इतिहास में एक मील का पत्थर: जोधा-अकबर

गोवारीकर इस बात के लिए बधाई के पात्र जरूर है कि उन्होंने पहली बार एक बादशाह को एक आम आदमी की तरह दिखाने की कोशिश की है. यही बात इस बात से भी जुड़ जाती है कि एक बादशाह केवल बादशाह ही नही होता. लेकिन आशुतोष यदि इसे इतनी ही लंबी फिल्म की तरह प्रस्तुत न करके इस बात को संक्षेप में कहते तो शायद यह और बेहतर फिल्म हो सकती थी.
हालांकि अपनी ओपनिंग में जब वे फिल्म में बैरम खां और अकबर का परिचय देते हैं तो लगता है कि वे कोई सर्वश्रेष्ठ फिल्म बनाने जा रहे हैं पर जैसे जैसे फिल्म आगे बढती है वे कहानी को एक आम प्रेमकथा की तरह सामने लाने लगते हैं. लेकिन फिर भी वे इस फिल्म के जरिए आज के धर्मिक विरोधाभासों, असमंजसो, भ्रम के माहौल और आज भी बादशाह अकबर की प्रासंगिकता के साथ जिस मायने में सामने लाते हैं वह एक बेहतर कोशिश तो है ही.
फिल्म की कहानी युवा जलालुद्दीन अकबर (ह्रितिक रोशन) के जीवन काल से जुडी हैं. उसे कम उम्र में युदध के मैदान में भेज दिया जाता है. जीत के बाद वापस लौटने और बादशाह घोषित होने पर अकबर के लिए सबसे पहली शर्त है विरासत में मिले देश और राज्य की सीमाओं की सुरक्षा. इसके लिए उसने न केवल अपने पारंपरिक शत्रु माने जाने वाले राजपूतों से वैवाहिक रिश्ते कायम किए बल्कि कूटनीति की ऐसी मिसाल भी कायम की जो अब तक याद की जाती हैं.
कुछ राजपूत राजा ऐसे भी हैं जो अपनी रियासतों को अकबर के हवाले नहीं करना चाहते. इसी मुहिम की कडी में उसकी मुलाकात आमेर के राजा भारमल (कुलभूषण खरबंदा) से होती है जिसकी बेटी जोधा (ऐश्वर्या राय) की सगाई एक राजपूत से हो चुकी हैं. लेकिन वे नहीं चाहते कि अकबर उनके राज्य में हाथ डाले सो तमाम विरोधों के बावजूद वह आमेर को बचाने के लिए अपने विवाह की तैयारी करती बेटी के विवाह का प्रस्ताव लेकर अकबर के पास पहुँच जाते हैं. जोधा को यह राजनैतिक और कूटनीतिक विवाह पंसद नहीं. वह इंकार कर देती हैं और इसी इंकार, साहस और एक स्त्री के सम्मान की रक्षा के साथ उसकी अस्मिता को बचाए रखने के फैसले का परिणाम था अकबर जोधा का प्रेम और विवाह का व्याकरण. जिसमें पहली बार एक बादशाह को आम आदमी की तरह अपने परिवार के विरोध, आपसी रजिंशों और अपने ही रिश्तों में उपजे षड़यंत्रों से निबटते हुए खुद को हिदुस्तान का सबसे महान मुगल सम्राट साबित करने की की कवायद शामिल है. सोलहवीं शताब्दी में किस्सों कहानियों में दोहरायी जाने वाली और तथ्यात्मक प्रमाणों के विवादो में उलझी इसी प्रेम और विवाह संबध के यथार्थ को टटोलती तह को उकेरने वाली कहानी है जोधा अकबर.
फिल्म में जावेद के लिखे करीब चार गीत हैं लेकिन वे ऐसे गीत हैं कि उन्हें हम लोकप्रिय संगीत की श्रेणी में नहीं रख सकते. इनमें एक रूमी की तर्ज पर लिखा गीत मौला मेरे मौला और दूसरी नाद कव्वाली जश्ने बहारा पहले ही प्रोमो के जरिए लोगों की जबान पर चढ गया है. यही नहीं फिल्म का एक गीत मरहबा तो गजब का फिल्माया भी गया है. लंबे समय बाद आए कोरियोग्राफर्स रेखा और चिन्नी प्रकाश के साथ राजू खान ने उसके संयोजन और किरण देवहंस के फिल्माकंन ने प्रभावशाली बना दिया है. रहमान के संगीत में उनकी मशहूर फिल्म ताल की गमक सुनायी देती है लेकिन यह वह रहमान का यह संगीत नहीं जो ताल, लगान की तरह बरसों तक याद किया जा सके.
ह्रितिक ने युवा अकबर के चरित्र पर मेहनत की है पर वे उस क्षितिज तक नहीं पहुँच पाए जो युवा होते हुए भी बादशाह की शारीरिक भाषा और शब्दों में दिखायी सुनायी देता है. उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है उनके उर्दू और अरबी के साथ फारसी में इस्तेमाल होने वाले शब्दों के साथ बोले गए संवाद, जिनमें उच्चारण की समस्या दिखायी देती हैं. कई जगह वे बहुत प्रभावशाली तरीके से सामने आते हैं पर जल्दी ही वे चलने के अदांज और बोलने की शैली में भी अपने स्टारडम वाली अदा पर वापस लौट जाते हैं. अंत में वे जिस गंभीरता के साथ अपने पात्र को विस्तार देने की कोशिश करते हैं वह भी उनकी एक्शन हीरो वाली छवि में गुम हो जाता है. इसकी वजह यह है कि ऐतिहासिक विषयों पर बनी ऐसी फिल्मों में भव्यता और सेटों पर जिनती मेहनत की जाती है वह पात्रों और चरित्रों पर नहीं.
इस फिल्म की सबसे बडी खूबी है ऐश्वर्या राय, जो पहले एक हिंदू राजपूत राजकुमारी के पहले एक मुस्लिम राजा से ब्याह देने के द्वंद और फिर खुद को उनकी पत्नी के रूप में सही पंसद साबित करने वाले अंतर्द्वंद वाले पात्र को पूरी संवेदनशीलता और गहराई के साथ निभाती है. फिल्म की दूसरी बडी खूबी हैं मिस इंडिया रही और शॉटगन की मॉडल अभिनेत्री पूनम सिन्हा की परदे पर आमद. वे अकबर की माँ के रूप में प्रभावित ही नहीं करतीं बल्कि इला अरूण और कुलभूषण खरबंदा के बाद सबसे वरिष्ठ और गंभीर पात्र भी हैं. शीशा और सिसकियाँ के बाद जोधा के भाई बने सोनू सूद ने पहली बार बेहतर काम करने की कोशिश की है और एक लाइन में कहा जाए तो यही पात्र और चरित्र इस साढे तीन घंटे लंबी फिल्म के असली सूत्राधर भी हैं और आधार भी हैं.


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