Mrs Chatterjee Vs Norway Movie Review: इमोशनल करेगी दिल दहला देने वाली ये सच्ची कहानी, दमदार हैं रानी मुखर्जी

निर्देशक- आशिमा छिब्बर
कलाकार- रानी मुखर्जी, अनिर्बान भट्टाचार्य, जिम सर्भ, नीना गुप्ता
सच्ची घटनाओं पर बनी फिल्मों का आकर्षण और प्रभाव काफी अलग होता है। यही वजह से है निर्माता- निर्देशक अक्सर इससे प्रेरित होते दिखते हैं। इस बार निर्माता निखिल आडवाणी और मधु भोजवानी एक ऐसी ही दिल झकझोरने वाली रियल कहानी लेकर आए हैं, जिसने नॉर्वे में रह रहे एक भारतीय कपल की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी।
ये रियल लाइफ कहानी है सागरिका चक्रवर्ती की, जो अपने पति के साथ नॉर्वे शिफ्ट हुई थीं। मई 2011 में नॉर्वेजियन चाइल्ड वेलफेयर सर्विसेज (CWS) ने इस भारतीय कपल (अनुरूप और सागरिका भट्टाचार्य) के दोनों बच्चों अभिज्ञान और ऐश्वर्या को अपनी कस्टडी में ले लिया था। CWS ने फैसला सुनाया कि दोनों बच्चे 18 साल की उम्र तक फोस्टर केयर में रहेंगे। इसके बाद कपल ने काफी संघर्ष किया। पूरे मामले ने भारत और नॉर्वे के बीच एक राजनयिक विवाद भी खड़ा कर दिया था। तीन साल की कड़ी लड़ाई के बाद सागरिका को अपने बच्चे वापस मिल गए। इसी लड़ाई को रानी मुखर्जी ने 'मिसेज चटर्जी वर्सेस नॉर्वे' में दिखाया है।
कहानी
देबिका (रानी मुखर्जी) एक गृहिणी है जो मातृत्व और नॉर्वे में अपने जीवन से जूझ रही है। उसके पति अनिरुद्ध (अनिर्बान भट्टाचार्य) नॉर्वेजियन भाषा और वहां की चाल चलन को अपनाते हैं, लेकिन देबिका अपनी भारतीय जड़ों को बनाए रखती है। वो मुश्किल से टूटी फूटी अंग्रेजी में बात करती है। उनकी जिंदगी तब बदल जाती है, जब एक दिन अचानक नॉर्वेजियन चाइल्ड वेलफेयर सर्विसेज उनके बच्चों को जबरदस्ती उठाकर ले जाता है क्योंकि उन्हें लगता है कि दंपति अपने बच्चों की परवरिश करने के लिए अयोग्य हैं। नॉवे सरकार उन पर बच्चों को फोस्टर केयर में रखने का दवाब बनाती है। कारण बताया जाता है कि कपल को बच्चों से भावनात्मक जुड़ाव नहीं है.. वो बच्चों को हाथ से खाना खिलाते हैं और साथ सुलाते हैं। आखिरी फैसला सुनाया कि दोनों बच्चे 18 साल की उम्र तक फोस्टर केयर में रहेंगे। इसके बाद, कैसे देबिका अपने बच्चों को वापस पाने के लिए वहां की सरकार से लड़ती है, उनके घोटाले का पर्दाफाश करती है.. बाकी की कहानी इसी के इर्द गिर्द घूमती है। इस संघर्ष में उसके पुराने रिश्ते भी टूटते हैं, लेकिन बच्चों के पाने के बाद उसे उसका सम्मान और आत्मविश्वास दोनों मिल जाता है।
अभिनय
रानी मुखर्जी जैसी दमदार अदाकारा जब पर्दे पर आती हैं तो उम्मीद भी बढ़ जाती है। मिसेज चटर्जी के किरदार में रानी बेहद शानदार नजर आई हैं, लेकिन उनके किरदार की लिखावट में एक सूक्ष्मता की कमी खलती है। फिल्म के सेकेंड हॉफ में उनकी चु्प्पी आपको ज्यादा प्रभावित करती है और भावनाओं को समझने का ज्यादा मौका देती है। रानी धीरे-धीरे सागरिका चक्रवर्ती बन जाती है। वहीं, उनका बेहतरीन साथ देते हैं अनिर्बान भट्टाचार्य। वो अपने किरदार से नफरत कराने में सफल रहे हैं। जिम सर्भ फिल्म में कुछ बेहतरीन पल लाते हैं। वह नॉर्वे में भारतीय मूल के एक वकील का किरदार निभा रहे हैं और फिल्म को एक ऊंचाई देते हैं। लिहाजा, क्लाईमैक्स तक जाते जाते आप उन्हें और ज्यादा देखना चाहते हैं। फिल्म में मिसेज चटर्जी के वकील की भूमिका निभाने वाले बालाजी गौरी ने उल्लेखनीय कैमियो दिया है।
निर्देशन
फिल्म की कहानी भावनात्मक तौर पर जितनी दमदार है, कहीं ना कहीं स्क्रीन पर वो उस स्तर की इंटेनसिटी नहीं दे पाती है। फिल्म की शुरुआत दमदार है, फिर बीच में यह थोड़ी सपाट चलती है, लेकिन क्लाईमैक्स तक पहुंचते पहुंचते फिर ऊपर उठती है। ऐसे कई दृश्य हैं जो आपको भावुक करने के साथ-साथ आपके दिल को भारी कर देंगे। एक मां से उसके बच्चों को छीनकर ले जाने की कहानी आपको व्यथित करेगी। वहीं, कुछ कोर्ट रूम सीन्स भी प्रभावी हैं। इसके साथ ही निर्देशक जिस कुशलता से पितृसत्ता पर तंज सकती हैं, घरेलू हिंसा जैसे विषय को छूती हैं, वह सराहनीय है। हालांकि, फिल्म के कहानी को थोड़ा और बांधने की जरूरत थी। फिल्म शुरुआत में कुछ सवाल खड़े करती है, लेकिन उसका सटीक जवाब नहीं दे पाती है।
तकनीकी पक्ष
चूंकि कहानी बंगाली कपल की है, फिल्म के संवाद लगभग बांग्ला में हैं, जो आम दर्शकों के लिए एक बाधा बन सकती है। हालांकि हिंदी और अंग्रेजी में सबटाइटल्स हैं। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी Alvar Kõue ने की है, जो कि काफी प्रभावी है। नॉर्वे के दृश्य हों या कोलकाता के या कोर्ट सीन्स, उन्होंने कहानी को मजबूत बनाया है। नम्रता राव की एडिटिंग अच्छी है, लेकिन थोड़ी और कसी जा सकती थी, खासकर सेकेंड हॉफ में। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर शानदार है।
संगीत
इस फिल्म का संगीत अमित त्रिवेदी ने तैयार किया है। जबकि गाने के बोल कौसर मुनीर ने लिखे हैं। फिल्म में तीन गाने हैं, लेकिन खास बात है कि तीनों ही गाने कहानी के साथ साथ बैकग्राउंड में चलते हैं। गाने के बोल आपको इमोशनल करते हैं, लेकिन लंबे समय तक याद नहीं रहते।
रेटिंग
'मिसेज चटर्जी वर्सेस नॉर्वे' असल घटना पर आधारित है और यही बात फिल्म देखने के दौरान आपकी भावनाओं को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। एक मां और बच्चे की दूरी आप इस तरह महसूस कर सकेंगे, जो आपके दिल को झकझोर कर रख देगा। हालांकि मजबूत फर्स्ट हॉफ इसे और ऊपर उठा सकता था। बहरहाल, रानी मुखर्जी के दमदार अभिनय के लिए आपको ये फिल्म जरूर देखनी चाहिए। फिल्मीबीट की ओर से 'मिसेज चटर्जी वर्सेस नॉर्वे' को 3 स्टार।


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