ब्लैक एंड व्हाइट एक बेहतरीन फ़िल्म

सुभाष घई की अब तक की सारी फिल्मों से हटकर फ़िल्म हैं 'ब्लैक एंड व्हाइट'. घई की ज़्यादातर फिल्में फमिली ड्रामा ही होती हैं जिसमें बड़े बड़े सेट्स होते हैं और पारिवारिक पृष्ठभूमि होती है. लेकिन फ़िल्म 'ब्लैक एंड व्हिते' वास्तविकता से जुड़ी हुई फ़िल्म है.
कहानी:
राजन माथुर (अनिल कपूर) एक उर्दू के प्रवक्ता हैं जो अपनी पत्नी के साथ चाँदनी चौक (दिल्ली) में रहते हैं. उनकी मुलाकात नुमैर (अनुभव सिन्हा) से होती है जो अपने आप को गुजरात में हुए दंगों का पीड़ित व्यक्ति बताता है. लेकिन असल में वो एक आतंकवादी होता है जो 15 अगस्त को बोम्ब ब्लास्ट करने के उद्देश्य से आया है.
नुमैर को प्लान के हिसाब से केवल 15 दिन ही वहाँ पर रहना है. राजन माथुर घर से ज़्यादा सुरक्षित जगह उसे और कोई दिखाई नहीं देती और वो माथुर के घर पर ही रहने का मन बना लेता है. अपनी मीठी मीठी बातों से वो दोनों पति पत्नी का मन जीत लेता है.
इन दिनों में राजन माथुर उसे आस पास के सारे लोगों से मिलवाते हैं जो नुमैर को बहुत प्यार देते हैं. इस प्यार की वजह से ही नुमैर ये सोचने पर मजबूर हो जाता है की उसे बोम्ब ब्लास्ट करना चाहिए या नहीं ?
इसके आगे क्या होता है ये जानने के लिए देखिये फ़िल्म 'ब्लैक एंड व्हाइट'. सुभाष घई का बेहतरीन निर्देशन इस फ़िल्म को बताया जा रहा है. इस फ़िल्म में सुखविंदर सिंह ने संगीत दिया है. सोमक मुख़र्जी ने अपने कैमरे का कमाल दिखाया है और दिल्ली को बहुत ही अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया है.
अनिल कपूर ने एक बार फ़िर अपनी विविधता का परिचय दिया है. अपनी पिछली फ़िल्म वेलकम में कॉमेडी किरदार निभाने के बाद इस फ़िल्म में उन्होंने बहुत ही गंभीर किस्म का किरदार निभाया है. शेफाली शाह ने बेहतरीन एक्टिंग की है. मिलिंद गुनाजी, अदिति और अरुण बख्शी ने औसत काम किया है.
कुल मिलाकर ये फ़िल्म अपनी पकड़ बनाये रखने में कामयाब होती है. दशकों को ये फ़िल्म ज़रूर पसंद आएगी और इसे अच्छी फिल्मों की श्रेणी में रखा जा सकता है.


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