा नाम की एक भारतीय महिला से प्यार हो जाता है। दोनों शादी कर लेते हैं। ये सारा घटनाक्रम 9/11 से पहले का है।

और इसके आगे ही असली कहानी की शुरूआत होती है। किस तरह 9/11 के हमले बाद एक व्यक्ति जिंदगी में तूफान ले आते हैं क्योंकि उसके नाम के साथ 'खा़न' जुड़ा होता है। फिल्म में धर्म भी है, राजनीति भी, हताशा भी है, उम्मीदें भी। आखिर में अपने प्यार को वापस पाने के लिए रिजवान खान अमेरिका के राष्ट्रपति तक पहुंच जाता है। फिल्म का अंत बहुत हद तक नाटकीय हो जाता है। लेकिन एक सच सामने आता कि अपना हक पाने के लिए आपको दुनिया के सबसे ताकतवर देश की ओर देखना होगा क्योंकि वही सब का कर्ता धर्ता है। ये आप पर निर्भर करता है फिल्म देखने के बाद आप क्या संदेश साथ लेकर जाते हैं।

शाहरुख खान

शाहरुख खान एक बेहतरीन अभिनेता समझे जाते हैं। बॉलीवुड में वो एक ऊंचे मुकाम पर हैं और दर्शकों के दिलों में 'राज' करते हैं। हकला कर संवाद बोलने की उन्होंने अपनी एक खास शैली विकसित की है। शाहरुख का ये ट्रेडमार्क आम जन में बेहद लोकप्रिय भी है। शाहरुख के साथ दिक्कत ये है कि किरदार की गहराई में उतरने की उनकी कोशिश के बावजूद वो किरदार में नहीं उतर पाते और दिमाग में शाहरुख बनकर ठहर जाते हैं। किसी भी कलाकार की ये एक बड़ी खासियत होती है कि उसे उसकी अदाकारी के लिए याद रखा जाए लेकिन उससे भी बड़ी बात होती है कि किसी कलाकार के किरदार को याद रखा जाए। किरदार में घुसकर उसको जीने से कलाकार की एक्टिंग टाईप्ड नहीं रह जाती। शाहरुख को 'चक दे' और 'स्वदेश' के लिए याद रखा जाएगा।

करन जौहर

करन जौहर 'कुछ कुछ होता है' और 'कभी खुशी कभी गम' किस्म की फिल्मों से बाहर निकलकर एक सामाजिक मुद्दे पर फिल्म बनाने आए हैं। करन जौहर अभी तक एक ऐसे निर्देशक नहीं बने हैं कि किसी फिल्म के निर्देशन के लिए उन्हें याद रखा जाए। माई नेम इज खान से वो यही कोशिश करना चाहते हैं। करन जौहर एक ऐसे निर्देशक नहीं हैं जो किसी एक्टर को डायरेक्टर के हिसाब से काम करवा सकें। आप उनकी पुरानी फिल्मों पर नजर डालें तो पाएंगे वो ऐसी स्टार कास्ट अपनी फिल्मों मे लेते हैं जो एक्टिंग कर लेते हैं। करन किसी एक्टर अंदर का पूरा हुनर बाहर निकाल पाने में बहुत कामयाब नहीं दिखाई पड़ते।

काजोल

काजोल एक बेजोड़ अभिनेत्री हैं। उनकी और शाहरुख की जोड़ी पर्दे पर बहुत अच्छी दिखती भी है। काजोल की एक्टिंग से शायद बहुत कम लोगों को शिकायत होगी। पर्दे पर बेहद सहज दिखने वाली काजोल अपनी मौजूदगी का हमेशा ताजगी भरा अहसास कराती हैं। ये उनकी खासियत है। फिल्म का निर्देशन करन जौहर ने किया है। पटकथा, संवाद और स्क्रीन प्ले लिखा है शिवानी भटीजा ने। निरंजन अयंगर ने फिल्म के गीत लिखे हैं। सिनेमैटोग्राफी है रवि के चंद्रन की और संगीत दिया है शंकर, एहसान, लॉय ने।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+
X